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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

तरुणके स्वप्न
बुद्धि और भावुक, मायावाद विद्वेषी और आदर्शवादी,
अनुकरणक्षम और सृष्टिक्षम है, इसका कारण रक्त सम्मि-
श्रण है। जिस जातिका रक्त व्यक्तिकी धमनियोंमें प्रवा-
हित होता है, उसके संस्कार व्यक्तिके चित्तमें अवस्थित
रहते हैं। बंगाली जिस प्रकार एक जातिके रूपमें परिणित
हुआ है, उसी तरह बंगालीके culture ने भी एक तरहका
वैशिष्ट्य लाभ किया है।
बंगालके साहित्य और इतिहासके साथ जिनका परि-
चय है, वे स्वीकार करेंगे कि बंगालकी सभ्यता आर्य
सभ्यता होनेपर भी उसका अपना एक वैशिष्ट्य है। स्वामी
दयानन्दने आर्य-समाज चलाकर उत्तर भारत जय किया,
पर वे बंगाल जय नहीं कर सके। और काली भक्त पर-
महंस देवको बंगाली इतनी श्रद्धा भक्ति क्यों करते हैं?
बंगालमें दाय भागका प्रचलन क्यों है? बौद्ध धर्म सब
जगहसे विताड़ित होकर अन्तमें बंगालका शरणागत क्यों
हुआ? बंगालमें नव्य न्यायकी उत्पत्ति क्यों हुई? बंगा-
लने शंकरका मायावाद ग्रहण क्यों नहीं किया? बौद्ध-
धर्मके बंगालसे विताड़ित होनेपर शंकरके मायावादके
प्रतिवाद स्वरूप अचिन्त्य भेदाभेदकी सृष्टि क्यों हुई?
इन सब प्रश्नोंपर विचार करनेसे ही समझा जा सकता
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देशबन्धु
है कि बंगालकी संस्कृतिमें तीन धाराएं दिखलाई
पड़ती हैं, (१) तन्त्र (२) वैष्णव धर्म, (३) नव्य न्याय और
और रघुनन्दनकी स्मृति। न्याय और स्मृतिमें बंगाल
आर्यावर्त्तके साथ है, वैष्णव धर्ममें बंगाली द्राविणोंके
साथ है, तन्त्रोंमें वह तिव्बतीय और पर्वतीय जातियोंके
साथ है।
न्याय शास्त्रके अनुशीलनने बंगालीको तार्किक तथा
नैयायिक बना दिया। इसी प्रकृतिने विकसित होकर देश-
बन्धुको बहुत बड़ा वैरिस्टर बना दिया। देशबन्धुने
प्राचीन न्याय शास्त्र पढ़ा था या नही मालूम नहीं, किन्तु
पाश्चात्य तर्क शास्त्रका अध्ययन उन्होंने किया था। बड़े
भारी नैयायिककी तरह वे बालकी खाल निकालनेवाला तर्क
कर सकते थे। तथा अविराम वाक्य प्रवाहके द्वारा वे
शत्रु पक्षका विध्वस्त कर सकते थे। दो तीन सौ वर्ष
पहले नदियामें जन्म ग्रहण करते तो निश्चय ही वे बड़े
भारी नैयायिक होते।
वङ्गालका वैष्णव धर्म और द्वैताद्वैतवाद देशबन्धुको
नास्तिकतासे खींचकर नीरस वेदान्तके भीतरसे प्रेम मार्ग
पर ले गया था, दार्शनिक मतके रूपमें वे अचिन्त्य भेदा-
भेदवादको सबसे शुद्ध मानते थे। वे बहुत कुछ संन्यासी-
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तरुणके स्वप्न
से थे, पर संन्यास उनका धर्म नहीं था। भगवान जिस
तरह सत्य है, उसी तरह उनकी लीला भी सत्य है, ब्रह्म
सत्य है तो जगत मिथ्या कैसे है ? अतएव भगवानको
पानेकेलिये रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द, किसीका भी
वर्जन करना प्रयोजनीय नहीं है। भगवानकी लीला
अनन्त है और उसमें भी बाहरी दुनिया ही नहीं ; भीतरी
अन्तर्जगत भी है। वस्तुतः देशबन्धुने सम्पूर्ण जगतको
