त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः। १८७
ज्ञातविज्ञेयतत्त्वाना मप्रामाण्यदृशिः स्फुटा ॥ ७६ ॥
तस्मादिदं दृश्यजालं स्वाप्नदृश्यसमस्थिति ।
दीर्घकालोऽपि च स्वप्ने भासते निर्विशेषतः ॥ ७७ ॥
तस्मादबाधितो ह्यर्थक्रियाकारी स्थिरोऽपि च ।
स्वाप्नभावस्तेन तुल्यो जाग्रद्भावोऽपि सर्वशः ॥ ७८ ॥
यथा जाग्रति जाग्रत्त्वं गृहीतं जागरे स्फुटम् ।
स्वप्नेऽपि जागरत्वं तु गृहीतं तद्वदेव हि ॥ ७९ ॥
एवं स्थिते कुतो राजन् विशेषः स्वप्नजाग्रतोः ।
तत्स्वाप्नान्निजबन्धूंस्त्वं न हि शोचसि वै कुतः ॥ ८० ॥
केवलं भावनामात्रात् सत्यता जगति स्थिता ।
शून्यताभावनेनाऽपि शून्यं निष्प्रतिघं भवेत् ॥ ८१ ॥
तुम-जैसे भ्रान्त पुरुषोंको वह अप्रमाणदर्शन करनेकी दृष्टि प्राप्त नहीं
है। जो महापुरुष ज्ञेयतत्त्वको पहचानते हैं उन्हें स्पष्ट ही यह अप्रमा-
णदर्शनकी दृष्टि प्राप्त है ॥ ७५ उ०-७६ ॥
इसलिये यह दृश्यप्रपञ्च स्वप्नकालके दृश्यके समान ही है।
स्वप्नमें भी समान रूपसे दीर्घकालकी प्रतीति होती ही है ॥ ७७ ॥
अतः स्वप्नकालमें स्वप्नसृष्टि भी बाधित न होनेवाली, प्रयोजन-
की पूर्ति करनेवाली और स्थिर ही है। जाग्रत्सृष्टि भी सर्वथा उसके
समान ही है ॥ ७८ ॥
जिस प्रकार जाग्रत् अवस्थामें ‘यह जाग्रत् है’ ऐसा भान स्पष्ट होता
है उसी प्रकार स्वप्नावस्थामें भी जागृतिका ग्रहण होता ही है।
[ अर्थात् उस समय भी यही जान पड़ता है कि यह जाग्रत् है ] ॥ ७९ ॥
राजन् ! ऐसी स्थितिमें भला, जाग्रत् और स्वप्नका अन्तर कहाँ
है ? फिर तुम अपने स्वप्नावस्थाके सम्बन्धियोंके लिये शोक क्यों
नहीं करते हो ? ॥ ८० ॥
केवल भावनासे ही संसारमें सत्यता बनी हुई है। यदि इसमें
शून्यताकी भावना की जाय तो यह शून्य और निष्प्रतिघ ( सब प्रकार
की रुकावटसे रहित ) जान पड़ेगा ॥ ८१ ॥