त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशोऽध्यायः। १८१
भ्रात्रादेस्तव देहांशः स्यात् पृथिव्यादिषु स्फुटम् ।
अन्ततो देहगगनमविनाश्यस्ति केवलम् ॥ ४० ॥
न त्वं देहः किं तु देही मदेह इति भाषसे ।
यथा मद्वस्त्रमित्येवं स देहस्त्वं कथं वद ॥ ४१ ॥
यदि त्वं देहभिन्नोऽसि सम्बन्धः कोऽन्यदेहकैः ।
यथा भ्रात्रादिवासोभिर्नास्ति सम्बन्धलेशकः ॥ ४२ ॥
अविशेषात्तच्छरीरैर्विनष्टैस्तैः कथं शुचा ।
मच्छरीरं मदक्षाणि मत्प्राणो मन्मनस्त्विति ॥ ४३ ॥
वदन् भवान् किंस्वरूपो वद मे पृच्छते नृप ! ।
एवमुक्तो महासेनो मुहूर्तं सुविचार्य तु ॥ ४४ ॥
अप्राप्य तं मुनेः प्रश्ने प्राह दीनतरस्ततः ।
न जाने भगवन् कोऽहमिति सर्वात्मनाऽप्यहम् ॥ ४५ ॥
तुम्हारे भ्राता आदिके देहोंका अंश पृथिवी आदि भूतोंमें स्पष्ट
है ही। [ इन पृथिवी आदिका भी नाश माना जाय तो ] अन्ततः विशुद्ध
देहाकाश तो अविनाशी है ही ॥ ४० ॥
वास्तवमें तो तुम देह नहीं देही (देहके स्वामी) हो, क्योंकि
तुम जिस प्रकार 'मेरा वस्त्र' कहते हो वैसे ही 'मेरा देह' भी कहते
हो। फिर बताओ तुम देह कैसे हो सकते हो ? ॥ ४१ ॥
यदि तुम इस देहसे भी भिन्न हो तो अन्य देहोंके साथ तुम्हारा
क्या सम्बन्ध हो सकता है ? जिस प्रकार कि भाई आदिके वस्त्रोंसे
तुम्हारा लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं है। और [ उनके ममतास्पद
होनेमें ] उनके शरीरोंसे उनके वस्त्रोंका कोई भेद है नहीं। फिर शरीरों-
के मरनेपर ही तुम्हें क्यों शोक होता है ? ॥ ४२-४३ पू० ॥
राजन् ! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, बताओ, जब तुम 'मेरा
शरीर' 'मेरी इन्द्रियाँ' 'मेरा प्राण' 'मेरा मन' ऐसा कहते हो तब तुम्हारा
क्या स्वरूप हुआ ?" ॥ ४३ उ०-४४ पू० ॥
ऐसा प्रश्न होनेपर महासेनने एक मुहूर्त्त खूब विचार किया और
जब मुनिके उस प्रश्नका कोई उत्तर न मिला तो अत्यन्त दीन
होकर बोला—"भगवन् ! सब प्रकार विचारनेपर भी मैं यह नहीं जान