तथा मनुष्य जीवनको पूर्ण रूपसे ग्रहण कर लिया था।
द्वैताद्वैत बादकी सहायतासे उन्होंने जीवनके सब
विरोधोंको दूर कर दिया था और धर्म सामंजस्य स्था-
पित कर लिया था। इसीलिये वैष्णव धर्म उनके जीवन-
का आश्रय था। वे बातचीत और व्याख्यान आदिमें प्रायः
कहा करते थे कि अर्थनीति, राजनीति, दर्शन, साहित्य,
धर्म, इन सबको अलग-अलग देखनेसे काम नहीं चलेगा,
क्योंकि इनका आपसमे अंगांगी सम्बन्ध है। तथा एकको
भी बाद देनेसे जीवन पूर्ण नहीं हो सकता।
जिस दार्शनिक तत्वने उनके धर्म सम्बन्धी विरोधों-
का नाश किया था। उसीने उनके हृदयमे सबके प्रति स्नेह
उत्पन्न किया था। उन्होंने अपने जीवनका सामंजस्य कर
लिया था।
१६४

देशबन्धु
जेलमें वे अपनी निर्विचार वदान्यताकी आलोचना
सुनकर कहते, “देखो ! तुम समझते हो कि मैं कुछ समझता
नहीं हूं, लोग मुझे ठगकर रुपये ले जाते हैं, किन्तु मैं सब
समझ सकता हूं, मेरा काम दिये जाना है, इसलिये मैं
दिये जाता हूं। विचार करनेका भार जिनके ऊपर है, वे
विचार करेंगे।”
जिस तन्त्रके उपदेशसे बंगालीने शक्ति पूजा सीखी,
उसी तन्त्रके फलस्वरूप देशबन्धु असाधारण तेजस्वी थे ।
निश्चय ही देशबंधुने किसी भी दिन तांत्रिक साधना नहीं
की थी। किन्तु कुलाचार आदिके बिना शक्तिमान नहीं
हुआ जा सकता, इसपर मैं विश्वास नहीं कर सकता। तन्त्र-
का सार शक्ति पूजा है। जगतका मूल आद्या शक्ति है।
जिससे सृष्टि, स्थिति, प्रलय, अथवा ब्रह्मा, विष्णु, महे-
श्वर हैं। उसी आद्या शक्तिके साधक मातृ-रूपमें इसकी
आराधना करते हैं। बंगालीपर तन्त्रका प्रभाव खूब अधिक
है, इसलिये वह मांका अत्यन्त अनुरक्त है। तथा भगवान-
को मातृ-रूपमें मानता है। पृथ्वीकी अन्यान्य जातियां
(यहूदी, अरब, ईसाई आदि) भगवानको पिता रूपमें
देखते हैं। भगिनी निवेदिताके कथनानुसार उस समाजमें
नारीकी अपेक्षा पुरुषका प्राधान्य है इसी लिये वहां बोले
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तरुणके स्वप्न
भगवानको पिता रूपमें देखते हैं। दूसरी तरफ जिस
समाजमें पुरुषकी अपेक्षा नारीका प्राधान्य है, वहांके
आदमी भगवानको मातृ-रूपमें देखते हैं। जो भी हो,
बंगाली भगवानको,—सिर्फ भगवानको ही क्यो, बंगाल
और भारतवर्षको मातृ-रूपमे ही प्रेम करते हैं, यह सब
जानते हैं। देशको हम मातृभूमि कहते हैं।
बंकिमचन्द्रने लिखा है,—
“सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्
शस्य श्यामलाम् मातरम्।”
द्विजेन्द्रलालने कहा है,—
“जे दिन सुनील जलधि हइते उठिल जननी
भारतवर्ष।”
रवीन्द्रनाथने भी गाया है।
“ओ आमार जन्मभूमि तोमार पाये ठेक़ाई माथा।”
देशबन्धु भी मातृ-रूपके अनुरागी थे। जेलमें वे बंकिम
बाबूकी किताबें पढ़कर सुनाया करते थे। बंकिम लिखित
मांका तीन प्रकारका वर्णन उन्हे बहुत पसन्द था। उनके
“नारायण” पत्रमें वैष्णव और शाक्त धर्मकी समान
रूपसे आलोचना हुआ करती थी। दुर्गा पूजाके सम्बन्धमें
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देशबन्धु
