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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 458 में से

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पृष्ठ 268

२१६ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लो. २३
होता है, तब अर्थकी दृष्टिसे उन गुणोंमें अभेद होता है। जिस प्रकार अस्तित्व गुणका जीव पदार्थ आश्रय
होता है, उसी प्रकार अन्य शेष अनन्त धर्मोंका भी जीवद्रव्य आश्रय होता है। अतः अस्तित्व धर्म और
अन्य शेष ज्ञान आदिरूप अनन्त धर्मंका एक जीव पदार्थके आश्रित होनेसे अर्थकी दृष्टिसे उन धर्मोंमें अभेद हैं।
(४) सम्बन्ध—जिस प्रकार अस्तित्व धर्मका पदार्थके साथ कथंचित् तादात्म्यरूप सम्बन्ध होता है, वैसे ही
कथंचित् तादात्म्य सम्बन्ध अन्य समस्त धर्मोंका उस पदार्थके साथ रहता है। इस प्रकार पदार्थके अस्तित्व
धर्मका और उसके अन्य शेष धर्मोंका उसी पदार्थके साथ कथंचित् तादात्म्य सम्बन्ध अर्थात् अभेद होनेसे,
उन सभी धर्मोंमें सम्बन्धकी दृष्टिसे अभेद होता है। इस प्रकार अस्तित्व धर्मका जीव पदार्थके साथ कथंचित्
तादात्म्य सम्बन्ध होनेसे अस्तित्व धर्म तथा अन्य शेष ज्ञान आदि रूप अनन्त धर्ममें सम्बन्धकी दृष्टिसे अभेद
होता है। (५) उपकार—पदार्थका अस्तित्व गुणके द्वारा स्वस्वरूपसे युक्त किया जाना पदार्थका अस्तित्व
गुणकृत उपकार होता है। इसी प्रकार उस पदार्थके शेष अन्य गुणोंके द्वारा स्वस्वरूपसे युक्त किया जाना, उसी
पदार्थका शेष गुणकृत उपकार होता है। पदार्थके अस्तित्व गुणकृत तथा उस पदार्थके आश्रित अन्य शेष गुणों
द्वारा किये जानेवाले उपकारके एक होनेसे अस्तित्व गुण तथा उसके अन्य शेष गुणोंमें उपकारकी दृष्टिसे अभेद
है। आचार्यप्रवर श्रीविद्यानन्दने उपकार शब्दका अर्थ 'स्वानुरक्तत्वकरणं' किया है—अर्थात् अपनी
विशेषताको पदार्थमें निर्माण करना। उदाहरणार्थ, नीलवर्ण पुद्गलका गुण है, वह गुण पुद्गलमें अपने
वैशिष्ट्यका निर्माण करता है। पदार्थमें अस्तित्व गुण अपने वैशिष्ट्यको निर्माण करता है। यदि अस्तित्व
गुणका वैशिष्ट्य पदार्थमें न हो तो पदार्थका अभाव हो जायेगा। इस वैशिष्ट्यको पदार्थमें निर्माण करना
ही पदार्थका गुणकृत उपकार है। जिस प्रकार अस्तित्वगुण पुद्गल पदार्थमें अपने वैशिष्ट्यको निर्माण कर
पदार्थका उपकार करता है—उसे स्वानुरक्त करता है, उसी प्रकार नीलत्व आदि रूप अन्य गुण भी पुद्गल
पदार्थमें अपने वैशिष्ट्यको निर्माण कर उसी पदार्थका उपकार करता है—उसे स्वानुरक्त करता है। अतः
अस्तित्व धर्म और अन्य शेष नीलत्व आदि धर्म, पुद्गल पदार्थमें अपने वैशिष्ट्यके निर्माणकर्ता होनेके कारण
उपकारकी दृष्टिसे अभिन्न हैं। (६) गुणिदेश—जो अस्तित्व धर्मका गुणिदेश होता है वही अन्य धर्मोंका भी
होता है। इस प्रकार गुणिदेशकी दृष्टिसे अस्तित्व धर्म तथा अन्य शेष धर्मोंमें अभेद है। गुणी अर्थात् गुणवान्
पदार्थके जितने प्रदेशोंमें अस्तित्व धर्म होता है, उतने ही प्रदेशोंमें अन्य शेष गुणोंका होना ही अस्तित्व गुण
तथा अन्य शेष गुणोंमें गुणिदेशकी दृष्टिसे अभेद सिद्ध करता है। पदार्थके सभी प्रदेशोंमें अस्तित्व गुण होता
है। इस अस्तित्व गुणके समान पदार्थके सभी प्रदेशोंमें उसके अन्य शेष गुण भी होते हैं। अस्तित्व गुण
जीवके कुछ प्रदेशोंमें हो, और कुछमें न हो—ऐसा कभी नहीं होता। यह गुण जीवके सभी प्रदेशोंमें पाया
जाता है। जिस प्रकार अस्तित्व गुण जीवके सभी प्रदेशोंमें होता है, उसी प्रकार जीवके शेष अन्य ज्ञान आदि
अनंत गुण भी होते हैं। अतः जीवका अस्तित्व गुण और उसके शेष ज्ञान आदि गुणमें गुणिदेशकी दृष्टिसे अभेद
है। (७) संसर्ग—एक पदार्थके रूपसे अस्तित्व धर्मका पदार्थके साथ जो संसर्ग होता है, वही एक वस्तुके
स्वाभावरूपसे उसी पदार्थके अन्य शेष धर्मोंका उसी पदार्थके साथ संसर्ग होता है। इस प्रकार एक पदार्थके
साथ एक वस्तुके स्वभावके रूपसे अस्तित्व धर्मका संसर्ग होनेसे तथा उसी पदार्थके अन्य शेष धर्मोंका एक
वस्तुके स्वाभावरूपसे उसी पदार्थके साथ संसर्ग होनेसे, उस पदार्थका अस्तित्व धर्म और उसी पदार्थके अन्य
शेष धर्मोंमें संसर्गकी दृष्टिसे अभेद होता है। संसर्ग दो भिन्न पदार्थोंमें होता है। लोकव्यवहारमें पर्यायार्थिक-
नयकी दृष्टिसे गुण-गुणीमें भेद समझकर व्यवहार किया जाता है। गुण और गुणीमें द्रव्यार्थिकनयकी दृष्टिसे
भेदका अभाव होता है—अर्थात् अभेद होता है, फिर भी 'यह अग्निकी उष्णता है'—यहाँ अग्नि और
उष्णतामें वस्तुतः अभेद होने पर भी उनमें भेद समझकर व्यवहार किया जाता है। इस व्यवहारसे उनके
भेदका संस्कार जो दृढ़ हो गया होता है, उसका अभाव द्रव्यार्थिक नयकी सहायतासे किया जाता है। कथंचित्
तादात्म्य सम्बन्धमें अभेद मुख्य होता है और भेद गौण, तथा संसर्गमें भेद मुख्य होता है और अभेद गौण ।
यही तादात्म्य संबंध तथा संसर्ग (संयोग) संबंधमें भेद है। कथंचित् तादात्म्य कथंचित् भेदाभेद रूप होता