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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 458 में से

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पृष्ठ 260

२०८ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २३
“आमोसु य पक्कासु य विपच्चमाणासु मंसपेसीसु।
आयंतिअमुववाओ भणिओ उ णिगोअजीवाणं ॥ १॥
मज्जे मधुम्मि मंसम्मि णवणीअम्मि चउत्थए।
उप्पज्जंति अणंता तन्वण्णा तत्थ जंतूणो ॥ २॥
मेहुणसण्णारूढो णवलक्ख हणेइ सुहुमजीवाणं।
केवलिणा पण्णत्ता सदहिअव्वा सया कालं ॥ ३ ॥”२
तथाहि—
“इत्थीजोणीए संभवंति बेइंदिया उ जे जीवा।
इक्को व दो व तिण्णि व लक्खपुहुत्तं उ उक्कोसं ॥ ४ ॥
पुरिसेण सह गयाए तेसिं जीवाण होइ उद्दवणं।
वेणुगदिट्ठंतेणं तत्तायसलागणाएणं ॥ ५॥”
संसक्तायां योनौ द्वींद्रिया एते। शुक्रशोणितसंभवास्तु गर्भजपञ्चेन्द्रिया इमे ।
“पंचिंदिया मणुस्सा एगनरभुत्तारिगब्भम्मि।
उक्कोसं णवलक्खा जायंति एगवेलाए ॥ ६ ॥
णवलक्खाणं मज्झे जायइ इक्कस्स दोण्ह य समत्ती।
सेसा पुण एमेव य विलयं वच्चंति तत्थेव ॥ ७॥”
“कच्चे, पक्के और अग्निमें पकाये हुए मांसकी प्रत्येक अवस्थाओंमें अनन्त निगोद जीवोंकी उत्पत्ति
होती रहती है ॥ १ ॥
मद्य, मधु, मांस और मक्खनमें मद्य, मधु, मांस और मक्खनके रंगके अनंत जीवोंकी उत्पत्ति
होती है ॥ २ ॥
केवली भगवान्ने मैथुनके सेवन करनेमें नौ लाख जीवोंका घात बताया है, इसमें सदा विश्वास
करना चाहिये ॥ ३ ॥”
तथा—
स्त्रियोंकी योनिमें दो इन्द्रिय जीव उत्पन्न होते हैं। इन जीवोंकी संख्या एक, दो, तीनसे लगा कर
लाखों तक पहुँच जाती है ॥ ४ ॥
जिस समय पुरुष स्त्रीके साथ संभोग करता है, उस समय जैसे अग्निसे तपाई हुई लोहेकी सलाईको
बाँसको नलीमें डालनेसे नलीमें रखे हुए तिल भस्म हो जाते हैं, वैसे ही पुरुषके संयोगसे योनिमें रहनेवाले
सम्पूर्ण जीवोंका नाश हो जाता है ॥ ५ ॥”
अब रज और वीर्यसे उत्पन्न होनेवाले गर्भज पंचेन्द्रिय जीवोंकी संख्या कहते हैं—
पुरुष और स्त्रीके एक बार संयोग करनेपर स्त्रीके गर्भमें अधिकसे अधिक नौ लाख पंचेन्द्रिय जीव .
उत्पन्न होते हैं ॥ ६ ॥
इन नौ लाख जीवोंमें एक या दो जीव जीते हैं, बाकी सब जीव नष्ट हो जाते हैं ॥ ७ ॥”
१. रत्नशेखरसूरिकृतसम्बोधसप्ततिकायां ६६, ६५, ६३ ।
२. छाया-आमासु च पक्वासु च विपच्यमानासु मांसपेशोषु । आत्यन्तिकमुपपादो भणितस्तु निगोदजीवानाम् ॥
मद्ये मधुनि मांसे नवनीते चतुर्थके । उत्पद्यन्तेऽनन्ताः तद्वर्णास्तत्र जंतवः ।
मैथुनसंज्ञारूढो नवलक्षं हन्ति सूक्ष्मजीवानाम् । केवलिना प्रज्ञप्ताः श्रद्धातव्याः सदाकालम् ॥
स्त्रीयोनौ सम्भवन्ति द्वीन्द्रियास्तु ये जीवाः । एको वा द्वौ वा त्रयो वा लक्षपृथुत्वं चोत्कृष्टम् ॥
पुरुषेण सह गतायां तेषां जीवानां भवति उद्ध्रवणम् । वेणुकदृष्टान्तेन तप्तायसशलाकाज्ञातेन ॥
पंचेन्द्रिया मनुष्या एकनरभुक्तानारीगर्भे । उत्कृष्टं नवलक्षा जायन्ते एकवेलायाम् ॥
नवलक्षाणां मध्ये जायते एकस्य द्वयोर्वा समाप्तिः । शेषाः पुनरेवमेव च विलयं व्रजन्ति तत्रैव ॥