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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 458 में से

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पृष्ठ 264

२१२ श्रीमद्‌राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २३
विवक्षावशाच्चानयोः प्रधानोपसर्जनभावः। एवमुत्तरभङ्गेष्वपि ज्ञेयम्, “अर्पितानर्पितसिद्धेः”
इति वाचकवचनात् । इति द्वितीयः ॥
तृतीयः स्पष्ट एव । द्वाभ्यामस्तित्वनास्तित्वधर्माभ्यां युगपत्प्रधानतयार्पिताभ्याम् एकस्य
वस्तुनोऽभिधित्सायां तादृशस्य शब्दस्यासम्भवाद् अवक्तव्यं जीवादिवस्तु । तथाहि—सद्-
सत्त्वगुणद्वयं युगपद् एकत्र सदित्यनेन वक्तुमशक्यम्, तस्यासत्त्वप्रतिपादनासमर्थत्वात् । तथा-
ऽसदित्यनेनापि, तस्य सत्त्वप्रत्यायनसामर्थ्याभावात् । न च पुष्पदन्तादिवत् साङ्केतिकमेकं
पदं तद्वक्तुं समर्थम्, तस्यापि क्रमेणार्थद्वयप्रत्यायने सामर्थ्योपपत्तेः, शतृशानयोः संकेतित-
सच्छब्दवत्। अतएव द्वन्द्वकर्मधारयवृत्त्योर्वाक्यस्य च न तद्वाचकत्वम् । इति सकलवाचक-
रहितत्वाद् अवक्तव्यं वस्तु युगपत्सत्त्वासत्त्वाभ्यां प्रधानभावार्पिताभ्यामाक्रान्तं व्यवतिष्ठते ।
न च सर्वथाऽवक्तव्यम्, अवक्तव्यशब्देनाप्यनभिधेयत्वप्रसङ्गात् । इति चतुर्थः । शेषास्त्रयः
सुगमाभिप्रायाः ॥
न च वाच्यमेकत्र वस्तुनि विधीयमाननिषिध्यमानानन्तधर्माभ्युपगमनेनानन्तभङ्गीप्र-
नास्तित्व धर्मकी प्रधानता और अस्तित्व धर्मकी गौणता होती है । प्रथम भंगमें अस्तित्व धर्मकी प्रधानता
और नास्तित्व धर्मकी गौणता, तथा द्वितीय भंगमें नास्तित्व धर्मकी प्रधानता और अस्तित्व धर्मकी गौणता
होती है । जो धर्म गौण होता है उसका अभाव नहीं होता । ) इस प्रकार उत्तरभंगोंमें भी समझना चाहिये ।
उमास्वाति वाचकने कहा भी है—“प्रधान और गौणको अपेक्षासे पदार्थोंकी विवेचना होती है ।” यह
दूसरा भंग है ।
(३-७) तीसरा भंग स्पष्ट है। जब हम क्रमसे वस्तुको स्वरूपकी अपेक्षा अस्ति, और पररूपकी अपेक्षासे
नास्ति कहते हैं, उस समय वस्तुका अस्तिनास्तिरूपसे ज्ञान होता है । यह स्यादस्तिनास्ति नामका तीसरा भंग
है । (४) हम वस्तुके अस्ति और नास्ति धर्मको एक साथ नहीं कह सकते । जिस समय जीवको सत् कहते हैं,
उस समय असत्, और जिस समय असत् कहते हैं, उस समय सत् नहीं कह सकते । क्योंकि अस्ति और नास्ति
दोनों परस्पर विरुद्ध हैं । शंका—जिस प्रकार चन्द्र और सूर्य दोनों वस्तुओंका ज्ञान ‘पुष्पदंत’ शब्दसे हो
जाता है, उसो तरह अस्ति और नास्ति दोनोंका एक साथ ज्ञान किसी एक सांकेतिक शब्दसे मानना चाहिये ।
समाधान—पहले तो कोई ऐसा शब्द नहीं, जिससे अस्ति और नास्ति दोनों धर्मोंका एक साथ ज्ञान
किया जा सके । यदि दोनों धर्मोंको कहनेवाला कोई एक शब्द मान भी लिया जाय, तो अस्तित्व और
नास्तित्व दोनों धर्मोंका क्रमसे ही ज्ञान हो सकता है । व्याकरणमें ‘सत्’ शब्दसे शतृ और शान दोनोंका क्रम-
पूर्वक ज्ञान होता है, एक साथ नहीं । अतएव द्वन्द्व, कर्मधारय अथवा किसी एक वाक्यसे सत्त्व और असत्त्व
दोनों धर्मोंका एक साथ ज्ञान नहीं हो सकता । परस्पर विरुद्ध अस्तित्व और नास्तित्व दोनोंका ज्ञान
किसी एक शब्दसे नहीं होता, अतएव प्रत्येक वस्तु एक साथ अस्ति और नास्ति भावकी प्रधानता होनेसे
कथंचित् अवक्तव्य है । यदि हम पदार्थको सर्वथा अवक्तव्य मानें, तो हम पदार्थको अवक्तव्य शब्दसे भी नहीं
कह सकते, अतएव प्रत्येक पदार्थको कथंचित् अवक्तव्य ही मानना चाहिये । यह स्यादवक्तव्य नामका चौथा
भंग है । [( ५ ) जब हम वस्तुको स्वरूपकी अपेक्षा सत् कह कर उसकी एक साथ अस्ति-नास्ति रूप अवक्तव्य
रूपसे विवेचना करना चाहते हैं, उस समय वस्तु स्यादस्ति अवक्तव्य नामसे कही जाती है । ( ६ ) जब हम
वस्तुकी नास्तित्व धर्मकी विवक्षासे एक साथ अस्ति-नास्ति रूप अवक्तव्य रूपसे विवेचना करना चाहते हैं,
उस समय वस्तु स्यान्नास्ति अवक्तव्य कही जाती है । ( ७ ) प्रत्येक वस्तु क्रमसे स्व और पर रूपकी अपेक्षा
अस्ति-नास्ति होनेपर भी एक साथ अस्ति-नास्ति रूप अवक्तव्य होनेके कारण स्यादस्तिनास्ति अवक्तव्य
रूप है । ]
शंका—एक वस्तुमें जिनका विधान और निषेध किया जाता है, ऐसे अनंत धर्मोंका अस्तित्व स्वीकार