सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
द्वारिका चरित ३४१
रखवारी कौं बहुत महाभट, दीन्हे रुक्म पठाई।
ते सब सावधान भए चहुँ दिसि, पंछी तहाँ न जाई।
कुंवरि पूजि गौरी बिनती करी, वर देउ जादवराई।
मैं पूजा कीन्ही इहिं कारन, गौरी सुनि मुसकाई।
पाइ प्रसाद अंबिका-मंदिर, रुकमिनी बाहर आई।
सुभट देखि सुन्दरता मोहे, धरनि गिरे मुरझाई।
इहिं अंतर जादोपति आए, रुकमिनी रथ बैठाई।
सूरज प्रभु पहुँचे दल अपनैं, तब सुभटनि सुधि पाई॥६॥
अर्थ—रुक्मिणी देवी मन्दिर में आईं। धूप, दीप तथा पूजा की समस्त सामग्री
सखियाँ साथ ले आईं। रुक्म ने रखवाली के लिए बहुत से बड़े वीरो को भेज दिया।
वे सभी वहाँ सावधान हो गये, वहाँ पक्षी भी नही जा पाता था। कुँवरि ने पूजा करके
पार्वती से (यह) विनती की कि (मुझे) कृष्ण को वर के रूप में दे। मैंने इसीलिए
पूजा की (है)। (यह) सुनकर गौरी मुस्करायी ! अंबिका के मन्दिर में प्रसाद (वरदान)
पाकर रुक्मिणी बाहर आईं। (वहाँ के) सुभट (उसकी) सुन्दरता देखकर मोहित हो गए
(और) पृथ्वी पर मूर्छित होकर गिर पड़े। इसी बीच कृष्ण (वहाँ) गए तथा (उन्होंने)
रुक्मिणी को रथ पर बिठा लिया। सूरज के प्रभु (कृष्ण) अपनी सेना मे (जब) पहुँच
गये तब (रुक्म द्वारा तैनात) सुभटों ने खबर पायी (कि रुक्मिणी हरण हो गया) ॥६॥
आवहु री मिलि मंगल गावहु।
हरि रुकमिनी लिए आवत हैं, यह आनंद जदुकुलहिं सुनावहु।
बाँधहु बन्दनवार मनोहर, कनक कलस भरि नीर धरावहु।
दधि अच्छत फल फूल परम रुचि, आँगन चंदन चौक पुरावहु।
कदली जूथ अनूप किसल दल, सुरँग सुमन लै मंडल छावहु।
हरद दूब केसर मग छिरकहु, भेरी मृदँग निसान बजावहु।
जरासंध सिसुपाल नृपति तैं, जीते हैं उठि अरघ चढ़ावहु।
बल समेत तन कुसल सूर प्रभु, आए हैं आरती बनावहु ॥७॥
अर्थ—(हे सखियो !) आओ, (सब) मिलकर मंगल (गीत) गाओ। हरि
रुक्मिणी को लेकर आ रहे हैं। यह आनंद यदुकुल को सुनाओ। मनोहर वंदनवार
बांधो (तथा) सोने के कलश (घड़े) मे जल भर कर रखवाओ। दही, अक्षत, परम
रुचिकर फल, फूलों के द्वारा आंगन मे चौक पुरवाओ। केले के समूहो, अनुपम किशलय
दलो (तथा) सुन्दर रंग के फूलो मे मंडप छावाओ। रास्ते मे हल्दी दूब (तथा) केसर
छिड़को; नगाड़ो (भेरी), मृदंग तथा ढोल (निशान) बजाओ। जरासंध शिशुपाल नृप
से (कृष्ण) जीत गये हैं। उठकर अर्घ्य (पूजन सामग्री) चढ़ाओ। बलराम सहित सूर
के प्रभु (कृष्ण) शरीर से कुशलता-पूर्वक आये है। (उनकी) आरती सजाओ ॥७॥
३४२ सूरसागर सार सटीक
बलभद्र ब्रज यात्रा
स्याम राम के गुन नित गाऊँ । स्याम राम ही सौं चित लाऊँ ।
एक बार हरि निज पुर छाए । हलधर जी बृन्दावन गए ।
रथ देखत लोगनि सुख पाए । जान्यौ स्याम राम दोउ आए ।
नन्द जसोमति जब सुधि पाई । देह गेह की सुरति भुलाई ।
आगैं ह्वै लैबे कौं धाए । हलधर दौरि चरन लपटाए ।
बल कौं हित करि गरैं लगाए । दै असीस बोले या भाए ।
तुम तौ भली करी बलराम । कहाँ रहे मन मोहन स्याम ।
देखो कान्हर की निठुराई । कबहुँ पाती हू न पठाई ।
आपु जाइ ह्वाँ राजा भए । हमकौं बिछुरि बहुत दुख दए ।
कहौ कबहुँ हमरी सुधि करत । हम तौ उन बिनु बहु दुख भरत ।
कहा करैं ह्वाँ कोउ न जात । उन बिनु पल पल जुग सम जात ।
इहिँ अन्तर आए सब ग्वार । भेंटे सबनि जथा ब्यौहार ।
नमस्कार काहूँ कौ कियौ । काहू कौं अंकम भरि लियौ ।
पुनि गोपी जुरि मिलि सब आईँ । तिन हित साथ असीस सुनाईँ ।
हरि सुधि करि सुधि बुधि बिसराई । तिनकौ प्रेम कह्यौ नहिं जाई ।
कोउ कहै हरि ब्याही बहु नार । तिनकौ बढ़्यौ बहुत परिवार ।
उनकौं यह हम देतिँ असीस । सुख सौं जीवैं कोटि बरीस ।
कोउ कहै हरि नाहीँ हम चीन्हौ । बिनु चीन्हैं उनकौं मन दीन्हौ ।
निसि दिन रोवत हमैँ बिहाइ । कहौ करैं अब कहा उपाइ ।
कोउ कहै इहाँ चरावत गाइ । राजा भए द्वारिका जाइ ।
काहे कौं वै आवैं इहाँ । भोग बिलास करत नित उहाँ ।
कोउ कहै हरि रिपु छै किए । अरु मित्रनि कौ बहु सुख दिए ।
बिरह हमारौ कहँ रहि गयौ । जिन हमकौं अति हीँ दुख दयौ ।
कोउ कहै जे हरि की रानी । कौन भाँति हरि कौं पतियानी ।
कोऊ चतुर नारि जो होइ । करै नहीं पतिआरी सोइ ।
कोउ कहै हम तुम कत पतियाईँ । उनकैं हित कुल लाज गवाईँ ।
हरि कछु ऐसौ टोना जानत । सबकौं मन अपनैं बस आनत ।
कोउ कहै हरि हम सब बिसराईं । कहा कहैं कछु कह्यौ न जाई ।
