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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 174 में से

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पृष्ठ 168

देशबन्धु
“नारायण” में जो कुछ लेख प्रकाशित हुए थे, वे उच्च
भावपूर्ण थे।
देशबन्धुके व्यावहारिक जीवनमें भी हम तंत्रका
प्रभाव देख पाते हैं। वे स्त्री शिक्षा और स्त्री स्वाधीनता-
में विश्वास करते थे, यह सब जानते थे। शंकर पंथियोंके
इस कथनसे कि “नारी नरकस्य द्वारम्” उनका बिलकुल
विश्वास नहीं था।
उनके गुण बंगालीके गुण थे, उनके दोष बंगालीके
दोष थे। उनकेलिये सबसे महान् गौरवकी बात यही
थी कि वे बंगाली थे। जब कोई बंगालीको भाव प्रवण
कहकर उसका मजाक उड़ाता तो वे बहुत व्यथित होते।
वे कहते हम भाव प्रवण हैं, यही हमारा गौरव है।
मनुष्य जातिकी संस्कृति एक है या अनेक यह प्रश्न
अनेक मनुष्य उठाते हैं। कोई कहते हैं संस्कृतिमें भेद नहीं
है, संस्कृति एक ही है, वे अद्वैतवादी हैं। जो कहते हैं
संस्कृतिमे भी जातीयता है, वह अनेक हैं, वे द्वैतवादी हैं।
किन्तु देशबन्धु द्वैताद्वैतवादी थे। संस्कृति एक भी है,
अनेक भी है। मूलतः मनुष्य जातिकी संस्कृति एक है,
पर उसका विकास अनेक द्वारा हुआ है। बगीचेमे जैसे
नाना प्रकारके वृक्ष रहते हैं और उनके तरह तरहके फूल
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