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स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

१९८ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लो. २१
वस्तुतत्त्वं चोत्पादव्ययध्रौव्यात्मकम् । तथाहि सर्वं वस्तु द्रव्यात्मना नोत्पद्यते विपद्यते
वा, परिस्फुटमन्वयदर्शनात् । लूनपुनर्जातनखादिष्वन्वयदर्शनेन व्यभिचार इति न वाच्यम्,
प्रमाणेन बाध्यमानस्यान्वयस्यापरिस्फुटत्वात् । न च प्रस्तुतोऽन्वयः प्रमाणविरुद्धः सत्यप्रत्य-
भिज्ञानसिद्धत्वात् ।
“सर्वव्यक्तिषु नियतं क्षणे क्षणेऽन्यत्वमथ च न विशेषः ।
सत्योश्चित्यपचित्योराकृतिजातित्यवस्थानात्” ॥
इति वचनात् ॥
ततो द्रव्यात्मना स्थितिरेव सर्वस्य वस्तुनः । पर्यायात्मना तु सर्वं वस्तूत्पद्यते विपद्यते
च, अस्खलितपर्यायानुभवसद्भावात् । न चैवं शुक्ले शङ्खे पीतादिपर्यायानुभवेन व्यभिचारः, तस्य
स्खलद्रूपत्वात् । न खलु सोऽस्खलद्रूपो येन पूर्वाकारविनाशाजह

अन्य. यो. व्य. श्लोक २१ ] स्याद्वादमञ्जरी १९९
ननूत्पादादयः परस्परं भिद्यन्ते न वा ? यदि भिद्यन्ते, कथमेकं वस्तु त्रयात्मकम् ? न
भिद्यन्ते चेत्, तथापि कथमेकं त्रयात्मकम् ? तथा च
"यद्युत्पादादयो भिन्नाः कथमेकं त्रयात्मकम् ।
अथोत्पादादयोऽभिन्नाः कथमेकं त्रयात्मकम् "
इति चेत्, तदयुक्तं, कथञ्चिद्भिन्नलक्षणत्वेन तेषां कथञ्चिद्भेदाभ्युपगमात् । तथाहि-उत्पादविनाश-
ध्रौव्याणि स्याद् भिन्नानि, भिन्नलक्षणत्वात्, रूपादिवदिति । न च भिन्नलक्षणत्वमसिद्धम् ।
असत आत्मलाभः सतः सत्तावियोगः द्रव्यरूपतयानुवर्तनं च खलूत्पादादीनां परस्परमसंकीर्णानि
लक्षणानि सकललोकसाक्षिकान्येव ॥
न चामी भिन्नलक्षणा अपि परस्परानपेक्षाः, खपुष्पवदसत्त्वापत्तेः । तथाहि-उत्पादः केवलो
नास्ति, स्थितिविगमराहित्वात् कूर्मरोमवत् । तथा विनाशः केवलो नास्ति, स्थित्युत्पत्तिरहि-
तत्त्वात्, तद्वत् । एवं स्थितिः केवला नास्ति, विनाशोत्पादशून्यत्वात्, तद्वदेव । इत्यन्योऽन्या-
पेक्षाणामुत्पादादीनां वस्तुनि सत्त्वं प्रतिपत्तव्यम् । तथा चोक्तम्--
“घटमौलिसुवर्णार्थी नाशोत्पादस्थितिष्वयम् ।
शोकप्रमोदमाध्यस्थ्यं जनो याति सहेतुकम् ॥ १ ॥
पयोव्रतो न दध्यत्ति न पयोऽत्ति दधिव्रतः ।
अगोरसव्रतो नोभे तस्माद् वस्तु त्रयात्मकम् ॥ २ ॥१”
शंका-उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य परस्पर भिन्न हैं, या अभिन्न ? यदि उत्पाद आदि परस्पर भिन्न
हैं, तो वस्तुका स्वरूप उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य रूप नहीं कहा जा सकता । यदि वे परस्पर अभिन्न हैं, तो
तीनों एक रूप होनेसे तीन रूप कैसे हो सकते हैं ? कहा भी है--
“यदि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य परस्पर भिन्न हैं, तो वे तीन रूप नहीं कहे जा सकते । यदि उत्पाद
आदि अभिन्न हैं, तो उन्हें तीन रूप न मानकर एक ही मानना चाहिये ।”
समाधान--यह ठीक नहीं। क्योंकि हम लोग उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यमें कथंचित् भेद होनेसे
उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यमें कथंचित् भेद मानते हैं । तथाहि—उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य कथंचित् भिन्न
हैं, भिन्न लक्षणवाले होनेसे; रूप, रस, स्पर्श और गंधकी भाँति । यहाँ भिन्न लक्षणरूप हेतु असिद्ध नहीं
है । उत्पत्तिके पूर्व जिसका ( कथंचित् ) अभाव होता है उसका प्रादुर्भाव ( आत्मलाभ ), जो विद्यमान होता
है उसकी सत्ताका अभाव, तथा द्रव्य रूपसे अनुवर्तन—ये वस्तुतः उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यके परस्पर
असंकीर्ण लक्षण सभीके द्वारा जाने जाते हैं ।
उत्पाद आदि परस्पर भिन्न होकर भी एक दूसरेसे निरपेक्ष नहीं हैं । यदि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य
को एक दूसरेसे निरपेक्ष मानें, तो आकाश-पुष्पकी तरह उनका अभाव मानना पड़े । अतएव जैसे कछुवेकी
पीठपर बालोंके नाश और स्थितिके विना, बालोंका केवल उत्पाद होना संभव नहीं है, उसी तरह व्यय
और ध्रौव्यसे रहित केवल उत्पादका होना नहीं बन सकता । इसी प्रकार कछुवेके बालोंकी तरह उत्पाद
और ध्रौव्यसे रहित केवल व्यय, तथा उत्पाद और नाशसे रहित केवल स्थिति भी संभव नहीं है ।
अतएव एक दूसरेकी अपेक्षा रखनेवाले उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य रूप वस्तुका लक्षण स्वीकार करना चाहिये ।
कहा भी है--
“घड़े, मुकुट और सोनेके चाहनेवाले पुरुष घड़ेके नाश, मुकुटके उत्पाद, और सोनेकी स्थितिमें क्रमसे
शोक, हर्ष और माध्यस्थ भाव रखते हैं । तथा, ‘मैं दूध ही पीऊँगा’ इस प्रकारका व्रत रखनेवाला पुरुष सिर्फ
दूध ही पीता है, दही नहीं खाता; ‘मैं आज दही ही खाऊँगा’ इस प्रकारका नियम लेनेवाला पुरुष सिर्फ दही
१ आप्तमीमांसायां ५९,६०

२०० श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २२
इति काव्यार्थः ॥ २१ ॥
अथान्ययोगव्यवच्छेदस्य प्रस्तुतत्वात् आस्तां तावत्साक्षाद् भवान्, भवदीयप्रवचना-
वयवा अपि परतीर्थिकतिरस्कारबद्धकक्षा इत्याशयवान् स्तुतिकारः स्याद्वादन्यव्यवस्थापनाय प्रयोग-
मुपन्यस्यन् स्तुतिमाह—
अनन्तधर्मात्मकमेव तत्त्वमतोऽन्यथा सत्त्वमसूपपादम् ।
इति प्रमाणान्यपि ते कुवादिकुरङ्गसंत्रासनसिंहनादाः ॥ २२ ॥
तत्त्वं परमार्थभूतं वस्तु जीवाजीवलक्षणम् अनन्तधर्मात्मकमेव । अनन्तास्त्रिकाल-
विषयत्वाद् अपरिमिता ये धर्माः सहभाविनः क्रमभाविनश्च पर्यायाः । त एवात्मा स्वरूपं
यस्य तदनन्तधर्मात्मकम् । एवकारः प्रकारान्तरव्यवच्छेदार्थः । अत एवाह अतोऽन्यथा इत्यादि ।
ही खाता है, दूध नहीं पीता; और गोरसका व्रत लेनेवाला पुरुष दूध और दही दोनों नहीं खाता । अतः
प्रत्येक वस्तु उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य रूप है ।”
( यहाँ उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यको दृष्टांतसे समझाया गया है । एक राजाके एक पुत्र और एक पुत्री
थी । राजाकी पुत्रीके पास एक सोनेका घड़ा था, राजाके पुत्रने उस घड़ेको तुड़वा कर उसका मुकुट बनवा
लिया । घड़ेके नष्ट होनेपर ( व्यय ) राजाकी पुत्रीको शोक हुआ, मुकुटकी उत्पत्ति होनेसे ( उत्पाद ) राजाके
पुत्रको हर्ष हुआ, तथा राजा दोनों अवस्थाओंमें मध्यस्थ था ( ध्रौव्य ), इसलिये राजाको शोक और हर्ष दोनों
नहीं हुए । इससे मालूम होता है, कि प्रत्येक वस्तुमें उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य तीनों अवस्थायें मौजूद रहती
हैं । इसी प्रकार दूधका व्रती दही, और दहीका व्रती दूध, और गोरसका व्रती दही और दूध दोनों नहीं
खाता है । इसलिये प्रत्येक वस्तु तीनों रूप है ) ॥ यह श्लोकका अर्थ है ॥
भावार्थ—जैन दर्शनके अनुसार उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ही वस्तुका लक्षण है ( उत्पादव्यय-
ध्रौव्ययुक्तं सत् ) । वेदान्ती लोगोंके अनुसार, वस्तु तत्त्व सर्वथा नित्य, और बौद्धोंके अनुसार प्रत्येक वस्तु
सर्वथा क्षणिक है । परन्तु जैन लोगोंका मत है कि प्रत्येक वस्तुमें उत्पत्ति और नाश होते रहते हैं, इसलिये
पर्यायकी अपेक्षा वस्तु अनित्य है, तथा उत्पत्ति और नाश होते हुए भी हमें वस्तुकी स्थिरताका भान होता
है, अतएव द्रव्यकी अपेक्षा वस्तु नित्य है। अतएव जैन दर्शनमें प्रत्येक वस्तु कथंचित् नित्य, और कथंचित्
अनित्य स्वीकार की गई है । उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य परस्पर कथंचित् भिन्न होकर भी सापेक्ष हैं । जिस
प्रकार नाश और स्थितिके विना केवल उत्पाद संभव नहीं है, तथा उत्पाद और स्थितिके विना नाश संभव
नहीं है, उसी तरह उत्पाद और नाशके विना स्थिति भी संभव नहीं । अतएव उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यको
ही वस्तुका लक्षण मानना चाहिये ।
साक्षात् भगवान्‌की बात तो दूर रही, भगवान्‌के उपदेशके कुछ अंश ही कुवादियोंको पराजित करनेमें
समर्थ हैं, इसलिये स्तुतिकार स्याद्वादका प्रतिपादन करते हैं—
श्लोकार्थ—प्रत्येक पदार्थमें अनन्त धर्म मौजूद हैं, पदार्थमें अनन्त धर्म माने बिना वस्तुकी सिद्धि
नहीं होती । अतएव आपके प्रमाणवाक्य कुवादी रूप मृगोंको डरानेके लिये सिंहकी गर्जनाके समान हैं ।
व्याख्यार्थ—जीवरूप और अजीवरूप परमार्थभूत वस्तु अनन्तधर्मात्मक होती है । त्रिकालविषय
होनेसे जो धर्म अनन्त हैं वे सहभावी पर्याय (गुणरूप) और क्रमभावी पर्यायरूप होते हैं । सहभावी और
क्रमभावी पर्यायें जिसका स्वरूप होती हैं, वह वस्तु अनंतधर्मात्मक होती है । यहाँ 'एव' शब्द, अनंतधर्मात्मक
न होनेवालो वस्तुका परिहार करनेके लिये प्रयुक्त किया गया है। अतएव 'अतोऽन्यथा' इत्यादि शब्दोंका

Here is the line-by-line transcription of the text from the provided image:

