स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअन्य. यो. व्य. श्लोक २२ ] स्याद्वादमञ्जरी २०३
अत्र चात्मशब्देनानन्तेष्वपि धर्मेष्वनुवृत्तिरूपमन्वयिद्रव्यं ध्वनितम् । ततश्च “उत्पाद-
व्ययध्रौव्ययुक्तं सत्” इति व्यवस्थितम् । एवं तावदर्थेषु । शब्देष्वपि उदात्तानुदात्तस्वरितविवृत-
संवृतघोषवदघोषतालप्राणमहाप्राणतादयः तत्तदर्थप्रत्ययनशक्त्यादयश्चावसेयाः । अस्य हेतो-
रसिद्धविरुद्धानैकान्तिकत्वादिकण्टकोद्धारः स्वयमभ्यूह्यः । इत्येवमुल्लेखशेखराणि ते तव प्रमा-
णान्यपि न्यायोपपन्नसाधनवाक्यान्यपि । आस्तां तावद् साक्षात्कृतद्रव्यपर्यायनिकायो भवान् ।
यावदेतान्यपि कुवादिकुरङ्गसन्त्रासनसिंहनादाः कुवादिनः कुत्सितवादिनः । एकांशग्राहकनया-
नुयायिनोऽन्यतीर्थिकास्त एव संसारवनगहनवसनव्यसनितया कुरङ्गा मृगास्तेषां सम्यक्त्रासने
सिंहनादा इव सिंहनादाः । यथा सिंहस्य नादमात्रमप्याकर्ण्य कुरङ्गास्त्रासमासूत्रयन्ति, तथा
भवत्प्रणीतैवंप्रकारप्रमाणवचनान्यपि श्रुत्वा कुवादिनस्त्रस्तामश्नुवते प्रतिवचनप्रदानकातरतां
बिभ्रतीति यावत् । एकैकं त्वदुपज्ञं प्रमाणमन्ययोगव्यवच्छेदकमित्यर्थः ॥
अत्र प्रमाणानि इति बहुवचनमेवंजातीयानां प्रमाणानां भगवच्छासने आनन्त्यज्ञाप-
नार्थम्, एकैकस्य सूत्रस्य सर्वोदधिसलिलसर्वसरिद्वालुकानन्तगुणार्थत्वात् तेषां च सर्वेषामपि
सर्वविन्मूलतया प्रमाणत्वात् । अथवा “इत्यादिवहुवचनान्ता गणस्य संसूचका भवन्ति” इति
न्यायाद् इतिशब्देन प्रमाणबाहुल्यसूचनात् पूर्वार्द्धे एकस्मिन् अपि प्रमाणे उपन्यस्ते उचितमेव
बहुवचनम् ॥ इति काव्यार्थः ॥२२॥
अनन्तरमनन्तधर्मात्मकत्वं वस्तुनि साध्यं मुकुलितमुक्तम् । तदेव सप्तभङ्गीप्ररूपणद्वारेण
प्रपञ्चयन् भगवतो निरतिशयं वचनातिशयं च स्तुवन्नाह—
'अनन्त धर्मात्मक' शब्दमें आत्मा शब्दसे अनंत पर्यायोंमें रहनेवाले नित्य द्रव्यका सूचन होता हैं ।
अतएव “उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ही 'सत्' का लक्षण है।” पदार्थोंकी तरह शब्दोंमें भी उदात्त, अनुदात्त,
स्वरित, विवृत, संवृत, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण आदि तथा पदार्थोंके ज्ञान करानेकी शक्ति आदि अनन्त
धर्म पाये जाते हैं । 'तत्त्वं अनंतधर्मात्मकं सत्त्वान्यथानुपपत्तेः' इस अनुमानमें जो 'सत्त्वान्यथानुपपत्तेः' हेतु
दिया गया है उसके असिद्धत्व, विरुद्धत्व, अनैकांतिकत्व आदि दोषोंके परिहार पर स्वयं विचार करना चाहिये ।
हे भगवन् ! आपकी बात तो दूर रही, आपके न्याययुक्त वचन ही कुवादीरूपी हरिणोंको संत्रस्त करनेके लिये
सिंहकी गर्जनाके समान हैं। जिस प्रकार सिंहकी गर्जनाको सुनकर जंगलके हरिण भयभीत होते हैं, उसी
प्रकार आपके स्याद्वादका निरूपण करनेवाले वचनोंको सुनकर वस्तुके केवल अंशमात्रको ग्रहण करनेवाले,
संसाररूपी गहन वनमें फिरनेवाले कुवादी लोग संत्रस्त होते हैं ।
एक एक विषयको खंडन करनेवाले बहुतसे प्रमाणोंका सूचन करनेके लिये श्लोकमें 'प्रमाणानि'
बहुवचन दिया है; क्योंकि भगवान्के प्रत्येक सूत्र सम्पूर्ण समुद्रोंके जलसे और सम्पूर्ण नदियोंकी बालुकासे भी
अनंतगुने हैं और वे सम्पूर्ण सूत्र सर्वज्ञ भगवान्के कहे हुए हैं, इसलिए प्रमाण हैं । अथवा “इति, आदि बहु
वचनवाले शब्दसमूहके सूचक होते हैं” इस न्यायसे 'इति' शब्दसे बहुतसे प्रमाणोंका सूचन होता है, अतएव
श्लोकके पूर्वार्धमें एक प्रमाणका उल्लेख करनेपर भी बहुवचन समझना चाहिये ॥ यह श्लोका अर्थ है ॥२२॥
भावार्थ—इस श्लोकमें प्रत्येक वस्तुको अनंत धर्मवाली सिद्ध किया गया है । जैन सिद्धांतके अनुसार
यदि पदार्थोंमें अनंत धर्म स्वीकार न किये जांय, तो वस्तुकी सिद्धि नहीं हो सकती अतएव, 'प्रत्येक वस्तु अनन्त
धर्मात्मक है, क्योंकि वस्तुमें अनंत धर्म माने बिना वस्तुमें वस्तुत्व सिद्ध नहीं हो सकता । जो अनन्त धर्मात्मक
नहीं होता, वह सत् भी नहीं होता। जैसे आकाश।' अतएव जीव, अजीव, धर्म, अधर्म, आकाश और काल सम्पूर्ण
द्रव्योंमें अनन्त धर्म स्वीकार करने चाहिये ।
वस्तुमें अनन्त धर्म होते हैं, इसीको सात भंगों द्वारा प्ररूपण करते हुए भगवान्के निरतिशय वचनाति-
शयकी स्तुति करते हुए कहते हैं—