स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] . स्याद्वादमञ्जरी २०५
प्रतिभासन्ते, न पुनरात्माख्यं किमपि द्रव्यम् । एवं घटोऽपि कुण्डलौष्ठपृथुबुध्नोदरपूर्वापरादि-
भागाद्यवयवापेक्षया विविच्यमानः पर्याया एव, न पुनर्धटाख्यं तदतिरिक्तं वस्तु । अतएव
पर्यायास्तिकनयानुपातिनः पठन्ति—
“भागा एव हि भासन्ते संनिविष्टास्तथा तथा ।
तद्वान्नैव पुनः कश्चिन्निर्भागः संप्रतीयते” ॥
इति । ततश्च द्रव्यपर्यायोभयात्मकत्वेऽपि वस्तुनो द्रव्यनयार्पणया पर्यायनयानर्पणया च द्रव्य-
रूपता, पर्यायनयार्पणया द्रव्यनयानर्पणया च पर्यायरूपता, उभयनयार्पणया च तदुभयरूपता ।
अत एवाह वाचकमुख्यः “अर्पितनर्पितासिद्धेः”१ इति । एवंविधं द्रव्यपर्यायात्मकं वस्तु त्वमेवा-
दीदृशस्त्वमेव दर्शितवान् नान्य इति काक्वावधारणावगतिः ॥
नन्वन्वेकाभिधानप्रत्यययोग्यं द्रव्यम्, अन्याभिधानप्रत्ययविषयाश्च पर्यायाः । तत्कथ-
मेकमेव वस्तूभयात्मकम् ? इत्याशङ्क्य विशेषणद्वारेण परिहरति आदेशभेदेत्यादि । आदेशभेदेन
सकलादेशविकलादेशलक्षणेन आदेशद्वयेन उदिताः प्रतिपादिताः सप्तसंख्या भङ्गा वचनप्रकारा
यस्मिन् वस्तुनि तत्तथा । ननु यदि भगवता त्रिभुवनवन्धुना निर्विशेषतया सर्वेभ्य एवंविधं
वस्तुतत्त्वमुपदर्शितम्, तर्हि किमर्थं तीर्थान्तरीयाः तत्र विप्रतिपद्यन्ते ? इत्याह बुधरूपवेद्यम्
इति । बुध्यन्ते यथावस्थितं वस्तुतत्त्वं सारेतरविषयविभागविचारणया इति बुधाः । प्रकृष्टाः
बुधाः बुधरूपाः नैसर्गिकाधिगमिकान्यतरसम्यग्दर्शनविशदीकृतज्ञानशालिनः प्राणिनः । तैरेव
उस समय केवल ज्ञान, दर्शन आदि पर्यायोंका ही ज्ञान होता है, आत्मा कोई भिन्न पदार्थ दृष्टिगोचर नहीं
होता । इसी प्रकार जब हम घटके मोटेपन, गोलपन, पूर्वभाग, अपरभाग आदि अवयवोंको देखते हैं, उस
समय हमें घट द्रव्यका अलग ज्ञान न होकर घटकी पर्यायोंका ही ज्ञान होता है । अतएव पर्यायास्तिक नयको
माननेवाले कहते हैं—
“उस प्रकारसे पारस्परिक घनिष्ठ संयोगको प्राप्त अंश-अवयव-ही प्रतिभासित होते हैं । अंशवान्
पदार्थ ही प्रतिभासित होता है, कोई निरंश द्रव्य दिखाई ही नहीं देता ।”
अतएव प्रत्येक वस्तुके द्रव्य, पर्याय और उभयरूप होनेपर भो द्रव्यनयकी मुख्यतासे और पर्याय-
नयकी गौणतासे वस्तुका ज्ञान द्रव्यरूप, पर्यायनयकी मुख्यता और द्रव्यनयकी गौणतासे वस्तुका ज्ञान पर्याय
रूप, तथा द्रव्य और पर्याय दोनोंकी प्रधानतासे वस्तुका ज्ञान उभयरूप होता है । वाचकमुख्य उमास्वातिने
कहा भी है—‘‘द्रव्य और पर्यायकी मुख्यता और गौणतासे वस्तुकी सिद्धि होती है ।” वस्तुका यह द्रव्य और
पर्यायरूप स्वरूप आपने ( जिन भगवान्ने ) ही प्ररूपण किया है, दूसरे किसीने नहीं । यहाँ अवधारणाका ज्ञान
काकुसे होता है ।
शंका—द्रव्य और पर्याय दोनों भिन्न-भिन्न अभिधान और भिन्न-भिन्न ज्ञानके विषय होते हैं अतएव
एक वस्तुको द्रव्य और पर्याय दोनों रूप नहीं कह सकते । समाधान—इस शंकाका परिहार 'आदेशभेद'
विशेषणसे किया गया है । हमलोग सकल और विकल आदेशके भेदसे द्रव्य और पर्यायरूप वस्तुको मानते
हैं । इसी सकलादेश ( प्रमाण ) और विकलादेश ( नय ) के ऊपर सप्तभंगी नय अवलम्बित है । शंका—
यदि तीनों लोकोंके बन्धु जिन भगवान्ने प्रत्येक वस्तुका सामान्य रूपसे सब लोगोंके लिये सप्तभंगो द्वारा
विवेचन किया है, तो अन्य वादी लोग सप्तभंगीके सिद्धांतको क्यों नहीं मानते ? समाधान—सप्तभंगी नयके
सूक्ष्म तत्त्वको निसर्गज और अधिगमज सम्यग्दर्शनसे विशुद्ध उत्कृष्ट विद्वान हो समझ सकते हैं । केवल अपने
१. तत्त्वार्थाधिगमसूत्रे ५-३२ ।