अन्य. यो. व्य. श्लोक २२ ] स्याद्वादमञ्जरी २०१
अतोऽन्यथा उक्तप्रकारवैपरीत्येन । सत्त्वं वस्तुतत्त्वम् । असूपपादं सुखेनोपपाद्यते घटनाकोटि-
संटङ्कमारोप्यते इति सूपपादं । न तथा असूपपादं । दुर्घटमित्यर्थः । अनेन साधनं दर्शितम् ।
तथाहि—तत्त्वमिति धर्मि । अनन्तधर्मात्मकत्वं साध्यो धर्मः । सत्त्वान्यथानुपपत्तेरिति हेतुः,
अन्यथानुपपन्नत्वैकलक्षणत्वाद्धेतोः । अन्तर्व्याप्त्यैव$^१$ साध्यस्य सिद्धत्वाद् दृष्टान्तादिभिर्न प्रयो-
जनम् । यदनन्तधर्मात्मकं न भवति तत् सदपि न भवति, यथा वियदिन्दीवरम् इति केवल-
व्यतिरेकी हेतुः, साधर्म्यदृष्टान्तानां पक्षकुक्षिनिक्षिप्तत्वेनान्वयायोगात् ।
अनन्तधर्मात्मकत्वं च आत्मनि तावद् साकारानाकारोपयोगिता । कर्तृत्वं भोक्तृत्वं
प्रदेशाष्टकनिश्चलता अमूर्तत्वम् असंख्यातप्रदेशात्मकता जीवत्वमित्यादयः$^३$ सहभाविनो
प्रयोग किया गया है। 'अतोऽन्यथा' अर्थात् उक्त प्रकारसे विपरीत । 'सत्त्व' अर्थात् वस्तुका स्वरूप । 'सूपपादं'—
सुखसे प्राप्त करने योग्य । जो 'सूपपाद' नहीं, वह 'असूपपाद' अर्थात् दुर्घट । इसके द्वारा साधन प्रदर्शित किया
गया है। तथाहि—'तत्त्वं' यह धर्मी है । 'अनन्त धर्मात्मकत्व' यह साध्यभूत धर्म है । 'सत्त्वान्यथानुपपत्तेः' हेतु
है; क्योंकि अन्यथानुपपन्नत्व हेतुका लक्षण है। 'वस्तुतत्त्व (पक्ष) अनन्त धर्मात्मक (साध्य) है, क्योंकि
दूसरे प्रकारसे वस्तुतत्त्वकी सिद्धि नहीं होती (हेतु)'—यहाँ अन्तर्व्याप्तिसे साध्यकी सिद्धि होती है, इसलिये
उक्त हेतुमें दृष्टांतकी आवश्यकता नहीं है । (जहाँ साधनसाध्यसे व्याप्त होता है, अर्थात् जहाँ साध्य अपने
स्वरूपसे साधनमें होता है, उसे अन्तर्व्याप्ति कहते हैं । जिस समय प्रतिवादीको व्याप्ति संबंधका ज्ञान करते
समय व्याप्ति-संबंधका स्मरण होता है, उस समय प्रतिवादीको हेतुके सर्वत्र साध्य युक्त होनेका ज्ञान होता है,
और साथ ही अन्तर्व्याप्ति ज्ञानसे प्रतिवादीको यह भी ज्ञान होता है कि प्रस्तुत पक्षमें वर्तमान हेतु भी साध्यसे
युक्त है । दृष्टांतके विना पक्षके भीतर ही हेतुसे साध्यकी सिद्धि हो जाती है, इसलिये यहाँ पक्षके बाहर
दृष्टांतके द्वारा कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता ) । 'जो अनन्त धर्मात्मक नहीं होता, वह सत् भी नहीं होता, जैसे
आकाशका फूल' । आकाशके फूलमें अनन्त धर्म नहीं रहते, इसलिये वह सत् भी नहीं है । 'सत्त्वान्यथानुपपत्तेः'
यह हेतु केवलव्यतिरेकी है । जहाँ जहाँ साध्य नहीं रहता, वहाँ वहाँ साधन नहीं रहता । क्योंकि 'जहाँ-जहाँ
सत् है, वहाँ वहाँ अनन्त धर्म पाये जाते हैं' इस अन्वयव्याप्तिमें दिया जानेवाला प्रत्येक दृष्टांत पक्षमें ही
गर्भित हो जाता है। अतएव यहाँ अन्वयव्याप्ति न बताकर केवल व्यतिरेक व्याप्ति बताई गई है ।
ज्ञानोपयोग, दर्शनोपयोग, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, आठ मध्य प्रदेशोंकी स्थिरता, अमूर्तत्व, असंख्यात प्रदेशीपना
१. अन्तःपक्षमध्ये व्याप्तिः साधनस्य साध्याक्रान्तत्वमन्तर्व्याप्तिः । तयैव साध्यस्य गम्यस्य सिद्धेः प्रतीतेः ।
अयमर्थः । अन्तर्व्याप्तेः साध्यसंसिद्धिशक्तौ बाह्यव्याप्तेर्वर्णनं वन्ध्यमेव । साध्यसंसिद्ध्यशक्तौ बाह्यव्याप्ते-
र्वर्णनं व्यर्थमेव ।
२. तत्र सर्वकालं जीवाष्टमध्यप्रदेशाः निरपवादाः सर्वजीवानां स्थिता एव । केवलिनामपि अयोगिनां सिद्धानां
च सर्वे प्रदेशा स्थिता एव । व्यायामदुःखपरितापोद्रेकपरिणतानां जीवानां यथोक्ताष्टमध्यप्रदेशवर्जिता
इतरे प्रदेशा अवस्थिता एव । शेषाणां प्राणिनां स्थिताश्चास्थिताश्चेति । तत्त्वार्थराजवार्तिके पृ० २०३
३. जीवो उवओगमओ अमृत्ति कत्ता सदेहपरिमाणो ।
भोत्ता संसारत्थो सिद्धो सो विस्ससोड्ढगई ॥
छाया—जीवः उपयोगमयः अमूर्ति कर्त्ता स्वदेहपरिमाणः ।
भोक्ता संसारस्थः सिद्धः स विस्रसा ऊर्ध्वगतिः ॥ द्रव्यसंग्रहे २
जीवसिद्धिः चार्वाकं प्रति; ज्ञानदर्शनोपयोगलक्षणं नैयायिकं प्रति; अमूर्तजीवस्थापनं भट्टचार्वा-
कद्वयं प्रति; कर्मकर्तृत्वस्थापनं सांख्यं प्रति; स्वदेहप्रमितिस्थापनं नैयायिकमीमांसकसांख्यत्रयं प्रति; कर्म-
भोक्तृत्वव्याख्यानं बौद्धं प्रति; संसारस्य व्याख्यानं सदाशिवं प्रति; सिद्धत्वव्याख्यानं भट्टाचार्वाकद्वयं प्रति;
ऊर्ध्वगतिस्वभावकथनं माण्डलिकग्रन्थकारं प्रति, इति मतार्थो ज्ञातव्यः । द्रव्यसंग्रहवृत्तौ ।
२६

२०२ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २२
धर्माः। हर्षविषादशोकसुखदुःखदेवनरनारकतियंक्तवादयस्तु क्रमभाविनः। धर्मास्तिकाया-
दिष्वपि असंख्येयप्रदेशात्मकत्वम् गत्याद्युपग्रहकारित्वम्¹ मत्यादिज्ञानविषयत्वम् तत्तदवच्छेद-
कावच्छेदत्वम् अवस्थितत्वम् अरूपित्वम् एकद्रव्यत्वम् निष्क्रियत्वमित्यादयः । घटे पुनरामत्वम्
पाकजरूपादिमत्त्वम् पृथुबुध्नोदरत्वम् कम्बुग्रीवत्वम् जलादिधारणाहरणसामर्थ्यम् मत्यादि-
ज्ञानज्ञेयत्वम् नवत्वम् पुरातनत्वमित्यादयः । एवं सर्वपदार्थेष्वपि नानानयमताभिज्ञेन शाब्दा-
नार्थांश्च पर्यायान् प्रतीत्य वाच्यम् ॥

और जीवत्व इत्यादि आत्माके सहभावी धर्म हैं । [ जो धर्म सदा द्रव्यके साथ रहते हैं, उन्हें सहभावी धर्म
कहते हैं । सहभावी धर्म गुण भी कहे जाते हैं। ( १ ) व्यवहार नयकी अपेक्षा साकार ज्ञानोपयोग और निरा-
कार दर्शनोपयोग जीवका लक्षण है । ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग जीवसे कभी अलग नहीं होते । चक्षु,
अचक्षु, अवधि और केवलदर्शनके भेदसे दर्शनोपयोग चार, और मति, श्रुति अवधि, मनःपर्यय, केवल, कुमति,
कुश्रुति, और कुवधि ज्ञानके भेदसे ज्ञानोपयोग आठ प्रकारका है। निश्चय नयसे शुद्ध अखंड केवलज्ञान ही
जीवका लक्षण है। नैयायिक लोग ज्ञान और दर्शनको आत्माका स्वभाव न मानकर उन्हें आत्माके साथ
समवाय संबंधसे संबद्ध मानते हैं, इसलिये जीवको उपयोग रूप बताया है। ( २ ) जीव कर्ता है। जीव
सांख्योंके पुरुषकी तरह कर्मोंसे निर्लिप्त होकर केवल द्रष्टाकी तरह नहीं रहता, किन्तु ज्ञानावरण आदि कर्मोंका
स्वयं करनेवाला निमित्तकर्ता है। यहाँ सांख्य मतके निराकरणके लिये जीवको कर्ता बताया गया है। ( ३ )
यह जीव सुख-दुख रूप कर्मोंके फलका भोग करता है । क्षणिकवादी बौद्धोंके मतमें जो कर्ता है, वह भोक्ता
नहीं हो सकता, इसलिये जीवको भोक्ता कहा गया है। ( ४ ) जीवके आठ मध्यप्रदेश सदा एकसे अवस्थित
रहते हैं। अयोगकेवली और सिद्धोंके सम्पूर्ण प्रदेश स्थिर रहते हैं। व्यायाम दुख, परिताप आदिसे युक्त
जीवोंके आठ प्रदेशोंके अतिरिक्त बाकीके प्रदेश प्रवृत्तिशोल होते हैं। शेष जीवोंके प्रवृत्ति और अप्रवृत्ति दोनों
रूप प्रदेश होते हैं। ( ५ ) यह जीव स्पर्श, रस, गन्ध और वर्णसे रहित है, इसलिये निश्चय नयसे अमूर्त
है। ( ६ ) जीव लोकाकाशके बराबर असंख्यात प्रदेशोंका धारक है । वास्तवमें जैन दर्शनके अनुसार नैयायिक,
मीमांसक आदि दर्शनोंकी तरह जीवको प्रदेशोंकी अपेक्षा व्यापक नहीं माना, किन्तु जैन दर्शनमें ज्ञानकी
अपेक्षा व्यवहार नयसे व्यापक कहा है।² ( ७ ) जीवमें जीवत्व जीवका पारिणामिक ( स्वाभाविक ) भाव है।
व्यवहार नयसे दस प्राण, और निश्चय नयसे चेतना जीवका जीवत्व है । ] हर्ष विषाद, शोक, सुख, दुख,
देव, मनुष्य, नारक, तिर्यंच आदि अवस्था जीवके क्रमभावी अर्थात् क्रमसे उत्पन्न और नष्ट होनेवाले धर्म हैं।
(क्रमभावी धर्मोंका दूसरा नाम पर्याय भी है।) (१) धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय प्रत्येक द्रव्यमें असंख्यात
प्रदेश ( अविभाज्य अंश ) होते हैं। ( २ ) जिस प्रकार जल मछलीके चलानेमें सहायता करता है, और
वृक्षकी छाया पथिकके ठहरानेमें निमित्त होती है, उसी तरह धर्म गतिशील पदार्थोंकी गतिमें, और अधर्म
ठहरनेवाले पदार्थोंकी स्थितिमें निमित्त कारण होते हैं। ( ३ ) धर्म और अधर्म मति, श्रुति आदि ज्ञानोंसे
निश्चित किये जाते हैं। ( ४ ) धर्म और अधर्म अपने स्वरूपको छोड़कर पररूप नहीं होते, इसलिये परस्पर
मिश्रण न होनेसे अवस्थित हैं। ( ५ ) धर्म और अधर्म स्पर्श आदिसे रहित होनेसे अरूपी हैं। ( ६ ) एक
व्यक्तिरूप होनेसे एक हैं, तथा ( ७ ) क्रिया रहित होनेसे निष्क्रिय हैं। इसी प्रकार घड़ेमें कच्चापन, पक्कापन,
मोटापन, चौड़ापन, कम्बुग्रीवापन ( शंख जैसी गर्दन ) जलधारण, जलआहरण, ज्ञेयपन, नयापन, पुरानापन
आदि अनन्त धर्म रहते हैं। अतएव नाना नयोंकी दृष्टिसे शब्द और अर्थकी अपेक्षा प्रत्येक पदार्थमें अनन्त धर्म
विद्यमान हैं।

