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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 458 में से

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पृष्ठ 262

२ स्यान्नास्त्येव सर्वमिति निषेधकल्पनया द्वितीयः । ३ स्यादस्त्येव स्यान्नास्त्येवेति क्रमतो
विधिनिषेधकल्पनया तृतीयः । ४ स्यादवक्तव्यमेवेति युगपद्विधिनिषेधकल्पनया चतुर्थः । ५
स्यादस्त्येव स्यादवक्तव्यमेवेति विधिकल्पनया युगपद्विधिनिषेधकल्पनया च पञ्चमः । ६ स्यान्ना-
स्त्येव स्यादवक्तव्यमेवेति निषेधकल्पनया युगपद्विधिनिषेधकल्पनया च षष्ठः । ७ स्यादस्त्येव
स्यान्नास्त्येव स्यादवक्तव्यमेवेति क्रमतो विधिनिषेधकल्पनया युगपद्विधिनिषेधकल्पनया च
सप्तमः ॥
तत्र स्यात्कथंचित् स्वद्रव्यक्षेत्रकालभावरूपेणास्त्येव सर्वं कुम्भादि, न पुनः परद्रव्यक्षेत्र-
कालभावरूपेण । तथाहि—कुम्भो द्रव्यतः पार्थिवत्वेनास्ति, नाप्यादिरूपत्वेन । क्षेत्रतः पाटलिपुत्र-
कत्वेन, न कान्यकुब्जादित्वेन । कालतः शैशिरत्वेन । न वासन्तिकादित्वेन । भावतः श्याम-
त्वेन, न रक्तादित्वेन । अन्यथेतररूपापत्त्या स्वरूपहानिप्रसङ्ग इति । अवधारणं चात्र भङ्गेऽ-
नभिमतान्र्थव्यावृत्त्यर्थमुपात्तम् इतरथानभिहिततुल्यतैवास्य वाक्यस्य प्रसज्येत, प्रतिनियतस्वार्था-
नभिधानात् । तदुक्तम्—
“वाक्येऽवधारणं तावदनिष्टार्थनिवृत्तये ।
कर्तव्यमन्यथानुक्तसमत्वात् तस्य कुत्रचित्” ॥
तथाप्यस्त्येव कुम्भ इत्येतावन्मात्रोपादाने कुम्भस्य स्तम्भाद्यस्तित्वेनापि सर्वप्रकारेणास्तित्वप्राप्तेः
है ( स्यादस्ति ) ; २ प्रत्येक वस्तु निषेध धर्मसे कथंचित् नास्तित्व रूप ही है ( स्यान्नास्ति ) ; ३ प्रत्येक
वस्तु क्रमसे विधि, निषेध दोनों धर्मोंसे कथंचित् अस्तित्व और नास्तित्व दोनों रूप ही है ( स्यादस्तिनास्ति ) ;
४ प्रत्येक वस्तु एक साथ विधि, निषेध धर्मोंसे कथंचित् अवक्तव्य ही है ( स्यादवक्तव्य ) ; ५ प्रत्येक वस्तु
विधि तथा एक साथ विधि-निषेध धर्मोंसे कथंचित् नास्तित्व और अवक्तव्य रूप ही है ( स्यादस्ति अवक्तव्य ) ;
६ प्रत्येक वस्तु निषेध तथा एक साथ विधि-निषेध धर्मोंसे कथंचित् नास्तित्व और अवक्तव्य रूप ही है
( स्यान्नास्ति अवक्तव्य ) ; ७ प्रत्येक वस्तु क्रमसे विधि, निषेध तथा एक साथ विधि-निषेध धर्मोंसे कथंचित्
अस्तित्व, नास्तित्व और अवक्तव्य रूप ही है ( स्यादस्तिनास्ति अवक्तव्य ) ।
( १ ) प्रत्येक वस्तु अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा कथंचित् अस्तित्व रूप ही है,
और दूसरे द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा कथंचित् नास्तित्व रूप ही है । जैसे, घड़ा द्रव्यकी अपेक्षा
पार्थिव रूपसे विद्यमान है, जल रूपसे नहीं; क्षेत्र ( स्थान ) की अपेक्षा पटना नगरकी अपेक्षा मौजूद है,
कन्नोज आदिकी अपेक्षासे नहीं; काल ( समय ) की अपेक्षा शीत ऋतुकी दृष्टिसे है, वसन्त ऋतु आदिकी
दृष्टिसे नहीं; तथा भाव ( स्वभाव ) की अपेक्षा काले रूपसे मौजूद हैं, लाल आदि रूपसे नहीं । यदि पदार्थोंका
अस्तित्व स्व चतुष्टय ( द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव ) की अपेक्षाके बिना ही स्वीकार किया जाय, तो पदार्थोंका
स्वरूप सिद्ध नहीं हो सकता । क्योंकि जब तक वस्तुके एक स्वरूपकी दूसरे स्वरूपसे व्यावृत्ति न की जाय,
तब तक वस्तुका स्वरूप नहीं बन सकता । इसीलिए यहाँ अनिष्ट पदार्थोंका निराकरण करनेके लिए 'एव'
( अवधारण ) का प्रयोग किया है । यदि 'एव' का प्रयोग न किया जाय, तो अनिच्छित वस्तुका प्रसंग
मानना पड़े । कहा भी है—
“वाक्यमें अवधारणार्थक 'एव' का प्रयोग अनिष्ट अर्थ निराकरण करनेके लिए करना चाहिए; क्योंकि
अवधारणार्थक शब्दके प्रयोगके अभावमें वह उक्त वाक्य अनुक्त वाक्यके समान बन जाता है ।”
शंका—वाक्यमें अवधारणार्थक प्रयोग करने पर भी 'घट अस्तित्व रूप ही हैं' ( अस्त्येव कुम्भः ),
१. तत्त्वार्थश्लोकवार्तिके १-६-५३ ।