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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 404 में से

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पृष्ठ 189

त्रयोदशोऽध्यायः
मुनिपुत्रः पुनः शैलान्महासेने विनिर्गते ।
विधाय मूर्च्छितं लिङ्गदेहं संस्कारमात्रकम् ॥ १ ॥
समादाय विनिर्गत्य प्राक्षिपत्तच्छरीरके ।
उत्थापयामास तु तं जीर्णदेहसुसङ्गतम् ॥ २ ॥
अथोत्थितो महासेनो बाह्यलोकं समीक्ष्य तु ।
भुवं जनांस्तरून् स्रोतोह्रदादींश्चापि नूतनान् ॥ ३ ॥
बभूव विस्मितोऽत्यन्तं पप्रच्छ मुनिनन्दनम् ।
कतमो वै महाभाग लोकोऽयं मे प्रदर्शितः ॥ ४ ॥
पुरादृष्टादपूर्वोऽयं समाचक्ष्वैतदद्भुतम् ।
इत्यापृष्टो मुनिसुतो महासेनमुवाच ह ॥ ५ ॥
शृणु राजन्नयं लोकः पूर्वं योऽस्माभिरास्थितः ।
स एव चिरकालेन परिणामान्तरं गतः ॥ ६ ॥
त्रयोदश अध्याय ॥ १३ ॥
शोकाकुल महासेनको मुनिपुत्रका उपदेश
महासेनके शिलासे बाहर निकलते समय मुनिपुत्रने उसके
लिंग शरीरको पुनः मूर्च्छित कर दिया और उस संस्कारमात्र शरीरको
लेकर बाहर आ उसके स्थूल शरीरमें डाल दिया। इस प्रकार पूर्व
शरीरके साथ संयुक्त होनेपर उसने उसे सचेत कर दिया ॥ १-२ ॥
महासेनने चेत होनेपर बाह्य जगत्को देखा तो पृथ्वी, मनुष्य, वृक्ष,
स्रोत और सरोवर आदि सभीको नये ही रूपमें देखकर उसे बड़ा
आश्चर्य हुआ और उसने मुनिपुत्रसे पूछा, "महाभाग ! आपने मुझे यह
कौनसा लोक दिखा दिया ? ॥ ३-४ ॥
मेरे पहले देखे हुए प्रदेशसे तो यह भिन्न ही है। देखो जी ! यह
तो बड़ी ही विचित्र बात है।" इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिपुत्रने
महासेनसे कहा—॥ ५ ॥
“राजन् ! सुनो, यह वही देश है जिसमें हम पहले रहते थे।
बहुत समय हो जानेके कारण वही अब बदल गया है ॥ ६ ॥