१. नित्यावस्थितान्यरूपणि । आ आकाशादेकद्रव्याणि । निष्क्रियाणि च । असंख्येयाः प्रदेशाः धर्माधर्मयोः ।
गतिस्थित्युपग्रहो धर्माधर्मयोरुपकारः। तत्त्वार्थाधिगमभाष्ये पंचमाध्याये सूत्राणि ।
२. देखिये द्रव्यसंग्रहवृत्ति गा. १० ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक २२ ] स्याद्वादमञ्जरी २०३
अत्र चात्मशब्देनानन्तेष्वपि धर्मेष्वनुवृत्तिरूपमन्वयिद्रव्यं ध्वनितम् । ततश्च “उत्पाद-
व्ययध्रौव्ययुक्तं सत्” इति व्यवस्थितम् । एवं तावदर्थेषु । शब्देष्वपि उदात्तानुदात्तस्वरितविवृत-
संवृतघोषवदघोषतालप्राणमहाप्राणतादयः तत्तदर्थप्रत्ययनशक्त्यादयश्चावसेयाः । अस्य हेतो-
रसिद्धविरुद्धानैकान्तिकत्वादिकण्टकोद्धारः स्वयमभ्यूह्यः । इत्येवमुल्लेखशेखराणि ते तव प्रमा-
णान्यपि न्यायोपपन्नसाधनवाक्यान्यपि । आस्तां तावद् साक्षात्कृतद्रव्यपर्यायनिकायो भवान् ।
यावदेतान्यपि कुवादिकुरङ्गसन्त्रासनसिंहनादाः कुवादिनः कुत्सितवादिनः । एकांशग्राहकनया-
नुयायिनोऽन्यतीर्थिकास्त एव संसारवनगहनवसनव्यसनितया कुरङ्गा मृगास्तेषां सम्यक्त्रासने
सिंहनादा इव सिंहनादाः । यथा सिंहस्य नादमात्रमप्याकर्ण्य कुरङ्गास्त्रासमासूत्रयन्ति, तथा
भवत्प्रणीतैवंप्रकारप्रमाणवचनान्यपि श्रुत्वा कुवादिनस्त्रस्तामश्नुवते प्रतिवचनप्रदानकातरतां
बिभ्रतीति यावत् । एकैकं त्वदुपज्ञं प्रमाणमन्ययोगव्यवच्छेदकमित्यर्थः ॥
अत्र प्रमाणानि इति बहुवचनमेवंजातीयानां प्रमाणानां भगवच्छासने आनन्त्यज्ञाप-
नार्थम्, एकैकस्य सूत्रस्य सर्वोदधिसलिलसर्वसरिद्वालुकानन्तगुणार्थत्वात् तेषां च सर्वेषामपि
सर्वविन्मूलतया प्रमाणत्वात् । अथवा “इत्यादिवहुवचनान्ता गणस्य संसूचका भवन्ति” इति
न्यायाद् इतिशब्देन प्रमाणबाहुल्यसूचनात् पूर्वार्द्धे एकस्मिन् अपि प्रमाणे उपन्यस्ते उचितमेव
बहुवचनम् ॥ इति काव्यार्थः ॥२२॥
अनन्तरमनन्तधर्मात्मकत्वं वस्तुनि साध्यं मुकुलितमुक्तम् । तदेव सप्तभङ्गीप्ररूपणद्वारेण
प्रपञ्चयन् भगवतो निरतिशयं वचनातिशयं च स्तुवन्नाह—
'अनन्त धर्मात्मक' शब्दमें आत्मा शब्दसे अनंत पर्यायोंमें रहनेवाले नित्य द्रव्यका सूचन होता हैं ।
अतएव “उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ही 'सत्' का लक्षण है।” पदार्थोंकी तरह शब्दोंमें भी उदात्त, अनुदात्त,
स्वरित, विवृत, संवृत, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण आदि तथा पदार्थोंके ज्ञान करानेकी शक्ति आदि अनन्त
धर्म पाये जाते हैं । 'तत्त्वं अनंतधर्मात्मकं सत्त्वान्यथानुपपत्तेः' इस अनुमानमें जो 'सत्त्वान्यथानुपपत्तेः' हेतु
दिया गया है उसके असिद्धत्व, विरुद्धत्व, अनैकांतिकत्व आदि दोषोंके परिहार पर स्वयं विचार करना चाहिये ।
हे भगवन् ! आपकी बात तो दूर रही, आपके न्याययुक्त वचन ही कुवादीरूपी हरिणोंको संत्रस्त करनेके लिये
सिंहकी गर्जनाके समान हैं। जिस प्रकार सिंहकी गर्जनाको सुनकर जंगलके हरिण भयभीत होते हैं, उसी
प्रकार आपके स्याद्वादका निरूपण करनेवाले वचनोंको सुनकर वस्तुके केवल अंशमात्रको ग्रहण करनेवाले,
संसाररूपी गहन वनमें फिरनेवाले कुवादी लोग संत्रस्त होते हैं ।
एक एक विषयको खंडन करनेवाले बहुतसे प्रमाणोंका सूचन करनेके लिये श्लोकमें 'प्रमाणानि'
बहुवचन दिया है; क्योंकि भगवान्‌के प्रत्येक सूत्र सम्पूर्ण समुद्रोंके जलसे और सम्पूर्ण नदियोंकी बालुकासे भी
अनंतगुने हैं और वे सम्पूर्ण सूत्र सर्वज्ञ भगवान्‌के कहे हुए हैं, इसलिए प्रमाण हैं । अथवा “इति, आदि बहु
वचनवाले शब्दसमूहके सूचक होते हैं” इस न्यायसे 'इति' शब्दसे बहुतसे प्रमाणोंका सूचन होता है, अतएव
श्लोकके पूर्वार्धमें एक प्रमाणका उल्लेख करनेपर भी बहुवचन समझना चाहिये ॥ यह श्लोका अर्थ है ॥२२॥
भावार्थ—इस श्लोकमें प्रत्येक वस्तुको अनंत धर्मवाली सिद्ध किया गया है । जैन सिद्धांतके अनुसार
यदि पदार्थोंमें अनंत धर्म स्वीकार न किये जांय, तो वस्तुकी सिद्धि नहीं हो सकती अतएव, 'प्रत्येक वस्तु अनन्त
धर्मात्मक है, क्योंकि वस्तुमें अनंत धर्म माने बिना वस्तुमें वस्तुत्व सिद्ध नहीं हो सकता । जो अनन्त धर्मात्मक
नहीं होता, वह सत् भी नहीं होता। जैसे आकाश।' अतएव जीव, अजीव, धर्म, अधर्म, आकाश और काल सम्पूर्ण
द्रव्योंमें अनन्त धर्म स्वीकार करने चाहिये ।
वस्तुमें अनन्त धर्म होते हैं, इसीको सात भंगों द्वारा प्ररूपण करते हुए भगवान्‌के निरतिशय वचनाति-
शयकी स्तुति करते हुए कहते हैं—

२०४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २३
अपर्ययं वस्तु समस्यमानमद्रव्यमेतच्च विविच्यमानम् ।
आदेशभेदोदितसप्तभङ्गमदीदृशस्त्वं बुधरूपवेद्यम् ॥२३॥
समस्यमानं संक्षेपेणोच्यमानं वस्तु अपर्ययम् अविवक्षितपर्यायम् । वसन्ति गुणपर्याया
अस्मिन्निति वस्तु धर्माधर्माकाशपुद्गलकालजीवलक्षणं द्रव्यषट्कम्¹ । अयमभिप्रायः । यदैक-
मेव वस्तु आत्मघटादिकं चेतनाचेतनं सतामपि पर्यायाणामविवक्षया द्रव्यरूपमेव वस्तु वक्तु-
मिष्यते । तदा संक्षेपेणाभ्यन्तरीकृतसकलपर्यायनिकायतवलक्षणेनाभिधीयमानत्वात् अपर्यय-
मित्युपदिश्यते । केवलद्रव्यरूपमेव इत्यर्थः । यथात्मायं घटोऽयमित्यादि, पर्यायाणां द्रव्यानति-
रेकात् । अतएव द्रव्यास्तिकनयाः शुद्धसंग्रहादयो द्रव्यमात्रमेवेच्छन्ति पर्यायाणां तदविष्वग्भूत-
त्वात् । पर्ययः पर्यवः पर्याय इत्यनर्थान्तरम् । अद्रव्यमित्यादि । चः पुनरर्थे । स च पूर्वस्माद्
विशेषद्योतने भिन्नक्रमश्च । विविच्यमानं चेति विवेकेन पृथग्रूपतयोच्यमानं पुनरेतद् वस्तु
अद्रव्यमेव । अविवक्षितान्वयिद्रव्यं केवलपर्यायरूपमित्यर्थः ॥
यदा ह्यात्मा ज्ञानदर्शनादीन् पर्यायानधिकृत्य प्रतिपर्यायं विचार्यते, तदा पर्याया एव
श्लोकार्थ—सहभावी और क्रमभावी पर्यायोंसे युक्त होनेपर भी संक्षेपमें कथन किये जाने पर
जिसकी पर्यायें गौण होती हैं, और विस्तारसे कथन किये जानेपर जिसकी पर्यायोंकी मुख्यता होती है, तथा
सकलादेश ( प्रमाण ) और विकलादेश ( नय ) के भेदसे जिसके सात अंगोंका प्ररूपण किया गया है, ऐसी
पंडितों द्वारा समझने योग्य वस्तुका, हे भगवन् ! आपने ही प्रतिपादन किया है ।
व्याख्यार्थ—जब वस्तुका कथन संक्षेपमें किया जाता है, तब उसकी पर्याय विवक्षित नहीं होती—
वे गौण होती हैं। जिसमें गुण और पर्यायें रहती हैं, वह वस्तु धर्म, अधर्म, आकाश, पुद्गल, काल और
जीव--इन छह द्रव्यों [देखिये परिशिष्ट (क)] में विभक्त की जाती है। ( कोई आचार्य कालको पृथक् द्रव्य नहीं
मानते । उनके .मतमें पांच ही द्रव्य हैं) अभिप्राय यह है—चेतनात्मक आत्मरूप और अचेतनात्मक घट
आदि रूप एक ही वस्तुकी पर्यायोंके विद्यमान होने पर भी, उन पर्यायोंके कथन करनेकी इच्छा न होनेसे—
उन्हें गौण कर देनेसे—द्रव्यमात्र रूप वस्तुका कथन करना ही इष्ट होता है । अतएव संक्षेपसे प्रतिपादित
समस्त पर्यायसमूहके अन्तर्भाव होनेसे 'अपर्यय' शब्दका प्रयोग किया गया है। 'अपर्यय'का अर्थ है केवल
द्रव्यरूप । उदाहरणके लिये, 'यह आत्मा है', 'यह घट है'—कहने पर, आत्मा और घटकी पर्यायें विद्यमान
होनेपर भी, उनके आत्मा और घटसे भिन्न न होनेके कारण, उनका निर्देश नहीं किया जाता; क्योंकि वे
विवक्षित नहीं हैं। अतएव द्रव्यास्तिक नयरूप शुद्ध संग्रह आदि नयोंको अपने विषयरूपसे द्रव्यमात्र ही इष्ट
होता है, क्योंकि पर्यायें द्रव्यसे भिन्न नहीं होतीं । 'पर्यय', 'पर्यव' 'पर्याय' शब्द पर्यायवाची हैं। जब
पर्यायोंका द्रव्यसे भिन्नरूपसे कथन किया जाता है तब अन्वयि द्रव्यकी विवक्षा न होनेसे वस्तु केवल पर्याय-
रूप होती है ।
जिस समय आत्माकी ज्ञान, दर्शन आदि पर्यायोंकी मुख्यतासे आत्माका विचार किया जाता है,
१. केषांचिदाचार्याणां मते पंचास्तिकाया एव । कालो द्रव्यं पृथग् नास्ति । जीवादिष्वस्त्रपि कदाचित् काल-
शब्देन उच्यते । तथा चागमः । “किमयं भंते, कालोत्ति पवुच्चइ, गोयमा ! जीवा चेव अजीवा चेवत्ति” ।
अन्ये तु आचार्याः संगिरन्ते । अस्ति धर्मास्तिकायादिद्रव्यपंचकव्यतिरिक्तम् अर्द्धतृतीयद्वीपसमुद्रान्तर्वर्ति षष्ठं
कालद्रव्यं, यन्निबन्धना एते ह्यः श्व इत्यादयः प्रत्ययाः शब्दाश्च प्रादुर्भवन्ति । आगमश्च । “कइ णं भंते
दव्वा पण्णत्ता ? गोयमा ! छ दव्वा पण्णत्ता । तं जहा-धम्मत्थिकाये अधम्मत्थिकाइए, आगासत्थिकाइए, पुग्ग-
लत्थिकाइए जीवत्थिकाइए अद्धासमये य” । हरिभद्रकृतधर्मसंग्रहिण्यां मलयगिरिटीकायां गा. ३२

अन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] . स्याद्वादमञ्जरी २०५
प्रतिभासन्ते, न पुनरात्माख्यं किमपि द्रव्यम् । एवं घटोऽपि कुण्डलौष्ठपृथुबुध्नोदरपूर्वापरादि-
भागाद्यवयवापेक्षया विविच्यमानः पर्याया एव, न पुनर्धटाख्यं तदतिरिक्तं वस्तु । अतएव
पर्यायास्तिकनयानुपातिनः पठन्ति—
“भागा एव हि भासन्ते संनिविष्टास्तथा तथा ।
तद्वान्नैव पुनः कश्चिन्निर्भागः संप्रतीयते” ॥
इति । ततश्च द्रव्यपर्यायोभयात्मकत्वेऽपि वस्तुनो द्रव्यनयार्पणया पर्यायनयानर्पणया च द्रव्य-
रूपता, पर्यायनयार्पणया द्रव्यनयानर्पणया च पर्यायरूपता, उभयनयार्पणया च तदुभयरूपता ।
अत एवाह वाचकमुख्यः “अर्पितनर्पितासिद्धेः”१ इति । एवंविधं द्रव्यपर्यायात्मकं वस्तु त्वमेवा-
दीदृशस्त्वमेव दर्शितवान् नान्य इति काक्वावधारणावगतिः ॥
नन्वन्वेकाभिधानप्रत्यययोग्यं द्रव्यम्, अन्याभिधानप्रत्ययविषयाश्च पर्यायाः । तत्कथ-
मेकमेव वस्तूभयात्मकम् ? इत्याशङ्क्य विशेषणद्वारेण परिहरति आदेशभेदेत्यादि । आदेशभेदेन
सकलादेशविकलादेशलक्षणेन आदेशद्वयेन उदिताः प्रतिपादिताः सप्तसंख्या भङ्गा वचनप्रकारा
यस्मिन् वस्तुनि तत्तथा । ननु यदि भगवता त्रिभुवनवन्धुना निर्विशेषतया सर्वेभ्य एवंविधं
वस्तुतत्त्वमुपदर्शितम्, तर्हि किमर्थं तीर्थान्तरीयाः तत्र विप्रतिपद्यन्ते ? इत्याह बुधरूपवेद्यम्
इति । बुध्यन्ते यथावस्थितं वस्तुतत्त्वं सारेतरविषयविभागविचारणया इति बुधाः । प्रकृष्टाः
बुधाः बुधरूपाः नैसर्गिकाधिगमिकान्यतरसम्यग्दर्शनविशदीकृतज्ञानशालिनः प्राणिनः । तैरेव
उस समय केवल ज्ञान, दर्शन आदि पर्यायोंका ही ज्ञान होता है, आत्मा कोई भिन्न पदार्थ दृष्टिगोचर नहीं
होता । इसी प्रकार जब हम घटके मोटेपन, गोलपन, पूर्वभाग, अपरभाग आदि अवयवोंको देखते हैं, उस
समय हमें घट द्रव्यका अलग ज्ञान न होकर घटकी पर्यायोंका ही ज्ञान होता है । अतएव पर्यायास्तिक नयको
माननेवाले कहते हैं—
“उस प्रकारसे पारस्परिक घनिष्ठ संयोगको प्राप्त अंश-अवयव-ही प्रतिभासित होते हैं । अंशवान्
पदार्थ ही प्रतिभासित होता है, कोई निरंश द्रव्य दिखाई ही नहीं देता ।”
अतएव प्रत्येक वस्तुके द्रव्य, पर्याय और उभयरूप होनेपर भो द्रव्यनयकी मुख्यतासे और पर्याय-
नयकी गौणतासे वस्तुका ज्ञान द्रव्यरूप, पर्यायनयकी मुख्यता और द्रव्यनयकी गौणतासे वस्तुका ज्ञान पर्याय
रूप, तथा द्रव्य और पर्याय दोनोंकी प्रधानतासे वस्तुका ज्ञान उभयरूप होता है । वाचकमुख्य उमास्वातिने
कहा भी है—‘‘द्रव्य और पर्यायकी मुख्यता और गौणतासे वस्तुकी सिद्धि होती है ।” वस्तुका यह द्रव्य और
पर्यायरूप स्वरूप आपने ( जिन भगवान्ने ) ही प्ररूपण किया है, दूसरे किसीने नहीं । यहाँ अवधारणाका ज्ञान
काकुसे होता है ।
शंका—द्रव्य और पर्याय दोनों भिन्न-भिन्न अभिधान और भिन्न-भिन्न ज्ञानके विषय होते हैं अतएव
एक वस्तुको द्रव्य और पर्याय दोनों रूप नहीं कह सकते । समाधान—इस शंकाका परिहार 'आदेशभेद'
विशेषणसे किया गया है । हमलोग सकल और विकल आदेशके भेदसे द्रव्य और पर्यायरूप वस्तुको मानते
हैं । इसी सकलादेश ( प्रमाण ) और विकलादेश ( नय ) के ऊपर सप्तभंगी नय अवलम्बित है । शंका—
यदि तीनों लोकोंके बन्धु जिन भगवान्ने प्रत्येक वस्तुका सामान्य रूपसे सब लोगोंके लिये सप्तभंगो द्वारा
विवेचन किया है, तो अन्य वादी लोग सप्तभंगीके सिद्धांतको क्यों नहीं मानते ? समाधान—सप्तभंगी नयके
सूक्ष्म तत्त्वको निसर्गज और अधिगमज सम्यग्दर्शनसे विशुद्ध उत्कृष्ट विद्वान हो समझ सकते हैं । केवल अपने
१. तत्त्वार्थाधिगमसूत्रे ५-३२ ।