हरिकौं सुमिरि नयन जल धारैं । नैंकु नहीँ मन धीरज धारैं ।
यह सुनि हलधर धीरज धारि । कह्यौ आइहैं हरि निरधारि ।
जब बल यह संदेस सुनायौ । तब कछु इक मन धीरज आयौ ।
बल तहं बहुरि रहे द्वै मास । ब्रज बासिनि सौं करत विलास ।
सब सौं मिलि पुनि निजपुर आए । सूरदास हरि के गुन गाए ॥८॥
द्वारिका चरित ३४३
अर्थ—श्याम (और) बलराम के गुणों को नित्य गाता हूँ (तथा) श्याम और
बलराम में ही चित्त लगाता हूँ । एक बार (जब) हरि अपने पुर (मथुरा) में छाये थे
(विद्यमान थे) हलधर जी वृन्दावन गये (आए) रथ देखते ही (वृन्दावन) के लोगों ने
सुख पाया, समझा (कि) श्याम और बलराम दोनों आये हैं । नद (तथा) यशोदा ने
जब खबर पायी तो उन्होने (प्रसन्नता से) (अपने) शरीर तथा घर की स्मृति भुला
दी । दोनो आगे होकर लेने को दोडे । हलधर दौड़कर (उनके) चरणों से लिपट गये
(नंद यशोदा ने) वलराम को स्नेह-पूर्वक गले से लगाया, (और) आशीर्वाद देकर इस
प्रकार बोले । वलराम ! तुमने तो अच्छा किया (आ गए), लेकिन मनमोहन श्याम
कहाँ रह गये ! कृष्ण की निष्ठुरता (तो) देखो, कभी पत्र भी नही भेजा । स्वयं तो
वहाँ जाकर राजा हो गए, (लेकिन) बिछुड़कर हमको बहुत दुख दिया । कहो, (श्याम)
कभी हमारा स्मरण करते हैं । हम तो उनके बिना बहुत दुख भोगते हैं । क्या करे,
(यहाँ से) वहाँ कोई जाता नहीं, उनके बिना पल-पल युग के समान बीतता है । इसी
बीच सभी ग्वाल आये (तथा) सबों ने यथाविधि भेट की (बलराम ने) किसी को
नमस्कार किया, किसी को गले लगाया। फिर सब गोपियां मिलकर आईं, उन्होने
प्रेमपूर्वक मंगल कामनाएं की । हरि का स्मरण करके (गोपियो की) सुध-बुध भूल
गयी । उनके प्रेम को कहा नही जाता । कोई कहती है (कि) हरि ने बहुत-सी स्त्रियों
से विवाह कर लिया है, (तथा) उनका परिवार बहुत बढ़ गया है ! उनको हम यह
आशीर्वाद देती है (कि) (वे) सुखपूर्वक करोड़ो वर्ष जिये। कोई कहती हैं (कि) हरि
ने हमें पहचाना नही; बिना पहचाने (हमने) (उन्हे) मन दे दिया । हमारा (समय)
रात-दिन रोते ही व्यतीत होता है। कहो अब क्या उपाय करे । कोई कहती है (कि)
गाय चराते थे द्वारिका जाकर राजा हो गये ! वे यहाँ क्यो आये, वहाँ नित्य भोग
विलास करते हैं । कोई कहती है कि हरि ने शत्रुओ का नाश किया (तथा) मित्रो को
बहुत सुख दिया । हमारा विरह कहाँ रह गया, जिन्होने हमे बहुत दुख दिया । कोई
कहती है (कि) जो हरि की रानी हैं (उन्होंने) हरि पर कैसे विश्वास किया ? यदि
कोई चतुर स्त्री होती तो उन पर विश्वास न करती । कोई (आपस मे) कहती है
(कि) हमने-तुमने (उन पर) कैसे विश्वास किया; उनके लिए (अपने) कुल की लाज
गंवा दी । हरि कुछ ऐसा टोना जानते हैं (जिससे) सबके मन को अपने वश मे कर
लेते हैं । कोई कहती हैं (कि) हरि ने हम सब को भुला दिया, क्या कहे, कुछ कहा
नही जाता ! हरि का स्मरण करके नयनो मे जल ढालती है। मन, तनिक भी, धीरज
नही मानता। यह सुनकर हलधर ने धीरज धरकर कहा कि हरि निश्चित आयेगे ।
जब बलराम ने यह संदेश सुनाया तब मन मे थोड़ा-सा धीरज आया ! बलराम वहाँ
दो महीने रहे (तथा) ब्रजवासियो से विलास करते रहे । सब से मिलकर फिर अपने
पुर (मथुरा) आये, सूरदास ने (इस प्रकार) हरि का गुणगान किया ॥८॥
३४४ सूरसागर सार सटीक
सुदामा चरित
कंत सिधारौ मधुसूदन पै, सुनियत हैं वे मीत तुम्हारे।
बाल-सखा अरु बिपति विभंजन, संकट हरन मुकुंद मुरारे।
और जु अतिसय प्रीति देखियै, निज तन मन की प्रीति बिसारे।
सरबस रीझि देत भक्तनि कौं, रंक नृपति काहूँ न विचारे।
जद्यपि तुम संतोष भजत हौ, दरसन सुख तैं होत जु न्यारे।
सूरदास प्रभु मिले सुदामा, सब सुख दै पुनि अटल न टारे ॥६॥
अर्थ-(सुदामा की स्त्री कहती है) हे पति ! मधुसूदन (कृष्ण) के पास जाओ,
सुनती हूँ वे तुम्हारे मित्र हैं ! (वे तुम्हारे) बाल मित्र हैं; मुकुंद मुरारी विपत्तियों के
भंजक (तथा) संकट हरने वाले है। और जो (जहां) अतिशय प्रेम देखते हैं तो (वहां)
अपने तन-मन की प्रीति (भी) भुला देते है। रीझ कर भक्तों को सर्वस्व देते हैं, (वे)
दरिद्र (और) नृपति किसी का विचार नही करते। यद्यपि तुम संतोष धारण करते
हो, (और) (वहां न जाकर) दर्शन सुख से वंचित होते हो (फिर भी) सूरदास
(कहते है) (कि) प्रभु (कृष्ण) से सुदामा मिलने पर सब सुख देकर (उससे) मिले,
