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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 174 में से

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पृष्ठ 167

तरुणके स्वप्न
भगवानको पिता रूपमें देखते हैं। दूसरी तरफ जिस
समाजमें पुरुषकी अपेक्षा नारीका प्राधान्य है, वहांके
आदमी भगवानको मातृ-रूपमें देखते हैं। जो भी हो,
बंगाली भगवानको,—सिर्फ भगवानको ही क्यो, बंगाल
और भारतवर्षको मातृ-रूपमे ही प्रेम करते हैं, यह सब
जानते हैं। देशको हम मातृभूमि कहते हैं।
बंकिमचन्द्रने लिखा है,—
“सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्
शस्य श्यामलाम् मातरम्।”
द्विजेन्द्रलालने कहा है,—
“जे दिन सुनील जलधि हइते उठिल जननी
भारतवर्ष।”
रवीन्द्रनाथने भी गाया है।
“ओ आमार जन्मभूमि तोमार पाये ठेक़ाई माथा।”
देशबन्धु भी मातृ-रूपके अनुरागी थे। जेलमें वे बंकिम
बाबूकी किताबें पढ़कर सुनाया करते थे। बंकिम लिखित
मांका तीन प्रकारका वर्णन उन्हे बहुत पसन्द था। उनके
“नारायण” पत्रमें वैष्णव और शाक्त धर्मकी समान
रूपसे आलोचना हुआ करती थी। दुर्गा पूजाके सम्बन्धमें
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