२०६ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २३
वेदितुं शक्यं वेद्यं परिच्छेद्यम्, न पुनः स्वस्वशास्त्रतत्त्वाभ्यासपरिपाकशाणानिशातबुद्धिभिर-
प्यन्यैः, तेषामनादिमिथ्यादर्शनवासनादूषितमतितया यथावस्थितवस्तुतत्त्वानवबोधेन बुधरू-
पत्वाभावात् । तथा चागमः—
“सदसदविसेसणाउ भवहेउजहेउजहिद्विओवलंभाउ ।
णाणफलाभावाउ मिच्छादिट्ठिस्स अण्णाणं”१ ॥
अतएव तत्परिगृहीतं द्वादशाङ्गमपि मिथ्याश्रुतमामनन्ति, तेषामुपपत्तिनिरपेक्षं
यदृच्छया वस्तुतत्त्वोपलम्भसंरम्भात् । सम्यग्दृष्टिपरिगृहीतं तु मिथ्याश्रुतमपि सम्यक्श्रुततया
परिणमति । सम्यग्दृशां सर्वविदुपदेशानुसारिप्रवृत्तितया मिथ्याश्रुतोक्तस्याप्यर्थस्य यथावस्थित-
विधिनिषेधविषयतयोन्नयनात् । तथाहि किल वेदे “अजै

अन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] स्याद्वादमञ्जरी २०७
प्रतिभासमाना अपि तद्द्वयव्यवस्थापकतया१ व्याख्याताः । तथा स्मार्ता अपि—
“न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने ।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला”२ ॥
इति श्लोकं पठन्ति । अस्य च यथाश्रुतार्थव्याख्यानेऽसम्बद्धप्रलाप एव । यस्मिन् हि अनुष्ठीय-
माने दोषो नास्त्येव तस्मान्निवृत्तिः कथमिव महाफला भविष्यति, इज्याध्ययनदानादेरपि
निवृत्तिप्रसङ्गात् । तस्माद् अन्यद् एदंपर्यमस्य श्लोकस्य । तथाहि । न मांसभक्षणे कृतेऽदोषः
अपि तु दोष एव । एवं मद्यमैथुनयोरपि । कथं नादोष इत्याह । यतः प्रवृत्तिरेषा भूतानाम् ।
प्रवर्तन्त उत्पद्यन्तेऽस्यामीति प्रवृत्तिरुत्पत्तिस्थानम् । भूतानां जीवानाम् तत्तज्जीवसंसक्तिहेतु-
रित्यर्थः ॥
प्रसिद्धं च मांसमद्यमैथुनानां जीवसंसक्तिमूलकारणत्वमागमे—
न प्रेत्यसंज्ञास्ति ) आदि ऋचाओंका ( महावीर स्वामीके गणधर बननेसे पहले ) श्रीइन्द्रभूति आदि वैदिक
विद्वान जीव आदिका निषेध करते थे, परन्तु महावीर भगवान्ने उक्त वाक्यका “ज्ञान पाँच भूतोंके निमित्तसे
कथंचित् उत्पन्न होता है, और पाँच भूतोंमें परिवर्तन होनेसे ज्ञानमें परिवर्तन होता है, अतएव ज्ञानकी पूर्व
संज्ञा नहीं रहती” यह अर्थ करके जीव आदिकी सिद्धि की है । ( ग ) स्मार्त लोगोंका कहना है—
“न मांस खानेमें दोष है, न मद्य और मैथुन सेवन करनेमें पाप है, क्योंकि यह प्राणियोंका स्वभाव
है । हाँ, यदि मांस आदिसे निवृत्ति हो सके, तो इससे महान् फल होता है” ( न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये
न च मैथुने । प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ) ।
परन्तु ये वाक्य केवल प्रलाप मात्र हैं । कारण कि यदि मांस आदिके भक्षणमें दोष नहीं है, तो
उनसे निवृत्त होना महान् फल नहीं कहा जा सकता । यदि मांस आदिके सेवन करनेपर भी दोष न मानकर
उनसे निवृत्त होनेको महान् फल माना जाय, तो पूजा, अध्ययन, दान आदिके अनुष्ठानसे निवृत्त होनेको
भी महान् फल कहना चाहिये । अतएव “मांसके भक्षण करनेमें पुण्य (अदोष) नहीं है (न मांसभक्षणेऽदोषो),
तथा मद्य और मैथुन सेवन करनेमें भी दोष है, क्योंकि मांस, मद्य और मैथुन जीवोंकी उत्पत्तिके स्थान
हैं ( प्रवृत्तिः-उत्पत्तिस्थानं एषा भूतानाम् ) । अतएव इनसे निवृत्त होना चाहिये”—यह श्लोकका अर्थ
करना चाहिये ।
आगममें भी मांस, मद्य और मैथुनको जीवोंकी उत्पत्तिका स्थान बताया है—
१. नतूच्छेदाभिधानमेतत् ‘एतेभ्यो भूतेभ्यो समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्यसंज्ञास्ति’ (बृह० २-४-१२)
इति, कथमेतदभेदाभिधानम् । नैष दोषः । विशेषविज्ञानविनाशाभिप्रायमेतद्विनाशाभिधानं नात्मोच्छेदाभि-
प्रायम् । ‘अत्रैव मा भगवान्मूमुहन्न प्रेत्य संज्ञास्ति’ इति पर्यनुयुज्य स्वयमेव श्रुत्यर्थान्तरस्य दर्शितत्वात्—
‘न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति’ इति । एतदुक्तं
भवति । कूटस्थनित्य एवायं विज्ञानघन आत्मा नास्योच्छेदप्रसंगोऽस्ति । मात्राभिस्त्वस्य भूतेन्द्रियलक्षणा-
भिरविद्याकृताभिरसंसर्गो विद्यया भवति । संसर्गाभावे च तत्कृतस्य विशेषज्ञानस्याभावान्न प्रेत्य संज्ञा-
स्तीत्युक्तमिति । ब्रह्मसूत्रशांकरभाष्ये १-४-२२ । अत्र हेमचन्द्रकृतत्रिषष्टिशलाकापुरुषचरितम् ( १०-५-
७७, ७८ ) हरिभद्रीयावश्यकवृत्तिश्च विलोकनीया ।
२. मनुस्मृतौ ५-५६

२०८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २३
“आमोसु य पक्कासु य विपच्चमाणासु मंसपेसीसु।
आयंतिअमुववाओ भणिओ उ णिगोअजीवाणं ॥ १॥
मज्जे मधुम्मि मंसम्मि णवणीअम्मि चउत्थए।
उप्पज्जंति अणंता तन्वण्णा तत्थ जंतूणो ॥ २॥
मेहुणसण्णारूढो णवलक्ख हणेइ सुहुमजीवाणं।
केवलिणा पण्णत्ता सदहिअव्वा सया कालं ॥ ३ ॥”२
तथाहि—
“इत्थीजोणीए संभवंति बेइंदिया उ जे जीवा।
इक्को व दो व तिण्णि व लक्खपुहुत्तं उ उक्कोसं ॥ ४ ॥
पुरिसेण सह गयाए तेसिं जीवाण होइ उद्दवणं।
वेणुगदिट्ठंतेणं तत्तायसलागणाएणं ॥ ५॥”
संसक्तायां योनौ द्वींद्रिया एते। शुक्रशोणितसंभवास्तु गर्भजपञ्चेन्द्रिया इमे ।
“पंचिंदिया मणुस्सा एगनरभुत्तारिगब्भम्मि।
उक्कोसं णवलक्खा जायंति एगवेलाए ॥ ६ ॥
णवलक्खाणं मज्झे जायइ इक्कस्स दोण्ह य समत्ती।
सेसा पुण एमेव य विलयं वच्चंति तत्थेव ॥ ७॥”
“कच्चे, पक्के और अग्निमें पकाये हुए मांसकी प्रत्येक अवस्थाओंमें अनन्त निगोद जीवोंकी उत्पत्ति
होती रहती है ॥ १ ॥
मद्य, मधु, मांस और मक्खनमें मद्य, मधु, मांस और मक्खनके रंगके अनंत जीवोंकी उत्पत्ति
होती है ॥ २ ॥
केवली भगवान्ने मैथुनके सेवन करनेमें नौ लाख जीवोंका घात बताया है, इसमें सदा विश्वास
करना चाहिये ॥ ३ ॥”
तथा—
स्त्रियोंकी योनिमें दो इन्द्रिय जीव उत्पन्न होते हैं। इन जीवोंकी संख्या एक, दो, तीनसे लगा कर
लाखों तक पहुँच जाती है ॥ ४ ॥
जिस समय पुरुष स्त्रीके साथ संभोग करता है, उस समय जैसे अग्निसे तपाई हुई लोहेकी सलाईको
बाँसको नलीमें डालनेसे नलीमें रखे हुए तिल भस्म हो जाते हैं, वैसे ही पुरुषके संयोगसे योनिमें रहनेवाले
सम्पूर्ण जीवोंका नाश हो जाता है ॥ ५ ॥”
अब रज और वीर्यसे उत्पन्न होनेवाले गर्भज पंचेन्द्रिय जीवोंकी संख्या कहते हैं—
पुरुष और स्त्रीके एक बार संयोग करनेपर स्त्रीके गर्भमें अधिकसे अधिक नौ लाख पंचेन्द्रिय जीव .
उत्पन्न होते हैं ॥ ६ ॥
इन नौ लाख जीवोंमें एक या दो जीव जीते हैं, बाकी सब जीव नष्ट हो जाते हैं ॥ ७ ॥”
१. रत्नशेखरसूरिकृतसम्बोधसप्ततिकायां ६६, ६५, ६३ ।
२. छाया-आमासु च पक्वासु च विपच्यमानासु मांसपेशोषु । आत्यन्तिकमुपपादो भणितस्तु निगोदजीवानाम् ॥
मद्ये मधुनि मांसे नवनीते चतुर्थके । उत्पद्यन्तेऽनन्ताः तद्वर्णास्तत्र जंतवः ।
मैथुनसंज्ञारूढो नवलक्षं हन्ति सूक्ष्मजीवानाम् । केवलिना प्रज्ञप्ताः श्रद्धातव्याः सदाकालम् ॥
स्त्रीयोनौ सम्भवन्ति द्वीन्द्रियास्तु ये जीवाः । एको वा द्वौ वा त्रयो वा लक्षपृथुत्वं चोत्कृष्टम् ॥
पुरुषेण सह गतायां तेषां जीवानां भवति उद्ध्रवणम् । वेणुकदृष्टान्तेन तप्तायसशलाकाज्ञातेन ॥
पंचेन्द्रिया मनुष्या एकनरभुक्तानारीगर्भे । उत्कृष्टं नवलक्षा जायन्ते एकवेलायाम् ॥
नवलक्षाणां मध्ये जायते एकस्य द्वयोर्वा समाप्तिः । शेषाः पुनरेवमेव च विलयं व्रजन्ति तत्रैव ॥