फिर वह सुख अटल (होगा), नही टाला (सदैव प्राप्त हुआ) ॥६॥
सुदामा सोचत पंथ चले।
कैसैं करि मिलिहैं मोहिँ श्रीपति, भए तब सगुन भले।
पहुँचौ जाइ राजद्वारे पर, काहूँ नहिँ अटकायौ।
इत उत चितै धँस्यौ मंदिर मैं, हरि कौ दरसन पायौ।
मन मैं अति आनंद कियौ हरि, बाल-मीत पहिचान।
धाए मिलन नगन पग आतुर, सूरज प्रभु भगवान ॥१०॥
अर्थ-सुदामा रास्ते मे सोचते हुए चले (कि) श्रीपति (कृष्ण) हमसे कैसे
मिलेगे, तब (उस समय) अच्छे सगुन हुये। (सुदामा) राजद्वार पर जा पहुँचा, कही
भी रोक नही हुई। इधर-उधर देखकर मन्दिर (महल) मे प्रविष्ट हुआ। (और) हरि
(कृष्ण) का दर्शन पाया। बचपन के साथी को पहचान कर हरि ने मन मे अत्यधिक
आनंद माना (प्रसन्न हुए)। आतुर होकर नगे पांव (ही) मिलने के लिए सूरज के प्रभु
भगवान् दौड़े ॥१०॥
दूरहिँ तैं देख्यौ वलवीर।
अपने बालसखा जु सुदामा, मलिन बसन अरु छीन सरीर।
पौढ़े हे परजंक परम रुचि, रुकमिनी चाँर डुलावति तीर।
उठि अकुलाइ अगमने लीन्हें, मिलत नैन भरि आए नीर।
निज आसन बैठारि स्याम-घन, पूछी कुसल कह्यौ मति धीर।
ल्याए हौ सु देहु किन हमकौं, कहा दुरावन लागे चोर।
दरस परस हम भए सभागे, रह्यो न मन मैं एकहु पोर ।
सूर सुमति तंदुल चाबत हौं, कर पकर्यो कमला भई धीर ॥११॥
अर्थ—बल राम के भाई (कृष्ण) ने दूर से ही मलिन वस्त्र तथा क्षीण शरीर
वाले अपने बाल मित्र सुदामा को देखा। परम रुचिकर पलंग पर लेटे थे, पास में
(बैठी) रुक्मिणी चमर डुला रही थीं ! (कृष्ण ने) आकुल होकर (तथा) उठकर (सुदामा
की) अगवानी की, मिलते ही (उनके) नेत्र जल से भर आये । (उसे) अपने आसन
पर बिठा कर कृष्ण ने कुशल पूछी; धीर मति (सुदामा ने) बताया । (कृष्ण ने कहा)
(कि) जो कुछ लाये हो उसे हमको क्यों नही देते, वस्त्र में क्या छिपाने लगे ? हम
दर्शन (तथा) स्पर्श से सौभाग्यशाली हो गये, मन में एक भी पीड़ा नही रही । सूरदास
(कहते हैं) (कि) सुमति (कृष्ण) को चावल चबाते देख कमला ने धीर (अधीर)
होकर हाथ पकड़ लिया ॥११॥
ऐसी प्रीति की बलि जाऊँ ।
सिंहासन तजि चले मिलन कौं, सुनत सुदामा नाउँ ।
कर जोरे हरि विप्र जानि कै, हित करि चरन पखारे ।
अंकमाल दै मिले सुदामा, अर्धासन बैठारे ।
अर्धांगी पूछति मोहन सौं, कैसे हितू तुम्हारे ।
तन अति छीन मलीन देखियत, पाउँ कहाँ तैं धारे ।
संदीपन कैं हमऽरु सुदामा, पढ़े एक चटसार ।
सूर स्याम की कौन चलावै, भक्तनि कृपा अपार ॥१२॥
अर्थ—ऐसी प्रीति की (मैं) बलि जाता हूँ। सुदामा का नाम सुनकर (कृष्ण)
सिंहासन छोड़कर मिलने चले । हरि ने (सुदामा को) ब्राह्मण जानकर हाथ जोड़े (उसे
प्रणाम किया), (तथा) स्नेहपूर्वक चरण धोये । गले लगाकर सुदामा से मिले तथा
अर्धासन (आधे आसन) पर (उसे) बिठाया । अर्द्धांगिनी ने कृष्ण से पूछा (कि) ये कैसे
तुम्हारे मित्र हुए ? (इनका) शरीर अत्यन्त क्षीण है, मलिन दिखाई देते हैं, ये कहाँ से
पधारे हैं ? (कृष्ण ने उत्तर दिया) हम और सुदामा संदीपन (ऋषि) के शिष्य हैं।
एक ही पाठशाला में पढ़ते थे । सूरदास (कहते है) (कि) कृष्ण की (बात) कौन चलाये
भक्तो पर (इनकी) अपार कृपा (रहती है) ॥१२॥
गुरु-गृह हम जब बन कौं जात ।
जोरत हमरे बदलैं लकरी, सहि सब दुख निज गात ।
एक दिवस बरषा भई बन मैं, रहि गए ताही ठौर ।
इनकी कृपा भयौ नहिं मोहिं श्रम, गुरु आए भए भोर ।
सो दिन मोहिं विसरत न सुदामा, जौ कीन्हौ उपकार ।
प्रति उपकार कहा करौं सूरजु, भाषत आप मुरार ॥१३॥
३४६ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—गुरु के घर (से) जब हम वन जाते थे, (तब) हमारे बदले (ये) सब दुख
सहकर लकड़ी जोड़ते (एकत्र करते) थे । एक दिन वन में वर्षा हुई, (हम लोग) उसी
स्थान पर रह गये । इनकी कृपा से मुझे श्रम नही हुआ, प्रातः होने पर गुरु (के घर)
आये । उस दिन सुदामा ने जो उपकार किया वह मुझे भूलता नही ! मुरारि (कृष्ण)
स्वयं कहते हैं कि प्रत्युपकार (बदले) (के रूप) मे क्या करूँ ? ।।१३।।
सुदामा गृह कौँ गमन कियौ ।
प्रगट बिप्र कौँ कछु न जनायौ, मन मैं बहुत दियौ ।
वेई चीर कुचील वहै विधि, मोकौँ कहा भयौ ।
धरिहौँ कहा जाय तिय आगैँ, भरि भरि लेत हियौ ।
सो संतोष मानि मन हीँ मन, आदर बहुत लियौ ।
सूरदास कीन्हे करनी बिनु, को पतियाइ बियौ ।।१४।।
अर्थ—सुदामा ने घर के लिए प्रस्थान किया । प्रकट रुप मे विप्र को कुछ
