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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

चतुर्दशोऽध्यायः। ' १६१
तत्राऽसत्यमन्यतरत् कतमं तन्ममेरय ।
इति पृष्टो मुनिसुतः प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ६ ॥
सङ्कल्पो भावना प्रोक्ता सिद्धाऽसिद्धेति सा द्विधा ।
सिद्धिर्विकल्पासम्भेदो(ऽ)विकल्पस्त्वेकनिष्ठितेः ॥ ७ ॥
ब्रह्मभावनया पश्य जातं जगदिदं ननु ।
एतत् सर्वैः सत्यरूपं भावितं सुदृढत्वतः। ८ ॥
तथा स्वसङ्कल्पभवे नास्ति कस्याऽपि भावना ।
विकल्पसम्भेद एषोऽसिद्धा तस्माद्विभावना ॥ ९ ॥
भावनायाः सिद्धिरत्र बहुधा संस्थिता भवेत् ।
जन्मना मणिना तद्वदौषधेन च योगतः ॥ १० ॥
तपसा मन्त्रसिद्ध्या च वरेण च भवेन्नृपः ।
जन्मना ब्रह्मणः सा वै मणिना यक्षरक्षसाम् ॥ ११ ॥
औषधेन तु देवानां योगिनां योगतो भवेत् ।
तपसा तापसानां सा मान्त्रिकाणां तु मन्त्रतः ॥ १२ ॥
इनमें एक तो असत्य होगा ही, सो कौन-सा है—यह मुझे बतला-
इये।” इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिपुत्रने कहना आरम्भ किया—॥ ६ ॥
“भावना संकल्पको ही कहते हैं और वह सिद्ध एवं असिद्ध दो
प्रकारकी होती है। जिस भावनामें विकल्प (संशय) का संश्लेष नहीं
होता वह सिद्ध होती है, विकल्प न होनेका अर्थ है किसी एकमें लग
जाना ॥ ७ ॥
इस संसारको तुम निश्चय ही ब्रह्माकी भावनासे उत्पन्न हुआ
समझो। अत्यन्त दृढ़ताके कारण सबने इसे सत्य मान रखा है ॥ ८ ॥
तथा तुम्हारे अपने संकल्पसे उत्पन्न हुए संसारमें किसी दूसरेकी
सत्यत्व भावना नहीं होती ! अतः इसमें [यह सत्य नहीं है] ऐसे तुम्हारे
ही विकल्पका मेल रहनेके कारण यह भावना सिद्ध नहीं होती ॥ ९ ॥
यहाँ भावनाकी सिद्धि अनेक प्रकारसे होती है। राजन् ! यह
भावनासिद्धि जन्मसे, मणिसे, ओषधिसे, योगसे, तपसे, मन्त्रसिद्धिसे तथा
वरके द्वारा भी हो सकती है ॥ १०-११ पू० ॥
यह जन्मके द्वारा ब्रह्माको, मणिसे यक्ष और राक्षसोंको, ओषधिसे