[अन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] स्याद्वादमञ्जरी २०९

तदेवं जीवोपमर्दहेतुत्वाद् न मांसभक्षणादिकमदुष्टमिति प्रयोगः ॥
अथवा भूतानां पिशाचप्रायाणामेषा प्रवृत्तिः । त एवात्र मांसभक्षणादौ प्रवर्त्तन्ते न पुन-
र्विवेकिन इति भावः । तदेवं मांसभक्षणादेर्दुष्टतां स्पष्टीकृत्य यदुपदेष्टव्यं तदाह । “निवृत्तिस्तु
महाफला” । तुरेवकारार्थः । “तुः स्याद् भेदेऽवधारणे”¹ इति वचनात् । ततश्चैतेभ्यो मांस-
भक्षणादिभ्यो निवृत्तिरेव महाफला स्वर्गापवर्गफलप्रदा । न पुनः प्रवृत्तिरपीत्यर्थः । अतएव
स्थानान्तरे पठितम्—
“वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ।
मांसानि च न खादेद् यस्तयोस्तुल्यं भवेत् फलम्² ॥ १ ॥
एकरात्रौषितस्यापि या गतिर्ब्रह्मचारिणः ।
न सा ऋतुसहस्रेण प्राप्तुं शक्या युधिष्ठिर” ॥ २ ॥
मद्यपाने तु कृतं सूत्रानुवादैः, तस्य सर्वविगर्हितत्वात् । तानेवं प्रकारानर्थान् कथमिव बुधा-
भासास्तीर्थिका वेदितुमर्हन्तीति कृतं प्रसङ्गेन ॥
अथ केऽमी सप्तभङ्गाः, कश्चायमादेशभेद इति ? उच्यते । एकत्र जीवादौ वस्तुनि एकै-
कसत्त्वादिधर्मविषयप्रश्नवशाद् अविरोधेन प्रत्यक्षादिबाधापरिहारेण पृथग्भूतयोः समुदितयोश्च
विधिनिषेधयोः पर्यालोचनया कृत्वा स्याच्छब्दलाञ्छितो वक्ष्यमाणैः सप्तभिः प्रकारैर्वचन-
विन्यासः सप्तभङ्गीति गीयते । तद्यथा । १ स्यादस्त्येव सर्वमिति विधिकल्पनया प्रथमो भङ्गः ।
इस प्रकार मांस, मैथुन आदिके सेवन करनेसे अनन्त जीवोंका नाश होता है, अतएव इनका सेवन करना
दोषपूर्ण है ।
अथवा, मांस-भक्षण आदिमें भूत-पिशाचोंकी ही प्रवृत्ति होती है। भूत-पिशाच जैसे ही मांस खानेमें
प्रवृत्त होते हैं, विवेकी लोग नहीं। अतएव “मांस आदिसे निवृत्त होना ही महान् फल है ।” ‘“तु’ शब्दका
प्रयोग निश्चय अर्थमें होता है”। इसलिये मांस आदिके त्याग करनेसे स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति होती है ।
कहा भी है—
“प्रत्येक वर्ष सौ बार यज्ञ करनेवाले और मांस भक्षण न करनेवाले दोनों पुरुषोंको बराबर फल
मिलता है ॥ १ ॥
हे युधिष्ठिर ! एक रात ब्रह्मचर्यसे रहनेवाले पुरुषको जो उत्तम गति मिलती है, वह गति हजारों
यज्ञ करनेसे भी नहीं होती ॥ २ ॥
मद्यपानके विषयमें विशेष कहनेकी आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह सब जगह लोकमें निंदनीय है ।
स प्रकारके अर्थोंको अपनेको पंडित समझनेवाले कुवादी लोग नहीं समझ सकते ।
सप्तभंगी—जीव आदि पदार्थोंमें अस्तित्व आदि धर्मोंके विषयमें प्रश्न उठानेपर, विरोधरहित प्रत्यक्ष
आदिसे अविरुद्ध, अलग अलग अथवा सम्मिलित विधि और निषेध धर्मोंके विचारपूर्वक 'स्यात्' शब्दसे युक्त
सात प्रकारकी वचनरचनाको सप्तभंगी कहते हैं । १ प्रत्येक वस्तु विधि धर्मसे कथंचित् अस्तित्व रूप ही
१. अमरकोशे ३–२३६ ।
२. मनुस्मृतौ ५–५३ ।
२७

२ स्यान्नास्त्येव सर्वमिति निषेधकल्पनया द्वितीयः । ३ स्यादस्त्येव स्यान्नास्त्येवेति क्रमतो
विधिनिषेधकल्पनया तृतीयः । ४ स्यादवक्तव्यमेवेति युगपद्विधिनिषेधकल्पनया चतुर्थः । ५
स्यादस्त्येव स्यादवक्तव्यमेवेति विधिकल्पनया युगपद्विधिनिषेधकल्पनया च पञ्चमः । ६ स्यान्ना-
स्त्येव स्यादवक्तव्यमेवेति निषेधकल्पनया युगपद्विधिनिषेधकल्पनया च षष्ठः । ७ स्यादस्त्येव
स्यान्नास्त्येव स्यादवक्तव्यमेवेति क्रमतो विधिनिषेधकल्पनया युगपद्विधिनिषेधकल्पनया च
सप्तमः ॥
तत्र स्यात्कथंचित् स्वद्रव्यक्षेत्रकालभावरूपेणास्त्येव सर्वं कुम्भादि, न पुनः परद्रव्यक्षेत्र-
कालभावरूपेण । तथाहि—कुम्भो द्रव्यतः पार्थिवत्वेनास्ति, नाप्यादिरूपत्वेन । क्षेत्रतः पाटलिपुत्र-
कत्वेन, न कान्यकुब्जादित्वेन । कालतः शैशिरत्वेन । न वासन्तिकादित्वेन । भावतः श्याम-
त्वेन, न रक्तादित्वेन । अन्यथेतररूपापत्त्या स्वरूपहानिप्रसङ्ग इति । अवधारणं चात्र भङ्गेऽ-
नभिमतान्र्थव्यावृत्त्यर्थमुपात्तम् इतरथानभिहिततुल्यतैवास्य वाक्यस्य प्रसज्येत, प्रतिनियतस्वार्था-
नभिधानात् । तदुक्तम्—
“वाक्येऽवधारणं तावदनिष्टार्थनिवृत्तये ।
कर्तव्यमन्यथानुक्तसमत्वात् तस्य कुत्रचित्” ॥
तथाप्यस्त्येव कुम्भ इत्येतावन्मात्रोपादाने कुम्भस्य स्तम्भाद्यस्तित्वेनापि सर्वप्रकारेणास्तित्वप्राप्तेः
है ( स्यादस्ति ) ; २ प्रत्येक वस्तु निषेध धर्मसे कथंचित् नास्तित्व रूप ही है ( स्यान्नास्ति ) ; ३ प्रत्येक
वस्तु क्रमसे विधि, निषेध दोनों धर्मोंसे कथंचित् अस्तित्व और नास्तित्व दोनों रूप ही है ( स्यादस्तिनास्ति ) ;
४ प्रत्येक वस्तु एक साथ विधि, निषेध धर्मोंसे कथंचित् अवक्तव्य ही है ( स्यादवक्तव्य ) ; ५ प्रत्येक वस्तु
विधि तथा एक साथ विधि-निषेध धर्मोंसे कथंचित् नास्तित्व और अवक्तव्य रूप ही है ( स्यादस्ति अवक्तव्य ) ;
६ प्रत्येक वस्तु निषेध तथा एक साथ विधि-निषेध धर्मोंसे कथंचित् नास्तित्व और अवक्तव्य रूप ही है
( स्यान्नास्ति अवक्तव्य ) ; ७ प्रत्येक वस्तु क्रमसे विधि, निषेध तथा एक साथ विधि-निषेध धर्मोंसे कथंचित्
अस्तित्व, नास्तित्व और अवक्तव्य रूप ही है ( स्यादस्तिनास्ति अवक्तव्य ) ।
( १ ) प्रत्येक वस्तु अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा कथंचित् अस्तित्व रूप ही है,
और दूसरे द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा कथंचित् नास्तित्व रूप ही है । जैसे, घड़ा द्रव्यकी अपेक्षा
पार्थिव रूपसे विद्यमान है, जल रूपसे नहीं; क्षेत्र ( स्थान ) की अपेक्षा पटना नगरकी अपेक्षा मौजूद है,
कन्नोज आदिकी अपेक्षासे नहीं; काल ( समय ) की अपेक्षा शीत ऋतुकी दृष्टिसे है, वसन्त ऋतु आदिकी
दृष्टिसे नहीं; तथा भाव ( स्वभाव ) की अपेक्षा काले रूपसे मौजूद हैं, लाल आदि रूपसे नहीं । यदि पदार्थोंका
अस्तित्व स्व चतुष्टय ( द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव ) की अपेक्षाके बिना ही स्वीकार किया जाय, तो पदार्थोंका
स्वरूप सिद्ध नहीं हो सकता । क्योंकि जब तक वस्तुके एक स्वरूपकी दूसरे स्वरूपसे व्यावृत्ति न की जाय,
तब तक वस्तुका स्वरूप नहीं बन सकता । इसीलिए यहाँ अनिष्ट पदार्थोंका निराकरण करनेके लिए 'एव'
( अवधारण ) का प्रयोग किया है । यदि 'एव' का प्रयोग न किया जाय, तो अनिच्छित वस्तुका प्रसंग
मानना पड़े । कहा भी है—
“वाक्यमें अवधारणार्थक 'एव' का प्रयोग अनिष्ट अर्थ निराकरण करनेके लिए करना चाहिए; क्योंकि
अवधारणार्थक शब्दके प्रयोगके अभावमें वह उक्त वाक्य अनुक्त वाक्यके समान बन जाता है ।”
शंका—वाक्यमें अवधारणार्थक प्रयोग करने पर भी 'घट अस्तित्व रूप ही हैं' ( अस्त्येव कुम्भः ),
१. तत्त्वार्थश्लोकवार्तिके १-६-५३ ।

अन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] स्याद्वादमञ्जरी २११
प्रतिनियतस्वरूपानुपपत्तिः स्यात् । तत्प्रतिपत्तये स्याद् इति शब्दः प्रयुज्यते । स्यात् कथंचिद्
स्वद्रव्यादिभिरपीत्यर्थः । यत्रापि चासौ न प्रयुज्यते तत्रापि व्यवच्छेदफलैवकारवद् बुद्धिमद्भिः
प्रतीयत एव । यदुक्तम्—
“सोऽप्रयुक्तोऽपि वा तज्ज्ञैः सर्वत्रार्थात्प्रतीयते ।
यथैवकारोऽयोगादिन्यवच्छेदप्रयोजनः”१ ॥
इति प्रथमो भङ्गः ॥
स्यात्कथंचिद् नास्त्येव कुम्भादिः स्वद्रव्यादिभिरिव परद्रव्यादिभिरपि वस्तुनोऽसत्त्वा-
निष्ठा हि प्रतिनियतस्वरूपाभावाद् वस्तुप्रतिनियतिर्न स्यात् । न चास्तित्वैकान्तवादिभिरत्र
नास्तित्वमसिद्धमिति वक्तव्यम्, कथंचित् तस्य वस्तुनि युक्तिसिद्धत्वात्, साधनवत् । न हि
क्वचिद् अनित्यत्वादौ साध्ये सत्त्वादिसाधनस्यास्तित्वं विपक्षे नास्तित्वमन्तरेणोपपन्नम्, तस्य
साधनत्वाभावप्रसङ्गात् । तस्माद् वस्तुनोऽस्तित्वं नास्तित्वेनाविनाभूतम्, नास्तित्वं च तेनेति ।
यह कहनेसे प्रयोजन सिद्ध हो जाता है, फिर 'स्यात्' शब्दकी कोई आवश्यकता नहीं है। समाधान—'घट
अस्तित्व रूप ही है' यह कहनेसे घटके सर्वथा अस्तित्वका ज्ञान होता है। किन्तु 'स्यात्' शब्दके लगानेसे
मालूम होता है कि घट पररूप स्तम्भ आदिकी अपेक्षासे सर्वथा अस्तित्व रूप न होकर केवल अपने ही द्रव्य,
क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा विद्यमान है; पर द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा वह सदा नास्ति रूप
ही है। अतएव प्रत्येक वस्तु स्व चतुष्टयकी अपेक्षा ही कथंचित् अस्ति रूप है, पर चतुष्टयकी अपेक्षा नहीं, इसी
भावको स्पष्ट करनेके लिए 'स्यात्' (कथंचित्) शब्दका प्रयोग किया गया है। प्रत्येक वाक्यमें 'स्यात्'
अथवा 'कथंचित्' शब्दके न रहनेपर भी बुद्धिमान लोग उसका अभिप्राय जान लेते हैं। कहा भी है—
“जिस प्रकार अयोग्यव्यवच्छेदक 'एव' शब्दके प्रयोग किये बिना बुद्धिमान प्रकरणसे अर्थ समझ
लेते हैं, उसी तरह 'स्यात्' शब्दके प्रयोगके बिना भी बुद्धिमान अभिप्राय जान लेते हैं।”
यह प्रथम भंग है।
(२) घट आदि प्रत्येक वस्तु कथंचित् नास्ति रूप ही है। यदि पदार्थको स्व चतुष्टयकी तरह पर
चतुष्टयसे भी अस्ति रूप माना जाय, तो पदार्थका कोई भी निश्चित स्वरूप सिद्ध नहीं हो सकता, अतएव
एक वस्तुके दूसरे रूप हो जानेसे, वस्तुका कोई निश्चित स्वरूप नहीं कहा जा सकेगा। वस्तु अस्तिरूप होती
है, नास्तिरूप कदापि नहीं—यह एकान्तिक कथन करनेवालोंके मतमें वस्तुके नास्तित्व धर्मकी सिद्धि नहीं
हो सकती। क्योंकि जिस प्रकार साधन (हेतु) के पक्ष और सपक्षमें अस्तिरूप और विपक्षमें नास्तिरूप होनेसे,
उसमें अस्तित्व और नास्तित्व धर्मोंका (युगपद्) सद्भाव होता है, उसी प्रकार वस्तुमें कथंचित् नास्तित्व
युक्तिसे सिद्ध होता है। क्वचित् (शब्द आदिमें) अनित्यत्व आदिको सिद्ध करनेके लिये सत्त्व आदि साधनके
पक्ष और सपक्षमें अस्तित्व और विपक्षमें नास्तित्व सिद्ध किये बिना (जहाँ अनित्य नहीं वहाँ सत्त्व नहीं) सिद्धि
नहीं कीजा सकती। क्योंकि सत्त्व आदि साधनका विपक्षमें नास्तित्व न हो तो उसके साधनत्वके अभाव होने-
का प्रसंग उपस्थित हो जायेगा। अतएव वस्तुका अस्तिधर्म उसके नास्तित्व धर्मके साथ अविनाभावसे सम्बद्ध
है—पर चतुष्टयरूपकी अपेक्षासे वस्तुके नास्तिरूप न होनेपर स्व चतुष्टयकी अपेक्षा उसके अस्तित्व धर्मकी
सिद्धि नहीं हो सकती। जिस प्रकार वस्तुका अस्तित्व धर्म नास्तित्व धर्मके साथ अविनाभूत है, उसी प्रकार
उसका नास्तित्व धर्म अस्तित्व धर्मके साथ अविनाभूत है। अस्तित्वधर्म और नास्तित्व धर्मका प्रधानोपसर्जन
भाव विवक्षाके कारण होता है। (जब अस्तित्व धर्मको ही कहनेकी वक्ता की इच्छा होती है तब अस्तित्व
धर्मकी प्रधानता और नास्तित्व धर्मकी गौणता, तथा जब नास्तित्व धर्मको ही कहनेकी इच्छा होती है तब
१. तत्त्वार्थश्लोकवार्तिके १-६-५६ ।