नही बताया, (लेकिन) मन मे बहुत दिया । (सुदामा सोचते है) वही मैले वस्त्र, वही
विधि मुझे हुआ ही क्या (क्या मिला) ? पत्नी के आगे जाकर क्या रखूंगा; (सुदामा का)
हृदय (दुख) से भर-भर आता था । (सुदामा ने) मन-ही-मन इस (बात पर) संतोष
किया (कि) (कृष्ण ने) बहुत आदर से (मुझे) लिया (मेरा बहुत आदरपूर्वक स्वागत
किया) । सूरदास (कहते है) (कि) करणी किये बिना दूसरा कौन विश्वास करेगा ।
(सुदामा सोचते है कि कृष्ण के अतिरिक्त दूसरा ऐसा कौन है जो मुझे जैसे अकर्मण्य
का विश्वास कर इतना आदर देगा) ।।१४।।
सुदामा मंदिर देखि डरचौ ।
इहाँ हुती मेरी तनक मड़ैया, को नृप आनि छरचौ ।
सीस धुनै दोऊ कर मीँड़े, अंतर सोच परचौ ।
ठाढ़ी तिया जु मारग जोवै, ऊँचै चरन धरयौ ।
तोहिँ आदरचौ त्रिभुवन कौ नायक, अब क्यौँ जात फिरचौ ।
सूरदास प्रभु की यह लीला, दारिद दुःख हरचौ ।।१५।।
अर्थ—(घर लोटने पर) सुदामा मंदिर (अपना घर) देखकर डर गया ! यहां
मेरी छोटी सी मड़इया थी, किस नृप ने आकर छल किया (छीन लिया) । (वे) सिर
घुमाते हैं, दोनो हाथ मलते है, मन के भीतर सोचने लगे । चरणो को ऊँचा करके
(ऊंचे स्थान पर खड़ी होकर) स्त्री खडी हुई मार्ग जोह रही है । (उसने कहा) त्रिभुवन
के नायक ने आदर दिया अब (घर से) क्यो वापस जाते हो ! सूरदास (कहते हैं)
(कि) यह प्रभु (कृष्ण) की लीला है कि (उन्होंने) (समस्त) दुख-दरिद्रता को हर
लिया ।।१५।।
हौँ फिरि बहुरि द्वारिका आयौ ।
समुझि न परी मोहिँ मारग की, कोउ बूझौ न बतायौ ।
द्वारिका चरित ३४७
कहिहैं स्याम सत्त इन छाँड्यौ, उतौ राँक ललचायौ ।
तृन की छहैं मिटी निधि मांगत, कौन दुखनि सौं छायौ ।
सागर नहीं समीप कुमति कैं, विधि कह अंत भ्रमायौ ।
चितवत चित्त विचारत मेरौ, मन सपनैं डर छायौ ।
सुरतरु, दासी, दास, अस्व, गज, बिभौ विनोद बनायौ ।
सूरज़ प्रभु नंद-सुवन मित्र व्है, भक्तनि लाड़ लड़ायौ ॥१६॥
अर्थ-(अपनी मड़ैया के स्थान पर सोने का आवास बना देखकर भौचक्का
सुदामा सोचता है।) क्या मैं लौटकर फिर द्वारिका आ गया ! (लगता है) मार्ग की
(स्थिति) मुझे समझ नही पड़ी । न किसी से (मैंने) पूछा, न किसी ने (स्वयमेव)
बताया । (मुझे पुनः आया देख) कृष्ण कहेंगे (कि) इन्होंने सत्य छोड़ दिया, वहाँ (यह)
दरिद्री था, (तभी तो) ललचा गया, (लौट आया) । ऐश्वर्य मांगने पर तृण की छाया
भी मिट गयी (कृष्ण के पास समृद्धि के लालच से गया, लौटा तो फूस का छप्पर भी
गायब) उसे कितनी कठिनाई से मैंने छाया था । (मुझ) कुमति के लिये समीप मे
सागर (भी) नही (कि जाकर डूब मरूँ), अन्त मे विधाता ने मुझे क्यो भरमाया ?
(कहाँ पहुँचा दिया) । (सोने का आवास) देखते हुए चित्त मे सोचता है; मन में स्वप्न
का (सा) डर छा गया ( मैं डरा, कही सपना तो नही देख रहा हूँ ! ) (यहाँ तो) वैभव
का कौतुक बना है- (जहां मड़ैया थी वहाँ अब) कल्पवृक्ष, दासी, घोडे, हाथी (हैं) सूरज़
(कहते हैं) (कि) नन्द के प्रभु (कृष्ण) मित्र होकर (अनुकूल होने पर), (इसी प्रकार)
भक्तों का लाड़ लड़ाया करते है (उन पर प्रेम का प्रदर्शन किया करते है) ॥१६॥
कहा भयौ मेरौ गृह माटी कौ ।
हौं तौ गयौ गुपालहिं भेंटन, और खरच तंदुल गाँठी कौ ।
विनु ग्रीवा कल सुभग न आन्यौ, हुतौ कमंडल दृढ़ काठी कौ ।
घुनौ बाँस जुत बुनौ खटोला, काहु कौ पलँग कनक पाटी कौ ।
नूतन छीरोदक जुवती पै, भूषन हुतौ न लोह माटी कौ ।
सूरदास प्रभु कहा निहोरौ, मानत रंक त्रास टाटी कौ ॥१७॥
अर्थ-मेरे मिट्टी के घर का क्या हुआ ? (वह कहाँ चला गया !) मैं तो गोपाल
से भेट करने गया था और (मैंने) गांठ के (अपने पास के) (चावल) भी खर्च किए
(गवाँ दिए) । विना गले का टूटा घडा (कलसु भगन ?) (मैं) लाया (था) कड़ी
लकड़ी (काठी) का कमंडल (मेरे पास ) था (तथा) घुने हुए बाँस का विना हुआ
खटोला (जहां) था (उसी घर मे अब) सोने की पारी वाला किसी का पलंग (पड़ा)
है । (जिस) युवती (पत्नी) के पास लोहे (अथवा) मिट्टी के आभूषण न थे (उसी के
पास अब) नयी रेशमी वस्त्र है । सूरदास के प्रभु से क्या प्रार्थना करूँ ? (जिस) दरिद्री
३४८ सूरसागर सार सटीक
को झोपडी (टाटी) का कष्ट है (जिसके पास झोपड़ी भी नही है) उसे भी (प्रभु)
अंगीकार करते हैं (उसकी चिन्ता भी उन्हे रहती है) ॥१७॥
भूलौ द्विज देखत अपनौ घर ।
