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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 458 में से

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पृष्ठ 256

२०४ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायां [ अन्य. यो. व्य. श्लोक २३
अपर्ययं वस्तु समस्यमानमद्रव्यमेतच्च विविच्यमानम् ।
आदेशभेदोदितसप्तभङ्गमदीदृशस्त्वं बुधरूपवेद्यम् ॥२३॥
समस्यमानं संक्षेपेणोच्यमानं वस्तु अपर्ययम् अविवक्षितपर्यायम् । वसन्ति गुणपर्याया
अस्मिन्निति वस्तु धर्माधर्माकाशपुद्गलकालजीवलक्षणं द्रव्यषट्कम्¹ । अयमभिप्रायः । यदैक-
मेव वस्तु आत्मघटादिकं चेतनाचेतनं सतामपि पर्यायाणामविवक्षया द्रव्यरूपमेव वस्तु वक्तु-
मिष्यते । तदा संक्षेपेणाभ्यन्तरीकृतसकलपर्यायनिकायतवलक्षणेनाभिधीयमानत्वात् अपर्यय-
मित्युपदिश्यते । केवलद्रव्यरूपमेव इत्यर्थः । यथात्मायं घटोऽयमित्यादि, पर्यायाणां द्रव्यानति-
रेकात् । अतएव द्रव्यास्तिकनयाः शुद्धसंग्रहादयो द्रव्यमात्रमेवेच्छन्ति पर्यायाणां तदविष्वग्भूत-
त्वात् । पर्ययः पर्यवः पर्याय इत्यनर्थान्तरम् । अद्रव्यमित्यादि । चः पुनरर्थे । स च पूर्वस्माद्
विशेषद्योतने भिन्नक्रमश्च । विविच्यमानं चेति विवेकेन पृथग्रूपतयोच्यमानं पुनरेतद् वस्तु
अद्रव्यमेव । अविवक्षितान्वयिद्रव्यं केवलपर्यायरूपमित्यर्थः ॥
यदा ह्यात्मा ज्ञानदर्शनादीन् पर्यायानधिकृत्य प्रतिपर्यायं विचार्यते, तदा पर्याया एव
श्लोकार्थ—सहभावी और क्रमभावी पर्यायोंसे युक्त होनेपर भी संक्षेपमें कथन किये जाने पर
जिसकी पर्यायें गौण होती हैं, और विस्तारसे कथन किये जानेपर जिसकी पर्यायोंकी मुख्यता होती है, तथा
सकलादेश ( प्रमाण ) और विकलादेश ( नय ) के भेदसे जिसके सात अंगोंका प्ररूपण किया गया है, ऐसी
पंडितों द्वारा समझने योग्य वस्तुका, हे भगवन् ! आपने ही प्रतिपादन किया है ।
व्याख्यार्थ—जब वस्तुका कथन संक्षेपमें किया जाता है, तब उसकी पर्याय विवक्षित नहीं होती—
वे गौण होती हैं। जिसमें गुण और पर्यायें रहती हैं, वह वस्तु धर्म, अधर्म, आकाश, पुद्गल, काल और
जीव--इन छह द्रव्यों [देखिये परिशिष्ट (क)] में विभक्त की जाती है। ( कोई आचार्य कालको पृथक् द्रव्य नहीं
मानते । उनके .मतमें पांच ही द्रव्य हैं) अभिप्राय यह है—चेतनात्मक आत्मरूप और अचेतनात्मक घट
आदि रूप एक ही वस्तुकी पर्यायोंके विद्यमान होने पर भी, उन पर्यायोंके कथन करनेकी इच्छा न होनेसे—
उन्हें गौण कर देनेसे—द्रव्यमात्र रूप वस्तुका कथन करना ही इष्ट होता है । अतएव संक्षेपसे प्रतिपादित
समस्त पर्यायसमूहके अन्तर्भाव होनेसे 'अपर्यय' शब्दका प्रयोग किया गया है। 'अपर्यय'का अर्थ है केवल
द्रव्यरूप । उदाहरणके लिये, 'यह आत्मा है', 'यह घट है'—कहने पर, आत्मा और घटकी पर्यायें विद्यमान
होनेपर भी, उनके आत्मा और घटसे भिन्न न होनेके कारण, उनका निर्देश नहीं किया जाता; क्योंकि वे
विवक्षित नहीं हैं। अतएव द्रव्यास्तिक नयरूप शुद्ध संग्रह आदि नयोंको अपने विषयरूपसे द्रव्यमात्र ही इष्ट
होता है, क्योंकि पर्यायें द्रव्यसे भिन्न नहीं होतीं । 'पर्यय', 'पर्यव' 'पर्याय' शब्द पर्यायवाची हैं। जब
पर्यायोंका द्रव्यसे भिन्नरूपसे कथन किया जाता है तब अन्वयि द्रव्यकी विवक्षा न होनेसे वस्तु केवल पर्याय-
रूप होती है ।
जिस समय आत्माकी ज्ञान, दर्शन आदि पर्यायोंकी मुख्यतासे आत्माका विचार किया जाता है,
१. केषांचिदाचार्याणां मते पंचास्तिकाया एव । कालो द्रव्यं पृथग् नास्ति । जीवादिष्वस्त्रपि कदाचित् काल-
शब्देन उच्यते । तथा चागमः । “किमयं भंते, कालोत्ति पवुच्चइ, गोयमा ! जीवा चेव अजीवा चेवत्ति” ।
अन्ये तु आचार्याः संगिरन्ते । अस्ति धर्मास्तिकायादिद्रव्यपंचकव्यतिरिक्तम् अर्द्धतृतीयद्वीपसमुद्रान्तर्वर्ति षष्ठं
कालद्रव्यं, यन्निबन्धना एते ह्यः श्व इत्यादयः प्रत्ययाः शब्दाश्च प्रादुर्भवन्ति । आगमश्च । “कइ णं भंते
दव्वा पण्णत्ता ? गोयमा ! छ दव्वा पण्णत्ता । तं जहा-धम्मत्थिकाये अधम्मत्थिकाइए, आगासत्थिकाइए, पुग्ग-
लत्थिकाइए जीवत्थिकाइए अद्धासमये य” । हरिभद्रकृतधर्मसंग्रहिण्यां मलयगिरिटीकायां गा. ३२