२१२ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २३
विवक्षावशाच्चानयोः प्रधानोपसर्जनभावः। एवमुत्तरभङ्गेष्वपि ज्ञेयम्, “अर्पितानर्पितसिद्धेः”
इति वाचकवचनात् । इति द्वितीयः ॥
तृतीयः स्पष्ट एव । द्वाभ्यामस्तित्वनास्तित्वधर्माभ्यां युगपत्प्रधानतयार्पिताभ्याम् एकस्य
वस्तुनोऽभिधित्सायां तादृशस्य शब्दस्यासम्भवाद् अवक्तव्यं जीवादिवस्तु । तथाहि—सद्-
सत्त्वगुणद्वयं युगपद् एकत्र सदित्यनेन वक्तुमशक्यम्, तस्यासत्त्वप्रतिपादनासमर्थत्वात् । तथा-
ऽसदित्यनेनापि, तस्य सत्त्वप्रत्यायनसामर्थ्याभावात् । न च पुष्पदन्तादिवत् साङ्केतिकमेकं
पदं तद्वक्तुं समर्थम्, तस्यापि क्रमेणार्थद्वयप्रत्यायने सामर्थ्योपपत्तेः, शतृशानयोः संकेतित-
सच्छब्दवत्। अतएव द्वन्द्वकर्मधारयवृत्त्योर्वाक्यस्य च न तद्वाचकत्वम् । इति सकलवाचक-
रहितत्वाद् अवक्तव्यं वस्तु युगपत्सत्त्वासत्त्वाभ्यां प्रधानभावार्पिताभ्यामाक्रान्तं व्यवतिष्ठते ।
न च सर्वथाऽवक्तव्यम्, अवक्तव्यशब्देनाप्यनभिधेयत्वप्रसङ्गात् । इति चतुर्थः । शेषास्त्रयः
सुगमाभिप्रायाः ॥
न च वाच्यमेकत्र वस्तुनि विधीयमाननिषिध्यमानानन्तधर्माभ्युपगमनेनानन्तभङ्गीप्र-
नास्तित्व धर्मकी प्रधानता और अस्तित्व धर्मकी गौणता होती है । प्रथम भंगमें अस्तित्व धर्मकी प्रधानता
और नास्तित्व धर्मकी गौणता, तथा द्वितीय भंगमें नास्तित्व धर्मकी प्रधानता और अस्तित्व धर्मकी गौणता
होती है । जो धर्म गौण होता है उसका अभाव नहीं होता । ) इस प्रकार उत्तरभंगोंमें भी समझना चाहिये ।
उमास्वाति वाचकने कहा भी है—“प्रधान और गौणको अपेक्षासे पदार्थोंकी विवेचना होती है ।” यह
दूसरा भंग है ।
(३-७) तीसरा भंग स्पष्ट है। जब हम क्रमसे वस्तुको स्वरूपकी अपेक्षा अस्ति, और पररूपकी अपेक्षासे
नास्ति कहते हैं, उस समय वस्तुका अस्तिनास्तिरूपसे ज्ञान होता है । यह स्यादस्तिनास्ति नामका तीसरा भंग
है । (४) हम वस्तुके अस्ति और नास्ति धर्मको एक साथ नहीं कह सकते । जिस समय जीवको सत् कहते हैं,
उस समय असत्, और जिस समय असत् कहते हैं, उस समय सत् नहीं कह सकते । क्योंकि अस्ति और नास्ति
दोनों परस्पर विरुद्ध हैं । शंका—जिस प्रकार चन्द्र और सूर्य दोनों वस्तुओंका ज्ञान ‘पुष्पदंत’ शब्दसे हो
जाता है, उसो तरह अस्ति और नास्ति दोनोंका एक साथ ज्ञान किसी एक सांकेतिक शब्दसे मानना चाहिये ।
समाधान—पहले तो कोई ऐसा शब्द नहीं, जिससे अस्ति और नास्ति दोनों धर्मोंका एक साथ ज्ञान
किया जा सके । यदि दोनों धर्मोंको कहनेवाला कोई एक शब्द मान भी लिया जाय, तो अस्तित्व और
नास्तित्व दोनों धर्मोंका क्रमसे ही ज्ञान हो सकता है । व्याकरणमें ‘सत्’ शब्दसे शतृ और शान दोनोंका क्रम-
पूर्वक ज्ञान होता है, एक साथ नहीं । अतएव द्वन्द्व, कर्मधारय अथवा किसी एक वाक्यसे सत्त्व और असत्त्व
दोनों धर्मोंका एक साथ ज्ञान नहीं हो सकता । परस्पर विरुद्ध अस्तित्व और नास्तित्व दोनोंका ज्ञान
किसी एक शब्दसे नहीं होता, अतएव प्रत्येक वस्तु एक साथ अस्ति और नास्ति भावकी प्रधानता होनेसे
कथंचित् अवक्तव्य है । यदि हम पदार्थको सर्वथा अवक्तव्य मानें, तो हम पदार्थको अवक्तव्य शब्दसे भी नहीं
कह सकते, अतएव प्रत्येक पदार्थको कथंचित् अवक्तव्य ही मानना चाहिये । यह स्यादवक्तव्य नामका चौथा
भंग है । [( ५ ) जब हम वस्तुको स्वरूपकी अपेक्षा सत् कह कर उसकी एक साथ अस्ति-नास्ति रूप अवक्तव्य
रूपसे विवेचना करना चाहते हैं, उस समय वस्तु स्यादस्ति अवक्तव्य नामसे कही जाती है । ( ६ ) जब हम
वस्तुकी नास्तित्व धर्मकी विवक्षासे एक साथ अस्ति-नास्ति रूप अवक्तव्य रूपसे विवेचना करना चाहते हैं,
उस समय वस्तु स्यान्नास्ति अवक्तव्य कही जाती है । ( ७ ) प्रत्येक वस्तु क्रमसे स्व और पर रूपकी अपेक्षा
अस्ति-नास्ति होनेपर भी एक साथ अस्ति-नास्ति रूप अवक्तव्य होनेके कारण स्यादस्तिनास्ति अवक्तव्य
रूप है । ]
शंका—एक वस्तुमें जिनका विधान और निषेध किया जाता है, ऐसे अनंत धर्मोंका अस्तित्व स्वीकार

अन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] स्याद्वादमञ्जरी २१३
सङ्गाद् असङ्गतैव सप्तभङ्गीति, विधिनिषेधप्रकारापेक्षया प्रतिपर्यायं वस्तुनि अनन्तानामपि
सप्तभङ्गीनामेव संभवात् । यथा हि सदसत्त्वाभ्याम् , एवं सामान्यविशेषाभ्यामपि सप्तभङ्ग्येव
स्यात् । तथाहि । स्यात्सामान्यम् , स्याद् विशेषः, स्यादुभयम् , स्यादवक्तव्यम्, स्यात्सामान्-
न्यावक्तव्यम् , स्याद् विशेषावक्तव्यम्, स्यात्सामान्यविशेषावक्तव्यमिति । न चात्र विधि-
निषेधप्रकारौ न स्त इति वाच्यम् , सामान्यस्य विधिरूपत्वाद् विशेषस्य च व्यावृत्तिरूपतया
निषेधात्मकत्वात् । अथवा प्रतिपक्षशब्दत्त्वाद् यदा सामान्यस्य प्राधान्यं तदा तस्य विधिरूपता
विशेषस्य च •निषेधरूपता । यदा विशेषस्य पुरस्कारस्तदा तस्य विधिरूपता इतरस्य च
निषेधरूपता । एवं सर्वत्र योज्यम् । अतः सुष्ठूक्तं अनन्ता अपि सप्तभङ्ग्य एव संभवेयुरिति,
प्रतिपर्यायं प्रतिपाद्यपर्यनुयोगानां सप्तानामेव संभवात्, तेषामपि सप्तत्वं सप्तविधतज्जिज्ञासा-
नियमात्, तस्या अपि सप्तविधत्वं सप्तधैव तत्संदेहसमुत्पादात्, तस्यापि सप्तविधत्वनियमः
स्वगोचरवस्तुधर्माणां सप्तविधत्वस्यैवोपपत्तेरिति ॥
इयं च सप्तभङ्गी प्रतिभङ्गं सकलादेशस्वभावा विकलादेशस्वभावा च । तत्र सकलादेशः
प्रमाणवाक्यम् । तल्लक्षणं चेदम्—प्रमाणप्रतिपन्नानन्तधर्मात्मकवस्तुनः कालादिभिरभेदवृत्ति-
प्राधान्याद् अभेदोपचाराद् वा यौगपद्येन प्रतिपादकं वचः सकलदेशः । अस्यार्थः-कालादि-
भिरष्टाभिः कृत्वा यदभेदवृत्तेर्धर्मधर्मिणोरपृथग्भावस्य प्राधान्यं तस्मात् कालादिभिर्भिन्नात्म-
किये जानेसे अनंत भंगोंके समूहका प्रसंग उपस्थित हो जायेगा तो फिर वस्तुमें केवल सात ही भंगोंकी कल्पना
आप क्यों करते हैं ? समाधान—प्रत्येक वस्तुमें अनंत धर्म होनेके कारण वस्तुमें अनेक भंग होते हैं, परंतु
ये अनंत भंग विधि और निषेधकी अपेक्षासे सात ही हो सकते हैं । अतएव जिस प्रकार सत्त्व धर्म ( अस्तित्त्व
धर्म ) और असत्त्व धर्म ( नास्तित्त्व धर्म ) से एक ही सप्तभंगी ( सात भंगोंका एक समूह ) होती है, उसी
तरह सामान्य धर्म और विशेष धर्मकी अपेक्षासे भी एक ही सप्तभंगी बनती है। तथाहि—सामान्य और विशेष-
से स्यात् सामान्य, स्यात् विशेष, स्यात् उभय, स्यात् अवक्तव्य, स्यात् सामान्यअवक्तव्य, स्यात् विशेषअवक्तव्य,
और स्यात् सामान्य-विशेष अवक्तव्य ये सात भंग होते हैं । शंका—आपने ऊपर विधि और निषेध धर्मोंके
विचार पूर्वक 'स्यात्' शब्दसे युक्त सात प्रकारकी वचनरचनाको सप्तभंगी कहा था । यह विधि और निषेध
धर्मोंकी कल्पना सामान्य-विशेषकी सप्तभंगीमें कैसे बन सकती है ? समाधान —सामान्य-विशेषकी सप्तभंगी
में भी विधि और निषेध धर्मोंकी कल्पना की जा सकती है । क्योंकि सामान्य विधि रूप है, और विशेष
व्यवच्छेदक होनेसे निषेध रूप है। अथवा, सामान्य और विशेष दोनों परस्पर विरुद्ध हैं, अतएव जब सामान्य
की प्रधानता होती है, उस समय सामान्यके विधि रूप होनेसे विशेष निषेध रूप कहा जाता है, और जब
विशेषकी प्रधानता होती है, उस समय विशेषके विधिरूप होनेसे सामान्य निषेध रूप कहा जाता है । इस
प्रकार सर्वत्र योजना करनी चाहिये । अतः ठीक ही कहा है कि अनंत भंगोंमें भी सात भंगोंकी ही कल्पना
सिद्ध है । प्रत्येक पर्यायकी अपेक्षा प्रतिपाद्य संबंधी सात प्रकारके ही प्रश्न किये जा सकते हैं, अतएव सात
ही भंग होते हैं । प्रत्येक पर्यायकी अपेक्षा सात प्रकारकी ही जिज्ञासा उत्पन्न होती है, इसलिये सात प्रकार
के ही प्रश्न होते हैं । संदेहके सात ही प्रकार हो सकते हैं, इसलिये सात ही प्रकारकी जिज्ञासा हो सकती है ।
तथा प्रत्येक वस्तुके सात ही धर्मोंका होना संभव है, अतएव संदेह भी सात प्रकारके ही होते हैं ।
यह सप्तभंगी प्रत्येक भंगमें सकल और विकल आदेश रूप होती है । प्रमाणवाक्यको सकल आदेश
कहते हैं । प्रमाणसे जानी हुई अनन्त धर्म स्वभाववाली वस्तुको काल, आत्मरूप, अर्थ, संबंध, उपकार,
गुणिदेश, संसर्ग और शब्दकी अपेक्षासे अभेद वृत्तिकी अथवा अभेदोपचारकी प्रधानतासे सम्पूर्ण धर्मोंको एक
साथ प्रतिपादन करनेवाले वाक्यको सकलादेश कहते हैं । प्रत्यंक वस्तुमें अनंत धर्म मौजूद हैं । इन धर्मोंका एक
साथ और क्रम-क्रमसे शब्दों द्वारा प्रतिपादन किया जाता है । जिस समय वस्तुमें काल आदिकी अपेक्षा