“नारायण” में जो कुछ लेख प्रकाशित हुए थे, वे उच्च
भावपूर्ण थे।
देशबन्धुके व्यावहारिक जीवनमें भी हम तंत्रका
प्रभाव देख पाते हैं। वे स्त्री शिक्षा और स्त्री स्वाधीनता-
में विश्वास करते थे, यह सब जानते थे। शंकर पंथियोंके
इस कथनसे कि “नारी नरकस्य द्वारम्” उनका बिलकुल
विश्वास नहीं था।
उनके गुण बंगालीके गुण थे, उनके दोष बंगालीके
दोष थे। उनकेलिये सबसे महान् गौरवकी बात यही
थी कि वे बंगाली थे। जब कोई बंगालीको भाव प्रवण
कहकर उसका मजाक उड़ाता तो वे बहुत व्यथित होते।
वे कहते हम भाव प्रवण हैं, यही हमारा गौरव है।
मनुष्य जातिकी संस्कृति एक है या अनेक यह प्रश्न
अनेक मनुष्य उठाते हैं। कोई कहते हैं संस्कृतिमें भेद नहीं
है, संस्कृति एक ही है, वे अद्वैतवादी हैं। जो कहते हैं
संस्कृतिमे भी जातीयता है, वह अनेक हैं, वे द्वैतवादी हैं।
किन्तु देशबन्धु द्वैताद्वैतवादी थे। संस्कृति एक भी है,
अनेक भी है। मूलतः मनुष्य जातिकी संस्कृति एक है,
पर उसका विकास अनेक द्वारा हुआ है। बगीचेमे जैसे
नाना प्रकारके वृक्ष रहते हैं और उनके तरह तरहके फूल
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तरुणके स्वप्न
होते हैं, मानव समाजमें भी उसी प्रकार भिन्न भिन्न
तरहकी संस्कृति विकसित होती है। प्रत्येक जातिकी
संस्कृतिका विकास होगा तो संसारकी मानव जातिकी
संस्कृतिका विकास होगा। राष्ट्रकी संस्कृतिका विकास
रोककर विश्वकी संस्कृतिका पूर्ण विकास नहीं किया
जा सकता। देशबन्धुका स्वदेश प्रेम विश्व प्रेमका अंग
था, किन्तु उन्होंने स्वदेश प्रेमको छोड़कर विश्वप्रेमी
बननेका प्रयास नहीं किया।
देशबन्धु अपने स्वदेश प्रेममें बंगालको भूल नहीं जाते
थे। अथवा बंगालके प्रेममें स्वदेशको नहीं भूल जाते थे
किन्तु उनका प्रेम बंगालकी सीमामें बद्ध नहीं था। महा-
राष्ट्रमें भी वे तिलक महाराजकी तरह प्रेम और सहानु-
भूति पाते थे।
देशबन्धुने कहा, बंगालको स्वराज्य संग्राममें अग्रणी
होना होगा। १६२० में बंगालने स्वराज्य आन्दोलनका
नेतृत्व खो दिया। किन्तु सन् १६२३ मे उसका नेतृत्व
उसे फिर मिल गया।
और एक बात देशबन्धु कहा करते थे कि भारतवर्ष-
का कोई आन्दोलन बंगालमें चलाना हो तो उसपर बंगाल
की छाप लगा लेना चाहिये। वे कहते, बंगालमें सत्याग्रह
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आन्दोलन चलानेके पहले उसे बंगालके उपयुक्त बना लेना
होगा।
जनसाधारणपर ही नहीं पर बड़ों बड़ोंपर उनका
आश्चर्यजनक प्रभाव देखकर सब विस्मय विमुग्ध रहते
थे। किसी किसीने उनके प्रभावका कारण समझनेकी
चेष्टा भी की। उन्होंने जब जिस बातका संकल्प किया,
उसे पूरा किया। “मंत्रं वा साधयेयम् शरीरं वा पातयेयम्”
यही वाणी उनके हृदयपर अंकित थी। वे दुर्वाध विक्रम-
से जिस तरफ जाते, उन्हें कोई रोक नही सकता था।
उस समय वे किसीकी पर्वा नही करते, प्रियजनोंका
आर्त्तनाद और अनुचरोंका करुण स्वर भी उन्हें पथसे
वापिस नहीं ला सकता था। यह दिव्यशक्ति देशबन्धु
ने कहांसे पायी ? यह शक्ति क्या साधना द्वारा मिली थी ?