औरहिं भाँति रची रचना रुचि, देखतही उपज्यौ हिरदै डर ।
कै वह ठोर छुड़ाइ लियौ किहुँ, कोऊ आइ बस्यौ समरथ नर ।
कै हौं भूलि अनतहीँ आयौ, यह कैलास जहाँ सुनियत हर ।
बुध-जन कहत दुबल घातक बिधि, सो हम आज लही या पटतर ।
ज्यों नलिनी बन छाँड़ि वसै जल, दाहै हेम जहाँ पानी-सर ।
पाछै तैं तिय उतरि कह्यौ पति, चलिए द्वार गह्यौ कर सौं कर ।
सूरदास यह सब हित हरि कौ, द्वारैं आइ भयौ जु कलपतर ॥१८॥
अर्थ—ब्राह्मण (सुदामा) अपना घर देखकर भ्रमित हो गया (वहां तो) और
ही तरह की रुचिकर रचना रची थी, जिसे देखते ही (सुदामा के) हृदय मे डर उत्पन्न
हुआ । या तो किसी ने वह स्थान (उसका पुराना घर) छीन लिया (और) (वहाँ पर)
आकर कोई समर्थ व्यक्ति बस गया (किसी बलवान् ने कब्जा कर लिया) या तो मैं भूल
कर अन्यत्र (ही) आ गया (हूँ), यह (कही) कैलाश तो नही है जहाँ शिव (का निवास)
सुना जाता है । बुद्धिमान लोग कहते हैं कि विधाता दुर्बलो का घातक है उसका नमूना
आज पा लिया (देखा) । जैसे कमलिनी वन छोड़कर जल मे बसती है, (लेकिन) जहाँ
(वहाँ) पानी के तालाब मे (भी) उसे हिम दग्ध करता है ! पीछे से (सुदामा की) पत्नी
उतरकर आयी (और) हाथ-से-हाथ पकडकर पति से बोली (कि) दरवाजे (घर) के
(भीतर) चलिए । सूरदास (कहते है) (कि) यह सब हरि का स्नेह है (जिसके फलस्व-
रूप द्वार पर आकर कल्पवृक्ष लग गया है !) ॥१८॥
कैसैँ मिले पिय स्याम सँघाती ।
कहियै कत कौन बिधि परसे, बसन कुचील छीन अति गाती ।
उठिकै दौरि अंक भरि लीन्हौ, मिलि पूछी इत-उत कुसलाती ।
पटतैँ छोरि लिए कर तंदुल, हरि समीप रुकमिनी जहाँ ती ।
देखि सकल तिय स्याम-सुँदर गुन, पट दै ओट सबै मुसक्यातीँ ।
सूरदास प्रभु नवनिधि दीन्ही, देते और जो तिय न रिसातीँ ॥१९॥
अर्थ—हे प्रिय ! मित्र साथी श्याम कैसे मिले । हे पति ! कहिये, (कृष्ण ने)
मैले वस्त्रो वाले तुम्हारे अत्यन्त क्षीण शरीर को कैसे स्पर्श किया ? सुदामा ने कहा
(कृष्ण ने) उठकर-दौडकर (मुझे) गले लगाया, (तथा) मिलकर यहाँ-वहाँ की (सबकी)
कुशलता पूछी । वस्त्र से खोलकर हाथ मे चावल ले लिया, जहां (वहाँ) हरि के पास
(ही) रुक्मनि भी थी । (उस समय) सभी स्त्रियां श्याम सुन्दर (कृष्ण) के गुणो को
देखकर वस्त्र की ओट मे मुसकराती थी । सूरदास (कहते है) (कि) प्रभु (कृष्ण) ने
द्वारिका चरित ३४६
नव-निधियां दी, (वे) और भी देते यदि (उनकी) पत्नी (रुक्मिणी) नाराज न
होती ॥१६॥
हरि बिनु कौन दरिद्र हरै ।
कहत सुदामा सुनि सुन्दरि, हरि मिलन न मन बिसरै ।
और मित्र ऐसी गति देखत, को पहिचान करै ।
विपत्ति परैं कुसलात न बूझै, बात नहीं बिचरै ।
उठि भेटे हरि तंदुल लीन्हे, मोहिं न वचन फुरै ।
सूरदास लछि दई कृपा करि, टारी निधि न टरै ॥२०॥
अर्थ—हरि के बिना दरिद्रता कौन दूर करे ? सुदामा कहते हैं (कि) हे सुन्दरी,
सुनो ! हरि का मिलना मन से भूलता नही । (मेरी) जैसी गति देखकर दूसरे मित्र
क्या मुझे पहचानते ? विपत्ति पड़ने पर (कोई) कुशलता (भी) नही पूँछते (तथा)
बातचीत (भी) नही करते । हरि (कृष्ण) ने उठकर भेट (और) चावल ले लिया
मुझसे (तो) वचन तक स्फुरित नही हुआ (मैं तो बोल भी न पाया) । सूरदास
(कहते हैं) (कि) (कृष्ण ने) कृपा करके (इतनी) लक्ष्मी (सम्पत्ति) दी, कि (वह)
निधि टाले नही टलती (खर्च करने पर भी समाप्त नही होती) ॥२०॥
व्रजनारी पथिक संवाद
तब तैं बहुरि न कोऊ आयौ ।
वहै जु एक बेर ऊधौ सौं, कछु संदेसौ पायौ ।
छिन-छिन सुरति करत जदुपति की, परत न मन समुझायौ ।
गोकुलनाथ हमारैं हित लगि, लिखि हूँ क्यौं न पठायौ ।
यहै विचार करौं धौं सजनी, इती गहरु क्यौं लायौ ।
सूर स्याम अब वेगि न मिलहू, मेघनि अम्बर छायौ ॥२१॥
अर्थ—(जब से कृष्ण गए) तब से (वहां से) लौटकर कोई नही आया । वहीं
एक बार ऊधो से (हमने) कुछ संदेश पाया था । हर क्षण यदुपति (कृष्ण) की स्मृति
करती हूँ; मन समझाते नही बनता । गोकुलपति (कृष्ण) ने हमारे हित के लिए
लिखकर भी (पत्र) नही भेजा । हे सखी ! यही विचार करती (रहती) हूँ (कि)
इतना विलंब क्यों किया । सूर के स्याम (कृष्ण) अब शीघ्र (ही) (क्यों) नही मिलते,
(अब तो) आकाश मे बादल छा गये हैं ॥२१॥
बहुरौ हो ब्रज बात न चाली ।
वहै सु एक बेर ऊधौ कर, कमल नयन पाती दै घाली ।
पथिक तिहारे पा लागति हौं, मथुरा जाहु जहाँ बनमाली ।
