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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 204

चतुर्दशोऽध्यायः
इत्याकर्ण्य मुनिवचो विचार्य शुभया धिया ।
जगत्स्थितिं स्वाप्नसमां ज्ञात्वा शोकं जहौ द्रुतम् ॥ १ ॥
धैर्यमालम्ब्य निःशोको भूयोऽपृच्छन्मुनेः सुतम् ।
मुनिपुत्र ! महाबुद्धे ! त्वं पराऽवरदर्शनः ॥ २ ॥
ततोऽप्यविदितं किञ्चिन्मन्ये स्यादिति लेशतः ।
पृच्छामि यदहं तन्मे कृपया वक्तुमर्हसि ॥ ३ ॥
भावनाप्रभवं ह्येतत् सर्वं वदसि तत् कथम् ।
मया भूयो भाविते च न वहिः सर्वथा भवेत् ॥ ४ ॥
त्वया तु भावनासिद्ध्या शैललोकः प्रकल्पितः ।
अथाऽपि देशः कालश्च युगपद् द्विविधः कथम् ॥ ५ ॥
चतुर्दश अध्याय ॥ १४ ॥
सङ्कल्पसिद्धि और उसका साधन
मुनिपुत्रके ये वचन सुनकर महासेनने शुद्ध बुद्धिसे विचार किया
और इस जगत्की स्थितिको स्वप्नके समान समझकर तत्काल शोक
त्याग दिया ॥ १ ॥
फिर धैर्य धारण कर शोकहीन हो मुनिपुत्रसे पूछा, "परमबुद्धिमान्
मुनिपुत्र ! आप परावरदर्शी हैं। [ आपको इन्द्रियातीत और इन्द्रिय-
गोचर दोनों ही प्रकारकी वस्तुओंका ज्ञान है ] ॥ २ ॥
तथापि मुझे अभी जो थोड़ी-सी बात अविदित-सी जान पड़ती है
उसके विषयमें कुछ प्रश्न करता हूँ, आप उसे कृपापूर्वक बताइये ॥ ३ ॥
आप कहते हैं कि यह सब भावनासे ही हुआ है, सो कैसे ?
क्योंकि मैं जिसकी भावना करता हूँ वह वस्तु तो बाहर बिलकुल
दिखायी नहीं देती ॥ ४ ॥
भावनाकी सिद्धि होनेके कारण आपने अवश्य पहाड़ीके भीतर स्थित
लोककी कल्पना कर ली है। तथापि यह लोक और शिलालोक साथ
होनेपर भी इनमें दो प्रकारके देश और काल क्यों हैं ? ॥ ५ ॥