मैंने पहले ही कहा है कि शक्तिके साधक होनेपर भी
उन्होंने तंत्रानुसार शक्ति साधना नहीं की थी। उनके
प्राण महान् थे ! आकांक्षा भी महान् थी। वे जिस
समय जो चाहते थे उसे प्राणपणसे चाहते और उसे
पानेकेलिये प्राणप्रणसे लग जाते। नेपोलियन बोनापार्टने
अल्पस पहाड़ देखकर जैसे एक समय कहा था, “There
shall be no Alps” मेरे सामने अल्पस पहाड़ खड़ा नहीं
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तरुणके स्वप्न
रह सकता ? उसी तरह वे भी बाधा-विघ्नको तुच्छ सम-
झते थे। किस आधारपर “फारवर्ड” का प्रकाशन और
“कौंसिल-जय” का काम शुरू किया था ! हमलोग असु-
विधा या बाधाकी बात कहते तो वे धमकाकर कहते,
“तुमलोग बिलकुल pessimist हो। वे अक्सर कहते,
“you yong-old man ! तुम असमयवृद्ध युवक ! वे
चिरयुवा, चिरनवीन थे। वे तरुणोंको आशा, आकांक्षा-
को समझते थे। इसीलिये मैंने उन्हें “तरुणोंका राजा”
कहा है।
उनके त्याग, पाण्डित्य, बुद्धि कौशल (tact) की
बातें देशवासी जानते हैं। उनके अलौकिक प्रभावका एक
कारण और कहकर मैं बस करूंगा। मैंने कहा है कि
वैष्णवधर्मकी सहायतासे उन्होंने वास्तव जीवन और
आदर्शके बीचमें एक सामंजस्य स्थापित किया था। वे
अनुभूति द्वारा अपनेको भगवानकी लीलाका यंत्र समझते
थे। उनके अहंकारका लोप हो गया था और अहंकारका
लोप होनेपर मनुष्यमें दिव्य शक्ति आ जाती है। जीवनके
अन्तिम दिनोंमें यह अवस्था थी कि—“यत्र दास महाशय
तत्र जय ।”
उन्होंने कितने तरहके आदमियोंसे कितने तरहके
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देशबन्धु
काम करवानेकी चेष्टाएं की यह शायद देशवासी नही
जानते । उनके बोए हुए वृक्षमें जब फल आयेगा । तब
देशवासी जानेंगे । जीवन, मरण, शयन, स्वप्नमें उनका
एक ही ध्यान था, एक ही चिन्ता थी, स्वदेश सेवा ।
स्वदेश सेवा ही उनके धर्म जीवनका सोपान था ।
देशबन्धुके जीवनकी बात कहते हुए यदि एक व्यक्ति
का उल्लेख न किया जायगा तो, कुछ न कहा जायगा ।
जो देवी जनसाधारणकी दृष्टिसे तिरोहित मूर्तिमती-
सेवा और शान्तिकी तरह, छायाके समान देशबन्धुके
पार्श्वमें रहतीं, उनको बाद देनेसे देशबन्धुके जीवनमे क्या
बाकी रह जायगा यह कौन कह सकता है ? भोगके
अत्युच्च शिखरपर जिन्होंने हिन्दू रमणीके आदर्श, लज्जा,
नम्रता और सेवाको किसी दिन विस्मृत नहीं किया,
विपत्के महान् अन्धकारमे जिन्होंने पातिव्रत, चित्तस्थैर्य
और भगवद्विश्वासका सहारा न छोड़ा, उन्ही देवीकी
बात लिखते समय मुझे शब्द नहीं मिलते । देशबन्धु तरुणों
के राजा थे और उनकी पतिव्रता साध्वी पत्नी तरुणोंकी
माता । देशबन्धुके देहत्यागके बाद आज वे सिर्फ चिर-
रंजनकी ही माता नहीं हैं, सिर्फ तरुणोंकी ही माता नहीं
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तरुणके स्वप्न
है, वे आज समस्त बंगालकी मा हैं। बंगालीके हृदयका
सर्वश्रेष्ट अर्घ्य आज उनके चरणोंपर समर्पित है।
अलीपुरके मामलेमें अरविन्द बाबूका समर्थन करते
हुए देशबन्धुने कहा था—
He will be looked upon as the poet of pa-
triotism, the prophet of nationalism and the
lover of humanity. His words well be echoed
and reechoed, etc.
यह क्या आज देशबन्धुके सम्बन्धमें नहीं कहा जा
सकता ?
● समाप्त ●
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