कहियौ प्रगट पुकारि द्वार ह्वै, कालिंदी फिरि आयौ काली ।
तब वह कृपा हुती नंदनंदन, रुचि रुचि रसिक प्रीति प्रतिपाली ।
माँगत कुसुम देखि ऊँचे द्रुम, लेत उछंग गोद करि आली ।
३५० सूरसागर सार सटीक
जब वह सुरति होति उर अंतर, लागत काम वान की भाली।
सूरदास प्रभु प्रीति पुरातन, सुमिरत दुसह सूर उर साली ॥२२॥
अर्थ-हे (पथिक) ! फिर (कृष्ण) ब्रज की बात नही चलायी। वही एक वार
कमल नेत्र (कृष्ण) ने उद्धव के हाथ पत्रिका देकर भेजी थी। हे पथिक ! तुम्हारे पैर
लगती हूँ; मथुरा जाओ जहां वनमाली (कृष्ण) हैं। द्वार पर से प्रत्यक्ष पुकार कर
कहना (कि) यमुना में (कालीदह मे) पुनः काली (नाग) आ गया ! उस समय (कृष्ण
की) वैसी (गहरी) कृपा थी, (उन) रसिक (कृष्ण ने) रुचि लेकर प्रेम का निर्वाह किया
था। (हे सखी !) ऊँचे वृक्ष मे लगे पुष्प को मांगने पर गोद मे उठाकर अपने उत्संग
(ऊपरी भाग, कंधो पर) बिठा लेते हैं (ताकि हम स्वयं अपने हाथ से तोड़ ले) ! जब
हृदय मे वह स्मृति होती है (वह घटना याद आती है) तो काम के बाण की नोक
(भाली) चुभती हैं। सूरदास (कहते हैं) (कि) प्रभु (कृष्ण) की प्रीति पुरानी (है)
स्मरण करते ही असह्य पीड़ा (शूल) हृदय मे सालती (चुभती) है ॥२२॥
तुम्हरे देस कागद मसि खूटी।
भूख प्यास अरु नीँद गई सब, विरह लरी तन लूटी।
दादुर मोर पपीहा बोले, अवधि भई सब झूठी।
पाछैं आइ तुम कहा करोगे, जब तन जैहै छूटी।
राधा कहति संदेश स्याम सौं, भई प्रीति की टूटी।
सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिनु, सखी करति है कूटी ॥२३॥
अर्थ- (जान पड़ता है) तुम्हारे देश में कागज (और) स्याही समाप्त हो गयी।
(हमारी) भूख, प्यास, नींद, सब चली गई, विरह ने शरीर को लूट लिया। दादुर,
मोर (तथा) पपीहा बोलने लगे; आने की अवधि सब झूठी हो गयी। बाद में आकर
तुम क्या करोगे, जब शरीर छूट जायेगा। राधा श्याम से संदेश कहती है (कि)
प्रेम खंडित हो रहा है। सूरदास के प्रभु ! तुम्हारे मिलन के विना सखियां (तुम्हारे
विषय मे) कूट करती हैं (उपहास करती हैं) ॥२३॥
पथिक कह्यौ ब्रज जाइ, सुने हरि जात सिंधु तट।
सुनि सब अँग भए सिथिल, गयौ नहिँ बज्र हियौ फट।
नर नारी घर-घरनि सबै, यह करति बिचारा।
मिलिहैं कैसी भाँति हमैं, अब नन्द कुमारा।
निकट वसत हुती आस, कियौ अब दूरि पयाना।
विना कृपा भगवान, उपाइ न सूरज आना ॥२४॥
अर्थ-(किसी) पथिक ने ब्रज जाकर कहा (कि), (उसने) सुना है (कि)
हरि सिंधु के तट (द्वारिका) जा रहे है। (यह) सुनकर (गोपियो के) सब अंग शिथिल
हो गये, (किन्तु) (उनका) वज्र (सा) (कठोर) हृदय फट नही गया। सभी घरों मे
नर (तथा) नारियां यहो विचार करती है (कि) अब नन्द-कुमार (कृष्ण) किस तरह
द्वारिका चरितं ३५३
मिलेंगे। (जब वे) निकट बसते थे तो मिलने की (कुछ) आशा थी, (किन्तु) अब तो
(उन्होंने) दूर प्रस्थान कर दिया। कृष्ण की कृपा के बिना सूर अब कोई दूसरा उपाय
नही ॥२४॥
नैना भए अनाथ हमारे ।
मदनगुपाल उहाँ तैं सजनी, सुनियत दूरि सिधारे ।
वै समुद्र हम मीन बापुरी, कैसेँ जीवैँ न्यारे ।
हम चातक वै जलद-स्याम-घन, पियतिँ सुधा-रस प्यारे ।
मधुरा बसत आस दरसन की, जोइ नैन मग हारे ।
सूरदास हमकौँ उलटी बिधि, मृतकहूँ, तैँ पुनि मारे ॥२५॥
अर्थ-गोपियां सोचती हैं कि हमारे नेत्र अनाथ हो गये। सुनती हूँ (कि)
मदन गोपाल वहाँ से (भी) (कही) दूर चले गये। वे (कृष्ण) समुद्र हैं, हम वेचारी
मछलियां हैं, (उनसे) अलग (होकर) कैसे जीवित रहे। हम चातक हैं, वे श्याम बादल
हैं, (हम) प्रिय का अमृत-रस पीती रहती हैं। मथुरां में बसते हुए दर्शन की आशा थी,
(किन्तु) रास्ता देखते नेत्र (अब) हार गये। सूरदास (कहते हैं) (कि) विधाता ने हमारे
लिए उल्टी (स्थिति) (पैदा कर दी), मरे हुए को पुनः मारा (कृष्ण बिरह) में हम
मरी सी थी ही, विधाता को इससे संतोष न हुआ, उसने हमें मार ही डाला ॥२५॥
उती दूर तैँ को आवै री ।
जासौँ कहि संदेस पठाऊँ, सो कहि कहन कहा पावै री ।
सिंधु कूल इक देस बसत है, देख्यौ सुन्यौ न मन धावै री ।
तहँ नव-नगर जु रच्यौ नंद-सुत, द्वारावति पुरी कहावै री ।
कंचन के बहु भवन मनोहर, रंक तहाँ नहिँ त्रन छावै री ।
ह्वाँ के बासी लोगनि कौँ क्यौं, ब्रज कौ बसिबौ मन भावै री ।
बहु बिधि करतिँ विलाप विरहिनी, बहुत उपायनि चित लावैँ री ।
