स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्य. यो. व्य. श्लोक २३ ] स्याद्वादमञ्जरी २१७
द्रव्यार्थिकगुणभावे पर्यायार्थिकप्राधान्ये तु न गुणानामभेदवृत्तिः सम्भवाद् । समकाल-
मेकत्र नानागुणानामसम्भवात्, सम्भवे वा तदाश्रयस्य तावद्वा भेदप्रसङ्गात् । नानागुणानां
सम्बन्धिना आत्मरूपस्य च भिन्नत्वात्, आत्मरूपाभेदे तेषां भेदस्य विरोधात् । स्वाश्रयस्यार्थ-
स्यापि नानात्वाद्, अन्यथा नानागुणाश्रयत्वस्य विरोधात् । सम्बन्धस्य च सम्बन्धिभेदेन
भेददर्शनाद् नानासम्बन्धिभिरेकत्र सम्भवाघटनात् । तैः क्रियमाणस्योपकारस्य च प्रतिनियत-
रूपस्यानेकत्वात् अनेकैरुपकारिभिः क्रियमाणस्योपकारस्य विरोधात् । गुणिदेशस्य प्रतिगुणं
भेदात् तद्भेदे भिन्नार्थगुणानामपि गुणिदेशाभेदप्रसङ्गात् । संसर्गस्य च प्रतिसंसर्गिभेदात्
तद्भेदे संसर्गिभेदविरोधात् । शब्दस्य प्रतिविषयं नानात्वात् सर्वगुणानामेकशब्दवाच्यतायां
सर्वार्थानामेकशब्दवाच्यतापत्तेः शब्दान्तरवैफल्यापत्तेः ।
है। भेद विशिष्ट अभेदको संबंध तथा अभेद विशिष्ट भेदको संसर्ग कहते हैं । ( ८ ) जो 'अस्ति' शब्द
अस्तित्वधर्मसे युक्त पदार्थका वाचक होता है, वही 'अस्ति' शब्द अनंत धर्मोंसे युक्त पदार्थका वाचक होता है।
इस प्रकार अस्तित्व धर्मयुक्त पदार्थ तथा शेष अन्य अनंतधर्मोंसे युक्त वही पदार्थ, 'अस्ति' शब्दका वाच्य
होनेसे, शब्दकी दृष्टिसे अभिन्न है । जिन गुणोंमें पर्यायार्थिक नयकी दृष्टिसे भेद होता है, उन गुणोंमें पर्यायार्थिक
नयकी गौणता और द्रव्यार्थिक नयकी मुख्यता होनेपर अभेद घटित होता है) १ ।
द्रव्यार्थिक नयको गौणता और पर्यायार्थिक नयकी प्रधानता होनेपर पदार्थाश्रित गुणोंकी अभेद रूपसे
स्थिति नहीं होती : ( १ ) विभिन्न गुण एक कालमें एक स्थान पर नहीं रह सकते । यदि विभिन्न गुण एक
कालमें, एक वस्तुमें, एक साथ रहें तो गुणोंके आश्रित द्रव्योंमें भी उतने ही भेद मानने चाहिये । (२) विभिन्न
गुणोंका अपने-अपने स्वरूप ( आत्मरूप ) वाले स्वभिन्न गुणके स्वरूपसे भेद है; क्योंकि वे एक दूसरेके स्वरूपमें
नहीं रहते, इसलिये गुणोंमें अभेद नहीं है। यदि गुणोंमें परस्पर भेद न हो, तो गुणोंको भिन्न-भिन्न नहीं
मानना चाहिये । ( ३ ) गुणोंके आश्रयभूत पदार्थ ( अर्थ ) भी अनेक हैं; यदि गुणोंके आधार अनेक न हों
तो वे नाना गुणोंके आश्रित नहीं कहे जा सकते । ( ४ ) संबंधियोंके भिन्न-भिन्न होने कारण संबंधका भेद
दिखाई देनेसे भी गुणोंमें अभिन्नता संभव नहीं, क्योंकि एक संबंधसे भिन्न-भिन्न संबंधियोंके साथ संबंध नहीं
बन सकता । ( ५ ) उपकारकी अपेक्षा भी गुण परस्पर अभिन्न नहीं हैं। अनेक उपकारियोंमेंसे प्रत्येक
उपकारी द्वारा किये जानेवाले उपकारमें तथा अन्य उपकारी द्वारा किये जानेवाले उपकारमें विरोध है ।
( ६ ) गुणिदेशकी अपेक्षासे भी गुण अभिन्न नहीं हैं। अन्यथा प्रत्येक गुणका आश्रयभूत गुणिरूप देश तथा
स्वभिन्न गुणके आश्रयभूत गुणिरूप देशमें भेद न होनेपर, भिन्न पदार्थोंके गुणोंके भी जो गुणिरूप देश हैं, उनका
पूर्वोक्त गुणिरूप देशके साथ अभेदका प्रसंग आ जायेगा । ( ७ ) संसर्गकी अपेक्षा भी गुण भिन्न हैं। अन्यथा
एक पदार्थके साथ जितने संसर्ग करनेवाले होते हैं, उतने ही संसर्गोंके परस्पर भिन्न होनेपर भी, उन संसर्गोंको
अभिन्न मानने पर, संसर्ग करनेवालोंमें भेद उपस्थित हो जायेगा । ( ८ ) तथा शब्दकी अपेक्षासे भी गुण
भिन्न नहीं हैं । अन्यथा सभी गुणोंकी एक शब्दके द्वारा वाच्यता होनेपर, उनके आश्रयभूत सभी पदार्थोंकी
एक शब्द द्वारा वाच्यता होनेकी आपत्ति उपस्थित हो जानेसे उन सभी पदार्थोंमेंसे प्रत्येक पदार्थके वाचक
शब्दोंकी निष्फलताका प्रसंग उपस्थित हो जायेगा ।
( स्पष्टीकरण : जब द्रव्यार्थिक नयकी गौणता और पर्यायार्थिक नयकी प्रधानता होती है, तब एक
पदार्थका अस्तित्व धर्म और उसी पदार्थके अन्य शेष अनंत धर्मोंमें काल आदिकी दृष्टिसे अभेदकी संभाव्यता
नहीं होती । ( १ ) एक समयमें पदार्थकी एक ही पर्याय होती है—अनेक नहीं । उत्तर पर्यायसे युक्त उसी
पदार्थका पूर्व पर्यायसे युक्त पदार्थसे भेद होता है । यदि पूर्व पर्याययुक्त और उत्तर पर्याययुक्त पदार्थमें भेद
स्वीकार न किया तो बाल्यावस्था और कुमारावस्थामें भेद नहीं होगा, तथा बालक कभी कुमारावस्थाके रूपमें
१. प्रोफेसर एम० जी० कोठारीके सौजन्यसे ।
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