त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः । १८५
नाऽनुवृत्तिर्भाति स्वप्ने इति चेन्नृपते ! शृणु ।
जाग्रत्यपि कानुवृत्तिभासो नव्याऽवभासके ॥ ६४ ॥
नव्येऽनुवृत्त्यभानेऽपि भात्यन्यत्रेति चेच्छृणु ।
तथा स्वप्नेऽपि भान्येवाऽनुवृत्तिः स्थिरभासने ॥ ६५ ॥
मृषानुवृत्तिस्तत्रेति चेज्जाग्रत्यपि सा तथा ।
सूक्ष्मबुद्ध्या विमृश तद्वस्तु जाग्रति संस्थितम् ॥ ६६ ॥
देहवृक्षनदीदीपादिकं क्षणविभेदितम् ।
कथं तदनुवृत्तिर्वै भवेदवितथात्मिका ॥ ६७ ॥
अचलानामपि न हि द्वितीयक्षणसङ्गतम् ।
रूपमस्ति सर्वदैव निर्भरैर्भैदितात्मनाम् ॥ ६८ ॥
मूषकैरुपदीकाभिः शूकरैर्निर्झरादिभिः ।
सर्वतस्तु विभिद्यन्ते पर्वताः सर्वदैव हि ॥ ६९ ॥
यदि कहो कि स्वप्नमें तो पूर्व पदार्थोंकी ही अनुवृत्ति नहीं भासती,
तो राजन् ! सुनो, जाग्रत्में भी अनुवृत्तिका भान कहाँ होता है, उस
अवस्थामें भी तो नये पदार्थ ही भासते हैं ॥ ६४ ॥
यदि तुम कहो कि नये-नये पदार्थोंकी प्रतीति होनेपर भी पृथ्वी
आदि अन्य पदार्थ तो वे ही रहते हैं, तो स्वप्नमें भी [देश-कालादि ]
स्थिर पदार्थोंके भासनेके साथ ही कुछ पदार्थोंकी अनुवृत्ति भासती
है । ६५ ॥
यदि तुम्हारे विचारसे स्वप्नकी अनुवृत्ति मिथ्या है तो जाग्रत्
की भी तो वैसी ही है। तुम जाग्रत्कालकी उन स्थिर वस्तुओंके विषयमें
विचार तो करो ॥ ६६ ॥
शरीर, वृक्ष, नदी और दीपक आदि पदार्थ क्षण-क्षणमें बदलते
रहते हैं। फिर उनकी अनुवृत्ति सत्य कैसे हो सकती है ॥ ६७ ॥
पर्वतादि अचल माने जानेवाले पदार्थोंका भी द्वितीय क्षणमें
रहनेवाला रूप ज्योंका त्यों नहीं होता। वे भी झरने आदिके कारण
बदलते रहते हैं ॥ ६८ ॥
चूहों, दीमकों, सूअरों और झरनों आदिके कारण पर्वतोंमें सर्वदा