कहा करौँ कहँ जाऊँ सूर प्रभु, को हरि पिय पै पहुँचावै री ॥२६॥
अर्थ - हे सखी ! उतनी दूर से (द्वारिका से) (भला) कौन आता है; जिससे
कह कर (हम) (कृष्ण के पास) संदेश भेजे, वह (विधि) कहो, (हम) (अपना संदेश)
कैसे कह पाये । समुद्र के किनारे एक देश बसता है । (उसे) न तो देखा है न सुना है
(और) न मन (वहाँ तक) दौड़ पाता है (मन द्वारिका की कल्पना ही नही कर पाता)
वहाँ नन्द के पुत्र (कृष्ण ने) नवीन नगर बसाया है जो द्वारिका पुरी कहलाता है।
वहाँ सोने के बहुत से मनोहर भवन हैं, (वहाँ) (कोई व्यक्ति) दरिद्र (ही) नही है
(जो) तृण से घर छाये । वहाँ के निवासी लोगो को ब्रज मे बसना क्यों अच्छा लगे ।
विरहिणियां बहुत प्रकार से विलाप करती हैं तथा बहुत (से) उपायों को (सोचने मे)
चित्त लगाती हैं। सूर के प्रभु (को पाने के लिए) क्या करें, कहाँ जाये; हरि प्रिय
(कृष्ण) के पास कौन पहुँचाए ॥२६॥
३५२ सूरसागर सार सटीक
हों कैसौँ के दरसन पाऊँ ।
सुनहु पथिक उहिँ देस द्वारिका, जौ तुम्हरैं सँग जाऊँ ।
बाहर भीर बहुत भूपनि की, बूझत वदन दुराऊँ ।
भीतर भीर भोग भामिनि की, तिहिँ ठाँ काहि पठाऊँ ।
बुधि बल जुक्ति जतन करि उहिं पुर, हरि पिय पै पहुँचाऊँ ।
अब वन वसि निसि कुंज रसिक बिनु, कौनैं दसा सुनाऊँ ।
श्रम कै सूर जाउँ प्रभु पासहिं, मन मैं भलैं मनाऊँ ।
नव-किसोर मुख मुरलि बिना, इन नैननि कहा दिखाऊँ ॥२७॥
अर्थ—मैं कैसे कृष्ण का दर्शन पाऊँ । हे पथिक ! सुनो, यदि तुम्हारे साथ उस
द्वारिका देश को चलूं (तो) (वहाँ) बाहर (कृष्ण के प्रासाद के बाहर) बहुत से राजाओ
की भीड (होगी); (उनके) पूछने पर (लज्जा से) मुख छिपा लूंगी (महल के) भीतर
स्त्री (पत्नी-रुक्मिणी) के सुख-विलास ("भोग") की प्रचुरता (है), उस स्थान पर
किसे भेजूँ । बुद्धि-बल (तथा) युक्तिपूर्ण यत्न करके उस नगर मे हरि प्रिय (कृष्ण) के
पास अपना (संदेश) (कैसे) भेजूँ । (राधिका !) अब रसिक (कृष्ण) के बिना वन मे
रहते हुए कुंज मे रात (के समय) अपनी दशा किसे सुनाऊँ । मुरली संयुक्त नव किशोर
(कृष्ण) के मुख के बिना इन नेत्रो को क्या दिखाऊँ ? ॥२७॥
तातैं अति मरियत अपसोसनि ।
मधुराहू तैं गए सखी री, अब हरि कारे कोसनि ।
यह अचरज सु वड़ौ मेरैं जिय, यह छाँड़नि, वह पोषनि ।
निपट निकाम जानि हम छाँड़ी, ज्यौं कमान बिन गोसनि ।
इक हरि के दरसन बिनु मरियत, अरु कुविजा के ठोसनि ।
सूर सु जरनि कहा उपजी जो, दूरि होति करि ओसनि ॥२८॥
अर्थ—हे सखी ! अब मथुरा से भी काले कोसो (बहुत दूर) चले गये हैं,
इसीलिए अफसोस (दुःख) से बहुत मर (बहुत कष्ट सह) रही हूँ। मेरे जी मे यह बड़ा
आश्चर्य है कि (कहाँ तो) (कृष्ण का) वह पालन-पोषण (करना), (और कहाँ) अब
इस प्रकार छोड़ देना ! बिना धनुपकोटि (दोनो नोको) के बिना जैसे धनुष कमान की
भाँति उन्होंने हमे बिल्कुल निकम्मी समझकर छोड दिया है, एक तो हरि के दर्शन विना
(मैं) मरती हूँ दूसरे कुब्जा के डाह (कुढन से) । सूरदास कहते हैं कि गोपियां कह रही
हैं कि जो जलन उत्पन्न हो गई क्या वह ओस से दूर हो सकती ? ॥२८॥
माई री कैसे बनै हरि कौ ब्रज आवन ।
कहियत है मधुबन तैं सजनी, कियौ स्याम कहुँ अनत गवन ।
अगम जु पंथ दूरि दच्छिन दिसि, तहँ सुनियत सखि सिंधु लवन ।
अब हरि ह्वाँ परिवार सहित गए, मग मै मार्यौ कालजवन ।
निकट बसत मतिहीन भईं हम, मिलिहुँ न आईँ सुत्यागि भवन ।
सूरदास तरसत मन निसि दिन, जदुपति लौं लै जाइ कवन ॥२९॥
अर्थ—हे सखी ! हरि का ब्रज लौटना कैसे संभव हो ? सखी, (लोग) कहते
हैं (कि) मधुबन से स्याम ने कही अन्यत्र गमन किया है। जो (जहाँ का) रास्ता अगम
(है), (जो) दूर दक्षिण दिशा मे (स्थित है), सखी ! सुनते हैं वहां लवण का समुद्र
है। अब हरि वहां परिवार सहित चले गये, (और) (वहां जाते समय) मार्ग मे
(उन्होने) काल यवन (राक्षस) को मारा। पास बसते समय (जब कृष्ण मथुरा मे ही
थे), (उस समय) हमारी अकल मारी गई (थी), (नही तो) भवन त्याग कर (उनसे)
मिल न आती । सूरदास (कहते हैं) (कि) रात-दिन मन तरसता है, यदुपति (कृष्ण)
के पास तक (अब) कौन ले जाय ॥२९॥
सुनियत कहुँ द्वारिका बसाई ।
दच्छिन दिशा तीर सागर कैं, कंचन कोट गोमती खाई ।
पंथ न चलै संदेस न आवै, इती दूर नर कोऊ न जाई ।
सत जोजन मथुरा तैं कहियत, यह सुधि एक पथिक पै पाई ।