२१४ श्रीमद्रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २३
नामपि धर्मधर्मिणामभेदाध्यारोपाद् वा समकालमभिधायकं वाक्यं सकलादेशः । तद्विपरीतस्तु
विकलादेशो नयवाक्यमित्यर्थः । अयमाशयः-यौगपद्येनाशेषधर्मात्मकं वस्तु कालादिभिर-
भेदप्राधान्यवृत्त्याऽभेदोपचारेण वा प्रतिपादयति सकलादेशः, तस्य प्रमाणाधीनत्वात् । विकला-
देशस्तु क्रमेण भेदोपचाराद् भेदप्राधान्याद्वा तदभिधत्ते, तस्य नयात्मकत्वात् ॥
कः पुनः क्रमः किं च यौगपद्यम् । यदास्तित्वादिधर्माणां कालादिभिर्भेदविवक्षा, तदैक-
शब्दस्यानेकार्थप्रत्यायने शक्त्यभावात् क्रमः । यदा तु तेषामेव धर्माणां कालादिभिरभेदेन
वृत्तमात्मरूपमुच्यते तदैकेनापि शब्देनैकधर्मप्रत्यायनमुखेन तदात्मकतामापन्नस्यानेकाशेषधर्म-
रूपस्य वस्तुनः प्रतिपादनसम्भवाद् यौगपद्यम् ॥
के पुनः कालादयः । कालः आत्मरूपम् अर्थः सम्बन्धः उपकारः गुणिदेशः संसर्गः शब्दः ।
१ तत्र स्याद् जीवादिवस्तु अस्त्येव इत्यत्र यत्कालमस्तित्वं तत्कालाः शेषानन्तधर्मा वस्तुन्ये-
कत्रेति तेषां कालेनाभेदवृत्तिः । २ यदेव चास्तित्वस्य तद्गुणत्वमात्मरूपं तदेव अन्यानन्त-
गुणानामपीति आत्मरूपेणाभेदवृत्तिः । ३ य एव चाधारोऽर्थो द्रव्याख्योऽस्तित्वस्य स एवान्य-
पर्यायाणामित्यर्थेनाभेदवृत्तिः । ४ य एव चाविश्वग्भावः कथञ्चित्तादात्म्यलक्षणः सम्बन्धोऽ-
अभिन्न रूपसे रहनेवाले सम्पूर्ण धर्म और धर्मियोंमें अभेद भावकी प्रधानता रख कर, अथवा काल आदिसे
भिन्न धर्म और धर्मीमें अभेदका उपचार मानकर सम्पूर्ण धर्म और धर्मियोंका एक साथ कथन किया जाता
है, उस समय सकलादेश होता है । सकलादेशसे काल आदिकी अभेद दृष्टि अथवा अभेदोपचारकी अपेक्षा
वस्तुके सम्पूर्ण धर्मोंका एक साथ ज्ञान होता है । जैसे अनेक गुणोंके समुदायको द्रव्य कहते हैं, इसलिये गुणोंको
छोड़ कर द्रव्य कोई भिन्न पदार्थ नहीं है, अतएव द्रव्यका निरूपण गुणवाचक शब्दके विना नहीं हो सकता ।
अतएव अस्तित्व आदि अनेक गुणोंके समुदाय रूप एक जीवका निरंश रूप समस्तपनेसे अभेदवृत्ति ( द्रव्यार्थिक
नयकी अपेक्षा सम्पूर्ण धर्म अभिन्न हैं ) और अभेदोपचार ( पर्यायार्थिक नयसे समस्त धर्मोंके परस्पर भिन्न
होनेपर भी उनमें एकताका आरोप है ) से एक गुणके द्वारा प्रतिपादन होता है । इसलिये एक गुणके द्वारा
अभिन्न स्वरूपके प्रतिपादन करनेको सकलादेश कहते हैं । यह सकलादेश प्रमाणके आधीन होता है । जिस
समय काल आदिसे अस्तित्व आदि धर्मोंका भेदप्राधान्य अथवा भेदोपचार होता है, उस समय एक शब्दसे
अनेक धर्मोंका प्रतिपादन नहीं किया जा सकता, इसलिये पदार्थोंका निरूपण कमसे होता है । इसे विकलादेश
अथवा नय वाक्य कहते हैं । विकलादेशमें भेदवृत्ति अथवा भेदोपचारकी प्रधानता रहती है । विकलादेश
नयके आधीन होता है ।
जिस समय अस्तित्व आदि धर्मोंका काल आदिसे भेद सिद्ध करना होता है, उस समय एक शब्दसे
अनेक धर्मोंका ज्ञान नहीं हो सकता, अतएव सम्पूर्ण धर्मोंका एक-एक करके ही कथन किया जा सकता है,
इसे क्रम कहते हैं । इसी क्रमसे विकलादेशसे ज्ञान होता है । तथा, जिस समय वस्तुके अनेक धर्मोंका काल
आदिसे अभेद सिद्ध करना होता है, उस समय एक शब्दसे यद्यपि वस्तुके एक धर्मका ज्ञान होता है, परन्तु
एक शब्दसे ज्ञात इस एक धर्मके द्वारा ही पदार्थोंके अनेक धर्मोंका ज्ञान होता है । इसे वस्तुओंका एक साथ
( युगपत् ) ज्ञान होना कहते हैं, यह ज्ञान सकलादेशसे होता है ।
(१) काल—'जीव आदि पदार्थ कथंचित् अस्ति रूप ही हैं' यह कहनेपर जिस समय जीवमें
अस्तित्व आदि धर्म मौजूद रहते हैं, उस समय जीवमें और भी अनन्त धर्म पाये जाते हैं, अतएव कालकी
अपेक्षा अस्तित्व आदि धर्म एक हैं । ( २ ) आत्मरूप ( स्वभाव ) — जिस प्रकार जीवका अस्तित्व स्वभाव
है, उसी प्रकार और धर्म भी जीवके स्वभाव हैं । इसलिये स्वभावकी अपेक्षा अस्तित्व आदि अभिन्न हैं ।
(३) अर्थ ( आधार ) — जिस प्रकार द्रव्य अस्तित्वका आधार है, वैसे ही और धर्म भी द्रव्यके आधार
हैं । अतएव आधारकी अपेक्षा अस्तित्व आदि धर्म अभिन्न हैं । (४) सम्बन्ध — जिस प्रकार कथंचित्

अन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] स्याद्वादमञ्जरी २१५
स्तित्वस्य स एव शेषविशेषाणामिति सम्बन्धेनाभेदवृत्तिः । ५ य एव चोपकारोऽस्तित्वेन स्वानुर-
क्तत्वकरणं स एव शेषैरपि गुणैरित्युपकारेणाभेदवृत्तिः । ६ य एव गुणिनः सम्बन्धी देशः
क्षेत्रलक्षणोऽस्तित्वस्य स एवान्यगुणानामिति गुणिदेशेनाभेदवृत्तिः । ७ य एव चैकवस्त्वात्म-
नास्तित्वस्य संसर्गः स एव शेषधर्माणामिति संसर्गेणाभेदवृत्तिः । अविष्वग्भावेऽभेदः प्रधानम्
भेदो गौणः, संसर्गे तु भेदः प्रधानम् अभेदो गौण इति विशेषः । ८ य एव चास्तीति शब्दोऽ-
स्तित्वधर्मात्मकस्य वस्तुनो वाचकः स एव शेषानन्तधर्मात्मकस्यापीति शब्देनाभेदवृत्तिः पर्या-
यार्थिकनयगुणभावे द्रव्यार्थिकनयप्राधान्याद् उपपद्यते ॥
तादात्म्य सम्बन्ध अस्तित्वमें रहता है, उसी तरह उक्त सम्बन्ध अन्य धर्मोंमें भी रहता है, इसलिये सम्बन्धकी
अपेक्षा अस्तित्व आदि धर्म अभिन्न हैं ( ५ ) उपकार—जो उपकार अस्तित्वके द्वारा अपने स्वरूपमें अनुराग
उत्पन्न करता है, वही उपकार अन्य धर्मोंके द्वारा भी अनुराग पैदा करता है, अतएव उपकारकी अपेक्षा
अस्तित्व आदि धर्मोंमें अभेद है । ( ६ ) गुणिदेश ( द्रव्यका आधार )—जो क्षेत्र द्रव्यसे सम्बन्ध रखनेवाले
अस्तित्वका है, वही क्षेत्र अन्य धर्मोंका है, अतएव अस्तित्व आदि धर्मोंमें अभेद भाव है । ( ७ ) संसर्ग—
एक वस्तुकी अपेक्षासे जो संसर्ग अस्तित्वका है, वही संसर्ग अन्य धर्मोंका भी है, इसलिए संसर्गकी अपेक्षा
अस्तित्व आदि धर्मोंमें अभेद हैं । सम्बन्धमें अभेदकी प्रधानता और भेदकी गौणता, तथा संसर्गमें भेदकी
प्रधानता और अभेदकी गौणता होती है । ( ८ ) शब्द—जिस 'अस्ति' शब्दसे अस्तित्व धर्मका ज्ञान होता
है, उसी 'अस्ति' शब्दसे अन्य धर्म भी जाने जाते हैं, अतएव शब्दकी अपेक्षा अस्तित्व आदि धर्म परस्पर
अभिन्न हैं । जिस समय पर्यायार्थिक नयकी गौणता और द्रव्यार्थिक नयकी प्रधानता होती हैं, उस समय
पदार्थोंके धर्मोंमें अभेद भावका ज्ञान होनेसे अभेदवृत्ति होती है ।
[ स्पष्टीकरण: ( १ ) काल—'जीव आदि पदार्थ 'कथंचित् अस्तिरूप हो हैं'—इस उदाहरणमें
जीव आदि रूप पदार्थमें जितने काल तक अस्तित्व गुण विद्यमान रहता है, उतने काल तक और
भी अनन्त धर्म पाये जाते हैं । इस प्रकार जीव आदि एक पदार्थमें अस्तित्व एवं अन्य धर्मोंकी स्थिति
कालकी दृष्टिसे अभेद रूप है । इसी तरह घटका उदाहरण लिया जा सकता है । जितने काल तक घटमें
अस्तित्व धर्म रहता है, उतने काल तक घटके अन्य धर्म भी विद्यमान रहते हैं । जिस कालमें घटका अस्तित्व
नष्ट हो जाता है उस कालमें घटके अन्य धर्मोंका भी अभाव हो जाता है । इससे स्पष्ट है कि पदार्थके
अस्तित्व धर्मके साथ उसके अन्य धर्मोंका अविनाभाव—तादात्म्य-अभेद-सिद्ध हो जाता है । जीव द्रव्यमें
रहनेवाला अस्तित्व गुण अनादिनिधन है इसलिये उसका ज्ञान सामान्यरूप धर्म भी अनादि निधन होता है,
क्योंकि जीवके अस्तित्वसे ज्ञानगुण कालकी दृष्टिसे अभिन्न है । अतएव पदार्थके अस्तित्व धर्मका जितना
काल होता है, उतना ही काल उसके अन्य धर्मोंका उस पदार्थमें .अस्तिरूप रहनेका होता है । इसलिये
पदार्थके अस्तित्व धर्म और उसके शेष धर्मोंमें कालको दृष्टिसे अभेद है । ( २ ) आत्मरूप—जिस प्रकार
अस्तित्व गुणका पदार्थका स्वभाव है, उसी प्रकार अन्य अनन्त गुण भी पदार्थके स्वभाव हैं । इस प्रकार
एक पदार्थमें पदार्थके गुण होना रूप स्वभावसे पदार्थका अस्तित्व धर्म एवं शेष अनन्त धर्म भी रहते हैं ।
अतएव एक पदार्थमें अस्तित्व आदि सभी धर्मोंकी स्वस्वरूप ( आत्मस्वरूप ) की दृष्टिसे अभेदवृत्ति रहतो
है । जिस प्रकार अस्तित्व गुणका जीव पदार्थका गुण होना स्वस्वरूप है, उसी प्रकार अन्य ज्ञान आदि रूप
अनन्त गुणोंका जीव पदार्थका गुण होना भी स्वस्वरूप है । अतः जीवरूप एक पदार्थमें अस्तित्व और अन्य
शेष ज्ञान आदि रूप अनन्त धर्मकी आत्मस्वरूप दृष्टिसे अभेद वृत्ति होती है । जिस प्रकार घटका गुण
होना अस्तित्वका स्वरूप है, उसी प्रकार उसके अन्य शेष अनन्त धर्मोंका भी घटका गुण होना स्वस्वरूप
है । अतः घटरूप एक पदार्थमें अस्तित्व और अन्य शेष अनंत धर्मोंकी आत्मस्वरूपकी दृष्टिसे अभेद वृत्ति
है । ( ३ ) अर्थ—जो पदार्थ अस्तित्व गुणका आधार होता है, वही अन्य अक्रमभावी पर्यायों-गुणोंका-आधार
होता है । इस प्रकार एक द्रव्यका अस्तित्व धर्म और उसके अन्य अनन्त गुणों जब एक ही पदार्थ आधार

