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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 174 में से

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पृष्ठ 169

तरुणके स्वप्न
होते हैं, मानव समाजमें भी उसी प्रकार भिन्न भिन्न
तरहकी संस्कृति विकसित होती है। प्रत्येक जातिकी
संस्कृतिका विकास होगा तो संसारकी मानव जातिकी
संस्कृतिका विकास होगा। राष्ट्रकी संस्कृतिका विकास
रोककर विश्वकी संस्कृतिका पूर्ण विकास नहीं किया
जा सकता। देशबन्धुका स्वदेश प्रेम विश्व प्रेमका अंग
था, किन्तु उन्होंने स्वदेश प्रेमको छोड़कर विश्वप्रेमी
बननेका प्रयास नहीं किया।
देशबन्धु अपने स्वदेश प्रेममें बंगालको भूल नहीं जाते
थे। अथवा बंगालके प्रेममें स्वदेशको नहीं भूल जाते थे
किन्तु उनका प्रेम बंगालकी सीमामें बद्ध नहीं था। महा-
राष्ट्रमें भी वे तिलक महाराजकी तरह प्रेम और सहानु-
भूति पाते थे।
देशबन्धुने कहा, बंगालको स्वराज्य संग्राममें अग्रणी
होना होगा। १६२० में बंगालने स्वराज्य आन्दोलनका
नेतृत्व खो दिया। किन्तु सन् १६२३ मे उसका नेतृत्व
उसे फिर मिल गया।
और एक बात देशबन्धु कहा करते थे कि भारतवर्ष-
का कोई आन्दोलन बंगालमें चलाना हो तो उसपर बंगाल
की छाप लगा लेना चाहिये। वे कहते, बंगालमें सत्याग्रह
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