तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)
Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतरुणके स्वप्न
से थे, पर संन्यास उनका धर्म नहीं था। भगवान जिस
तरह सत्य है, उसी तरह उनकी लीला भी सत्य है, ब्रह्म
सत्य है तो जगत मिथ्या कैसे है ? अतएव भगवानको
पानेकेलिये रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द, किसीका भी
वर्जन करना प्रयोजनीय नहीं है। भगवानकी लीला
अनन्त है और उसमें भी बाहरी दुनिया ही नहीं ; भीतरी
अन्तर्जगत भी है। वस्तुतः देशबन्धुने सम्पूर्ण जगतको
तथा मनुष्य जीवनको पूर्ण रूपसे ग्रहण कर लिया था।
द्वैताद्वैत बादकी सहायतासे उन्होंने जीवनके सब
विरोधोंको दूर कर दिया था और धर्म सामंजस्य स्था-
पित कर लिया था। इसीलिये वैष्णव धर्म उनके जीवन-
का आश्रय था। वे बातचीत और व्याख्यान आदिमें प्रायः
कहा करते थे कि अर्थनीति, राजनीति, दर्शन, साहित्य,
धर्म, इन सबको अलग-अलग देखनेसे काम नहीं चलेगा,
क्योंकि इनका आपसमे अंगांगी सम्बन्ध है। तथा एकको
भी बाद देनेसे जीवन पूर्ण नहीं हो सकता।
जिस दार्शनिक तत्वने उनके धर्म सम्बन्धी विरोधों-
का नाश किया था। उसीने उनके हृदयमे सबके प्रति स्नेह
उत्पन्न किया था। उन्होंने अपने जीवनका सामंजस्य कर
लिया था।
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