२१६ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लो. २३
होता है, तब अर्थकी दृष्टिसे उन गुणोंमें अभेद होता है। जिस प्रकार अस्तित्व गुणका जीव पदार्थ आश्रय
होता है, उसी प्रकार अन्य शेष अनन्त धर्मोंका भी जीवद्रव्य आश्रय होता है। अतः अस्तित्व धर्म और
अन्य शेष ज्ञान आदिरूप अनन्त धर्मंका एक जीव पदार्थके आश्रित होनेसे अर्थकी दृष्टिसे उन धर्मोंमें अभेद हैं।
(४) सम्बन्ध—जिस प्रकार अस्तित्व धर्मका पदार्थके साथ कथंचित् तादात्म्यरूप सम्बन्ध होता है, वैसे ही
कथंचित् तादात्म्य सम्बन्ध अन्य समस्त धर्मोंका उस पदार्थके साथ रहता है। इस प्रकार पदार्थके अस्तित्व
धर्मका और उसके अन्य शेष धर्मोंका उसी पदार्थके साथ कथंचित् तादात्म्य सम्बन्ध अर्थात् अभेद होनेसे,
उन सभी धर्मोंमें सम्बन्धकी दृष्टिसे अभेद होता है। इस प्रकार अस्तित्व धर्मका जीव पदार्थके साथ कथंचित्
तादात्म्य सम्बन्ध होनेसे अस्तित्व धर्म तथा अन्य शेष ज्ञान आदि रूप अनन्त धर्ममें सम्बन्धकी दृष्टिसे अभेद
होता है। (५) उपकार—पदार्थका अस्तित्व गुणके द्वारा स्वस्वरूपसे युक्त किया जाना पदार्थका अस्तित्व
गुणकृत उपकार होता है। इसी प्रकार उस पदार्थके शेष अन्य गुणोंके द्वारा स्वस्वरूपसे युक्त किया जाना, उसी
पदार्थका शेष गुणकृत उपकार होता है। पदार्थके अस्तित्व गुणकृत तथा उस पदार्थके आश्रित अन्य शेष गुणों
द्वारा किये जानेवाले उपकारके एक होनेसे अस्तित्व गुण तथा उसके अन्य शेष गुणोंमें उपकारकी दृष्टिसे अभेद
है। आचार्यप्रवर श्रीविद्यानन्दने उपकार शब्दका अर्थ 'स्वानुरक्तत्वकरणं' किया है—अर्थात् अपनी
विशेषताको पदार्थमें निर्माण करना। उदाहरणार्थ, नीलवर्ण पुद्गलका गुण है, वह गुण पुद्गलमें अपने
वैशिष्ट्यका निर्माण करता है। पदार्थमें अस्तित्व गुण अपने वैशिष्ट्यको निर्माण करता है। यदि अस्तित्व
गुणका वैशिष्ट्य पदार्थमें न हो तो पदार्थका अभाव हो जायेगा। इस वैशिष्ट्यको पदार्थमें निर्माण करना
ही पदार्थका गुणकृत उपकार है। जिस प्रकार अस्तित्वगुण पुद्गल पदार्थमें अपने वैशिष्ट्यको निर्माण कर
पदार्थका उपकार करता है—उसे स्वानुरक्त करता है, उसी प्रकार नीलत्व आदि रूप अन्य गुण भी पुद्गल
पदार्थमें अपने वैशिष्ट्यको निर्माण कर उसी पदार्थका उपकार करता है—उसे स्वानुरक्त करता है। अतः
अस्तित्व धर्म और अन्य शेष नीलत्व आदि धर्म, पुद्गल पदार्थमें अपने वैशिष्ट्यके निर्माणकर्ता होनेके कारण
उपकारकी दृष्टिसे अभिन्न हैं। (६) गुणिदेश—जो अस्तित्व धर्मका गुणिदेश होता है वही अन्य धर्मोंका भी
होता है। इस प्रकार गुणिदेशकी दृष्टिसे अस्तित्व धर्म तथा अन्य शेष धर्मोंमें अभेद है। गुणी अर्थात् गुणवान्
पदार्थके जितने प्रदेशोंमें अस्तित्व धर्म होता है, उतने ही प्रदेशोंमें अन्य शेष गुणोंका होना ही अस्तित्व गुण
तथा अन्य शेष गुणोंमें गुणिदेशकी दृष्टिसे अभेद सिद्ध करता है। पदार्थके सभी प्रदेशोंमें अस्तित्व गुण होता
है। इस अस्तित्व गुणके समान पदार्थके सभी प्रदेशोंमें उसके अन्य शेष गुण भी होते हैं। अस्तित्व गुण
जीवके कुछ प्रदेशोंमें हो, और कुछमें न हो—ऐसा कभी नहीं होता। यह गुण जीवके सभी प्रदेशोंमें पाया
जाता है। जिस प्रकार अस्तित्व गुण जीवके सभी प्रदेशोंमें होता है, उसी प्रकार जीवके शेष अन्य ज्ञान आदि
अनंत गुण भी होते हैं। अतः जीवका अस्तित्व गुण और उसके शेष ज्ञान आदि गुणमें गुणिदेशकी दृष्टिसे अभेद
है। (७) संसर्ग—एक पदार्थके रूपसे अस्तित्व धर्मका पदार्थके साथ जो संसर्ग होता है, वही एक वस्तुके
स्वाभावरूपसे उसी पदार्थके अन्य शेष धर्मोंका उसी पदार्थके साथ संसर्ग होता है। इस प्रकार एक पदार्थके
साथ एक वस्तुके स्वभावके रूपसे अस्तित्व धर्मका संसर्ग होनेसे तथा उसी पदार्थके अन्य शेष धर्मोंका एक
वस्तुके स्वाभावरूपसे उसी पदार्थके साथ संसर्ग होनेसे, उस पदार्थका अस्तित्व धर्म और उसी पदार्थके अन्य
शेष धर्मोंमें संसर्गकी दृष्टिसे अभेद होता है। संसर्ग दो भिन्न पदार्थोंमें होता है। लोकव्यवहारमें पर्यायार्थिक-
नयकी दृष्टिसे गुण-गुणीमें भेद समझकर व्यवहार किया जाता है। गुण और गुणीमें द्रव्यार्थिकनयकी दृष्टिसे
भेदका अभाव होता है—अर्थात् अभेद होता है, फिर भी 'यह अग्निकी उष्णता है'—यहाँ अग्नि और
उष्णतामें वस्तुतः अभेद होने पर भी उनमें भेद समझकर व्यवहार किया जाता है। इस व्यवहारसे उनके
भेदका संस्कार जो दृढ़ हो गया होता है, उसका अभाव द्रव्यार्थिक नयकी सहायतासे किया जाता है। कथंचित्
तादात्म्य सम्बन्धमें अभेद मुख्य होता है और भेद गौण, तथा संसर्गमें भेद मुख्य होता है और अभेद गौण ।
यही तादात्म्य संबंध तथा संसर्ग (संयोग) संबंधमें भेद है। कथंचित् तादात्म्य कथंचित् भेदाभेद रूप होता

अन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] स्याद्वादमञ्जरी २१७
द्रव्यार्थिकगुणभावे पर्यायार्थिकप्राधान्ये तु न गुणानामभेदवृत्तिः सम्भवाद् । समकाल-
मेकत्र नानागुणानामसम्भवात्, सम्भवे वा तदाश्रयस्य तावद्वा भेदप्रसङ्गात् । नानागुणानां
सम्बन्धिना आत्मरूपस्य च भिन्नत्वात्, आत्मरूपाभेदे तेषां भेदस्य विरोधात् । स्वाश्रयस्यार्थ-
स्यापि नानात्वाद्, अन्यथा नानागुणाश्रयत्वस्य विरोधात् । सम्बन्धस्य च सम्बन्धिभेदेन
भेददर्शनाद् नानासम्बन्धिभिरेकत्र सम्भवाघटनात् । तैः क्रियमाणस्योपकारस्य च प्रतिनियत-
रूपस्यानेकत्वात् अनेकैरुपकारिभिः क्रियमाणस्योपकारस्य विरोधात् । गुणिदेशस्य प्रतिगुणं
भेदात् तद्भेदे भिन्नार्थगुणानामपि गुणिदेशाभेदप्रसङ्गात् । संसर्गस्य च प्रतिसंसर्गिभेदात्
तद्भेदे संसर्गिभेदविरोधात् । शब्दस्य प्रतिविषयं नानात्वात् सर्वगुणानामेकशब्दवाच्यतायां
सर्वार्थानामेकशब्दवाच्यतापत्तेः शब्दान्तरवैफल्यापत्तेः ।
है। भेद विशिष्ट अभेदको संबंध तथा अभेद विशिष्ट भेदको संसर्ग कहते हैं । ( ८ ) जो 'अस्ति' शब्द
अस्तित्वधर्मसे युक्त पदार्थका वाचक होता है, वही 'अस्ति' शब्द अनंत धर्मोंसे युक्त पदार्थका वाचक होता है।
इस प्रकार अस्तित्व धर्मयुक्त पदार्थ तथा शेष अन्य अनंतधर्मोंसे युक्त वही पदार्थ, 'अस्ति' शब्दका वाच्य
होनेसे, शब्दकी दृष्टिसे अभिन्न है । जिन गुणोंमें पर्यायार्थिक नयकी दृष्टिसे भेद होता है, उन गुणोंमें पर्यायार्थिक
नयकी गौणता और द्रव्यार्थिक नयकी मुख्यता होनेपर अभेद घटित होता है) १ ।
द्रव्यार्थिक नयको गौणता और पर्यायार्थिक नयकी प्रधानता होनेपर पदार्थाश्रित गुणोंकी अभेद रूपसे
स्थिति नहीं होती : ( १ ) विभिन्न गुण एक कालमें एक स्थान पर नहीं रह सकते । यदि विभिन्न गुण एक
कालमें, एक वस्तुमें, एक साथ रहें तो गुणोंके आश्रित द्रव्योंमें भी उतने ही भेद मानने चाहिये । (२) विभिन्न
गुणोंका अपने-अपने स्वरूप ( आत्मरूप ) वाले स्वभिन्न गुणके स्वरूपसे भेद है; क्योंकि वे एक दूसरेके स्वरूपमें
नहीं रहते, इसलिये गुणोंमें अभेद नहीं है। यदि गुणोंमें परस्पर भेद न हो, तो गुणोंको भिन्न-भिन्न नहीं
मानना चाहिये । ( ३ ) गुणोंके आश्रयभूत पदार्थ ( अर्थ ) भी अनेक हैं; यदि गुणोंके आधार अनेक न हों
तो वे नाना गुणोंके आश्रित नहीं कहे जा सकते । ( ४ ) संबंधियोंके भिन्न-भिन्न होने कारण संबंधका भेद
दिखाई देनेसे भी गुणोंमें अभिन्नता संभव नहीं, क्योंकि एक संबंधसे भिन्न-भिन्न संबंधियोंके साथ संबंध नहीं
बन सकता । ( ५ ) उपकारकी अपेक्षा भी गुण परस्पर अभिन्न नहीं हैं। अनेक उपकारियोंमेंसे प्रत्येक
उपकारी द्वारा किये जानेवाले उपकारमें तथा अन्य उपकारी द्वारा किये जानेवाले उपकारमें विरोध है ।
( ६ ) गुणिदेशकी अपेक्षासे भी गुण अभिन्न नहीं हैं। अन्यथा प्रत्येक गुणका आश्रयभूत गुणिरूप देश तथा
स्वभिन्न गुणके आश्रयभूत गुणिरूप देशमें भेद न होनेपर, भिन्न पदार्थोंके गुणोंके भी जो गुणिरूप देश हैं, उनका
पूर्वोक्त गुणिरूप देशके साथ अभेदका प्रसंग आ जायेगा । ( ७ ) संसर्गकी अपेक्षा भी गुण भिन्न हैं। अन्यथा
एक पदार्थके साथ जितने संसर्ग करनेवाले होते हैं, उतने ही संसर्गोंके परस्पर भिन्न होनेपर भी, उन संसर्गोंको
अभिन्न मानने पर, संसर्ग करनेवालोंमें भेद उपस्थित हो जायेगा । ( ८ ) तथा शब्दकी अपेक्षासे भी गुण
भिन्न नहीं हैं । अन्यथा सभी गुणोंकी एक शब्दके द्वारा वाच्यता होनेपर, उनके आश्रयभूत सभी पदार्थोंकी
एक शब्द द्वारा वाच्यता होनेकी आपत्ति उपस्थित हो जानेसे उन सभी पदार्थोंमेंसे प्रत्येक पदार्थके वाचक
शब्दोंकी निष्फलताका प्रसंग उपस्थित हो जायेगा ।
( स्पष्टीकरण : जब द्रव्यार्थिक नयकी गौणता और पर्यायार्थिक नयकी प्रधानता होती है, तब एक
पदार्थका अस्तित्व धर्म और उसी पदार्थके अन्य शेष अनंत धर्मोंमें काल आदिकी दृष्टिसे अभेदकी संभाव्यता
नहीं होती । ( १ ) एक समयमें पदार्थकी एक ही पर्याय होती है—अनेक नहीं । उत्तर पर्यायसे युक्त उसी
पदार्थका पूर्व पर्यायसे युक्त पदार्थसे भेद होता है । यदि पूर्व पर्याययुक्त और उत्तर पर्याययुक्त पदार्थमें भेद
स्वीकार न किया तो बाल्यावस्था और कुमारावस्थामें भेद नहीं होगा, तथा बालक कभी कुमारावस्थाके रूपमें
१. प्रोफेसर एम० जी० कोठारीके सौजन्यसे ।
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