त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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कदाचित् कृमिकीटादिप्रचुरं जगदीक्षितम् ।
एवमेतज्जगत् कालभेदात् परिणतं पृथक् ॥ २१ ॥
तस्मादयं पुराऽस्माकं लोक एवेदृशः स्थितः ।
इत्याकर्ण्य मुनिसुत-वाक्यं स च महीपतिः ॥ २२ ॥
महासेनोऽत्यन्तशोकाविष्टो मूर्च्छामुपागतः ।
मुनिपुत्रसमाश्वस्तः प्रज्ञामासाद्य भूपतिः ॥ २३ ॥
अत्यन्तशोकसंविष्टो विललाप सुदीनवत् ।
भ्रातरं भ्रातृपुत्रांश्च दारान् स्वात्मन एव च ॥ २४ ॥
पुत्रादींश्च पृथक् स्मृत्वा विललापाऽतिदुःखितः ।
अथ तं मोहतो भ्रातृमुखान् शोचन्तमञ्जसा ॥ २५ ॥
मुनिपुत्रो वचः प्राह बुवोधयिषया नृपम् ।
राजंस्त्वं बुद्धिमान्नूनं तत्किमर्थं हि शोचसि ॥ २६ ॥
बुद्धिमन्तो हि विफलं जातु कुर्वन्ति कर्म नो ।
अविमृश्य फलं यस्तु कर्म कुर्यात् स बालिशः ॥ २७ ॥
मनुष्योंकी अधिकता होती है वहीं पशुओंके झुण्ड दीख पड़ते हैं ॥ २० ॥
कोई समय ऐसा भी था जब इस जगत्में कृमि-कीटादिकी ही
बहुलता देखी जाती थी। इस प्रकार कालभेदसे यह जगत् अलग-अलग
रूपोंमें बदलता रहता है ॥ २१ ॥
इसलिये हमारा यह पूर्वकालिक प्रदेश ही इस समय ऐसा हो गया
है।" मुनिपुत्रकी यह बात सुनकर राजा महासेन शोकाकुल होकर
मूर्च्छित हो गया ॥ २२-२३ पू० ॥
तब मुनिपुत्रके शान्त करनेपर उसे चेत हुआ और वह शोकातुर हो
अत्यन्त दीनकी तरह विलाप करने लगा ॥ २३ उ०-२४ पू० ॥
वह अपने भाई, भतीजों तथा स्त्री-पुत्र आदिको अलग-अलग याद
करके अत्यन्त दुःखित हो विलाप करने लगा ॥ २४ उ०-२५ पू० ॥
इस प्रकार उसे मोहवश स्वभावसे ही अपने भाई आदिके
लिये शोक करते देख उसे समझानेके लिये मुनिकुमारने ये वचन
कहे—॥ २५ उ०-२६ पू० ॥
"राजन् ! तुम तो बड़े बुद्धिमान् हो, फिर शोक क्यों करते हो ?