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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 404 में से

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पृष्ठ 188

१७४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
विस्मितोऽभून्महासेनस्ततः प्राह मुनेः सुतः ।
राजन्नेतल्लोकजातं पश्यतः काल अत्यगात् ॥ ९४ ॥
अर्बुदानां द्वादशकमितोऽप्यत्र दिनात्मकः ।
गच्छावो बाह्यलोकं तं यत्रास्ते जनको मम ॥ ९५ ॥
इत्युक्त्वा भूभृता तेन सह भूयः समागतः ।
पूर्ववत्तं गण्डशैलान्निर्गत्याभ्याययौ बहिः ॥ ९६ ॥
इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे गण्डशैललोकावलोकने
द्वादशोऽध्यायः ॥
मुनिकुमारका ऐसा योगसामर्थ्य देखकर महासेनको बड़ा आश्चर्य
हुआ । तब उससे वह मुनिपुत्र बोला ॥ ६३ उ०-६४ पू० ॥
राजन् ! इन लोकोंको देखते हुए हमें बारह अरब वर्ष बीत चुके हैं
और यहाँ अभी एक दिन ही हुआ है । अब हम बाहरके लोकमें चलेंगे,
जहाँ मेरे पिताजी विराजमान हैं ॥ ६४ उ०-६५ ॥
ऐसा कहकर वह राजाके सहित पुनः लौट आया । पहले ही की
भाँति उसने शिलाको पार किया और बाहर आ गया ॥ ६६ ॥
द्वादश अध्याय समाप्त ।