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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 458 में से

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पृष्ठ 267

अन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] स्याद्वादमञ्जरी २१५
स्तित्वस्य स एव शेषविशेषाणामिति सम्बन्धेनाभेदवृत्तिः । ५ य एव चोपकारोऽस्तित्वेन स्वानुर-
क्तत्वकरणं स एव शेषैरपि गुणैरित्युपकारेणाभेदवृत्तिः । ६ य एव गुणिनः सम्बन्धी देशः
क्षेत्रलक्षणोऽस्तित्वस्य स एवान्यगुणानामिति गुणिदेशेनाभेदवृत्तिः । ७ य एव चैकवस्त्वात्म-
नास्तित्वस्य संसर्गः स एव शेषधर्माणामिति संसर्गेणाभेदवृत्तिः । अविष्वग्भावेऽभेदः प्रधानम्
भेदो गौणः, संसर्गे तु भेदः प्रधानम् अभेदो गौण इति विशेषः । ८ य एव चास्तीति शब्दोऽ-
स्तित्वधर्मात्मकस्य वस्तुनो वाचकः स एव शेषानन्तधर्मात्मकस्यापीति शब्देनाभेदवृत्तिः पर्या-
यार्थिकनयगुणभावे द्रव्यार्थिकनयप्राधान्याद् उपपद्यते ॥
तादात्म्य सम्बन्ध अस्तित्वमें रहता है, उसी तरह उक्त सम्बन्ध अन्य धर्मोंमें भी रहता है, इसलिये सम्बन्धकी
अपेक्षा अस्तित्व आदि धर्म अभिन्न हैं ( ५ ) उपकार—जो उपकार अस्तित्वके द्वारा अपने स्वरूपमें अनुराग
उत्पन्न करता है, वही उपकार अन्य धर्मोंके द्वारा भी अनुराग पैदा करता है, अतएव उपकारकी अपेक्षा
अस्तित्व आदि धर्मोंमें अभेद है । ( ६ ) गुणिदेश ( द्रव्यका आधार )—जो क्षेत्र द्रव्यसे सम्बन्ध रखनेवाले
अस्तित्वका है, वही क्षेत्र अन्य धर्मोंका है, अतएव अस्तित्व आदि धर्मोंमें अभेद भाव है । ( ७ ) संसर्ग—
एक वस्तुकी अपेक्षासे जो संसर्ग अस्तित्वका है, वही संसर्ग अन्य धर्मोंका भी है, इसलिए संसर्गकी अपेक्षा
अस्तित्व आदि धर्मोंमें अभेद हैं । सम्बन्धमें अभेदकी प्रधानता और भेदकी गौणता, तथा संसर्गमें भेदकी
प्रधानता और अभेदकी गौणता होती है । ( ८ ) शब्द—जिस 'अस्ति' शब्दसे अस्तित्व धर्मका ज्ञान होता
है, उसी 'अस्ति' शब्दसे अन्य धर्म भी जाने जाते हैं, अतएव शब्दकी अपेक्षा अस्तित्व आदि धर्म परस्पर
अभिन्न हैं । जिस समय पर्यायार्थिक नयकी गौणता और द्रव्यार्थिक नयकी प्रधानता होती हैं, उस समय
पदार्थोंके धर्मोंमें अभेद भावका ज्ञान होनेसे अभेदवृत्ति होती है ।
[ स्पष्टीकरण: ( १ ) काल—'जीव आदि पदार्थ 'कथंचित् अस्तिरूप हो हैं'—इस उदाहरणमें
जीव आदि रूप पदार्थमें जितने काल तक अस्तित्व गुण विद्यमान रहता है, उतने काल तक और
भी अनन्त धर्म पाये जाते हैं । इस प्रकार जीव आदि एक पदार्थमें अस्तित्व एवं अन्य धर्मोंकी स्थिति
कालकी दृष्टिसे अभेद रूप है । इसी तरह घटका उदाहरण लिया जा सकता है । जितने काल तक घटमें
अस्तित्व धर्म रहता है, उतने काल तक घटके अन्य धर्म भी विद्यमान रहते हैं । जिस कालमें घटका अस्तित्व
नष्ट हो जाता है उस कालमें घटके अन्य धर्मोंका भी अभाव हो जाता है । इससे स्पष्ट है कि पदार्थके
अस्तित्व धर्मके साथ उसके अन्य धर्मोंका अविनाभाव—तादात्म्य-अभेद-सिद्ध हो जाता है । जीव द्रव्यमें
रहनेवाला अस्तित्व गुण अनादिनिधन है इसलिये उसका ज्ञान सामान्यरूप धर्म भी अनादि निधन होता है,
क्योंकि जीवके अस्तित्वसे ज्ञानगुण कालकी दृष्टिसे अभिन्न है । अतएव पदार्थके अस्तित्व धर्मका जितना
काल होता है, उतना ही काल उसके अन्य धर्मोंका उस पदार्थमें .अस्तिरूप रहनेका होता है । इसलिये
पदार्थके अस्तित्व धर्म और उसके शेष धर्मोंमें कालको दृष्टिसे अभेद है । ( २ ) आत्मरूप—जिस प्रकार
अस्तित्व गुणका पदार्थका स्वभाव है, उसी प्रकार अन्य अनन्त गुण भी पदार्थके स्वभाव हैं । इस प्रकार
एक पदार्थमें पदार्थके गुण होना रूप स्वभावसे पदार्थका अस्तित्व धर्म एवं शेष अनन्त धर्म भी रहते हैं ।
अतएव एक पदार्थमें अस्तित्व आदि सभी धर्मोंकी स्वस्वरूप ( आत्मस्वरूप ) की दृष्टिसे अभेदवृत्ति रहतो
है । जिस प्रकार अस्तित्व गुणका जीव पदार्थका गुण होना स्वस्वरूप है, उसी प्रकार अन्य ज्ञान आदि रूप
अनन्त गुणोंका जीव पदार्थका गुण होना भी स्वस्वरूप है । अतः जीवरूप एक पदार्थमें अस्तित्व और अन्य
शेष ज्ञान आदि रूप अनन्त धर्मकी आत्मस्वरूप दृष्टिसे अभेद वृत्ति होती है । जिस प्रकार घटका गुण
होना अस्तित्वका स्वरूप है, उसी प्रकार उसके अन्य शेष अनन्त धर्मोंका भी घटका गुण होना स्वस्वरूप
है । अतः घटरूप एक पदार्थमें अस्तित्व और अन्य शेष अनंत धर्मोंकी आत्मस्वरूपकी दृष्टिसे अभेद वृत्ति
है । ( ३ ) अर्थ—जो पदार्थ अस्तित्व गुणका आधार होता है, वही अन्य अक्रमभावी पर्यायों-गुणोंका-आधार
होता है । इस प्रकार एक द्रव्यका अस्तित्व धर्म और उसके अन्य अनन्त गुणों जब एक ही पदार्थ आधार