त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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अतीता बन्धवो नष्टाः पितामहमुखाः खलु ।
तत् सर्वदा शोचितव्यं कुतः सर्वं न शोचितम् ॥ ३४ ॥
अथ ते बन्धवः कस्य बन्धुत्वं वा कुतस्तव ।
मातापित्रोः स्वस्य वाऽपि पुरीषक्रमयो हि ये ॥ ३५ ॥
असङ्ख्याताः स्वदेहोत्था देहसम्बन्धिनोऽपि च ।
न ते स्युर्बन्धवः कस्मात् कुतो वा ते न शोचिताः ॥ ३६ ॥
राजन् विमृश कस्त्वं वै कान् विनष्टान् प्रशोचसि ।
देहस्त्वं देहभिन्नो वा देहः सङ्घातरूपकः ॥ ३७ ॥
सङ्घातस्यैकदेशस्य वा नाशानाश उच्यते ।
प्रतिक्षणं त्वेकदेशनाशो देहस्य भावितः ॥ ३८ ॥
मूत्रोच्चारश्लेष्मनखकेशादेः सन्ततं च यः ।
सर्वात्मना तु सङ्घातनाशो न हि विभाव्यते ॥ ३९ ॥
आवश्यक हो, तो सुनो । तुम्हारे दादा आदि और भी अनेकों
भूतकालीन सम्बन्धी मर ही चुके हैं; तब तुम्हें सर्वदा शोक ही
करते रहना चाहिये था । तुमने उन सबके लिये शोक क्यों नहीं
किया ? ॥ ३३-३४ ॥
अच्छा, तुम्हारे वे सम्बन्धी भी वास्तवमें किसके थे और तुम्हारे
साथ भी उनका कैसे सम्बन्ध हुआ ? देखो, माता-पिता अथवा अपने भी
विष्ठामें जो अगणित कीड़े होते हैं वे अपने देहसे ही होते हैं और
देहके सम्बन्धी भी हैं ही, फिर वे तुम्हारे स्वजन क्यों न हुए और
उनके लिये तुम शोक क्यों नहीं करते ? ॥ ३५-३६ ॥
राजन् ! तुम सोचो कि वास्तवमें तुम कौन हो और किन मरे हुओं-
के लिये तुम शोक कर रहे हो ? तुम देह हो या देहसे भिन्न ? देह तो
अनेक तत्त्वोंका संघात ( समूह ) है ॥ ३७ ॥
उस सम्पूर्ण संघातके अथवा उसके एक अंशके नाशको ही नाश
कहते हैं । और देहके एक-एक अंशका नाश तो प्रत्येक क्षणमें माना
जाता है । जैसे मूत्र, मल, कफ, नख और केश आदिका नाश निर-
न्तर होता ही रहता है । तथा इस संघातका पूर्णतया नाश कभी माना
नहीं जाता ॥ ३८-३९ ॥