सब ब्रज दुखी नंद जसुदा हू, इक टक स्याम राम लव लाई ।
सूरदास प्रभु के दरसन बिनु, भई विदित ब्रज काम दुहाई ॥३०॥
अर्थ—सुनती हूँ (कृष्ण ने) कही द्वारिका बसायी है। दक्षिण दिशा में सागर
के किनारे (वहाँ) सोने के किले (तथा), (किलों की सुरक्षा के लिए) गोमती की
नहर (बनी है), वह रास्ता नही चलता (उस तरफ पथिक नही जाते), (वहाँ से)
संदेश (भी) नही आता (तथा) इतनी दूर कोई मनुष्य नही जाता। मथुरा से (वह
नगरी) एक सौ योजन कही जाती है, यह खबर एक पथिक से (हमे) मिली। सब
ब्रज (वासी) (तथा) नंद-यशोदा (भी) दुखी हैं; (वे) एकटक श्याम और बलराम मे
ध्यान लगाये है। सूरदास कहते हैं (कि) प्रभु (कृष्ण) के दर्शन के बिना ब्रज मे
कामदेव की दुहाई विदित हुई (कामदेव के प्रताप का डंका बज गया) ॥३०॥
बीर बटाऊ पाती लीजौ ।
जब तुम जाहु द्वारिका नगरी, हमरे रसाल गुपालहिं दीजौ ।
रंगभूमि रमनीक मधुपुरी, रजधानी ब्रज को सुधि कीजौ ।
छार समुद्र छाँड़ि किन आवत, निर्मल जल जमुना कौ पीजौ ।
या गोकुल की सकल ग्वालिनी, देतिं असीस बहुत जुग जीजौ ।
सूरदास प्रभु हमरे कौतैं, नंद नंदन के पाईं परीजौ ॥३१॥
अर्थ—भाई पथिक ! (यह) पत्रिका लीजिए। जब तुम द्वारिका नगरी जाना
तो (इसे) हमारे रसिक गोपाल को देना। (कहना कि) ब्रज की राजधानी रमणीक
रंगभूमि मथुरा, की खबर (तो) लो। खारे समुद्र को छोड़कर क्यो नही आते; (यहाँ
आकर) यमुना के स्वच्छ जल को पिएं ! इस गोकुल की सभी ग्वालिनियां (तुम्हे)
२५
३५४ सूरसागर सार सटीक
आशीर्वाद देती हैं (कि) बहुत जुगो तक जियो । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं)
(कि) (हे पथिक!) हमारी तरफ से नद के पुत्र (कृष्ण) के पैर पड़ना (प्रणाम
करना) ॥३१॥
रुक्मिणी कृष्ण संवाद
रुकमिनी बूझति हैं गोपालहिं ।
कहौ बात अपने गोकुल की, कितिक प्रीति ब्रजबालहिं ।
तब तुम गाइ चरावन जाते, उर धरते बनमालहिं ।
कहा देखि रीझे राधा सौं, सुंदर नैन विसालहिं ।
इतनी सुनत नैन भरि आए, प्रेम विवस नँदलालहिं ।
सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै, घोष बात जनि चालहिं ॥३२॥
अर्थ—रुक्मिणी कृष्ण से पूछती हैं (कि) (जरा) अपने गोकुल की बात (तो)
कहो (और बताओ) ब्रज-बालाओं से (तुम्हारा) कितना प्रेम था । तब तुम गाय
चराने जाते थे, हृदय पर वनमाल धारण करते थे । क्या देखकर (तुम) सुन्दर विशाल
नेत्रो वाली राधा पर रीझे थे (उसकी विशेषताएं तो बताओ) । इतना सुनकर प्रेम से
विवश कृष्ण के नेत्र भर आये । सूरदास (कहते है कि) प्रभु (कृष्ण) मौन हो रहे।
(सिर्फ यही कहा) अहीरो की वस्ती (ब्रज) की बात (चर्चा) मत चलाओ ! ॥३२॥
रुकमिनी मोहिं निमेष न बिसरत, वे ब्रजवासी लोग ।
हम उनसौं कछु भली न कीन्हीं, निसि-दिन मरत वियोग ।
जदपि कनक मनि रची द्वारिका, विषय सकल संभोग ।
तद्यपि मन जु हरत बंसी-वट, ललिता कै संजोग ।
मैं ऊधौ पठयौ गोपिनि पै, दैन संदेसौ जोग ।
सूरदास देखत उनकी गति, किहिं उपदेसै सोग ॥३३॥
अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) हे रुक्मिणी ! मुझे क्षण भर भी ब्रजवासी-जन नही
भूलते । हमने उनके साथ (अर्थात् उनकी) कुछ (भी) भलाई नही की; (वे) रात-दिन
(मेरे) वियोग मे मरते हैं (दुख सहते हैं) । यद्यपि कनक तथा मणियों से द्वारिकां बनी
है, सुख के सभी विषय (उपकरण) (वहाँ उपलब्ध हैं), तब भी वंशी-वट (के नीचे)
ललिता का संयोग (सुख) मन को हर लेता है । मैंने ऊधो को गोपियो के पास योग
का संदेश देने को भेजा था । सूरदास (कहते हैं कि) उन (गोपियों के प्रेम) की गति
देखते हुए कौन शोक (युक्त) (योग का) उपदेश दे ? ॥३३॥
रुकमिनी मोहिं ब्रज बिसरत नाहीँ ।
वह क्रीड़ा वह केलि जमुन तट, सघन कदम की छाहीं ।
गोप बधुनि की भुजा कंध धरि, विहरत कुंजनि माहीं ।
और विनोद कहाँ लगि वरनौं, वरनत वरनि न जाहीं ।
द्वारका चरित ३५५
जद्यपि सुख निधान द्वारावति, गोकुल कें सम नाहीं ।
सूरदास घनस्याम मनोहर, सुमिरि-सुमिरि पछिताहीं ॥३४॥
अर्थ-हे रुक्मिणी ! मुझे ब्रज भूलता नही। वह क्रीडा, यमुना तट की वह
केलि, (तथा) सघन कदंब (के नीचे) की (वह) छाया (हम कैसे भूल जायें)। गोप-
बन्धुओं की भुजाएँ कंधो पर रखकर कुंजों (के बीच) विहार करना-और विनोद
कहां तक वर्णित करूँ, वर्णन करने पर (भो) वर्णित नही हो पाते। यद्यपि द्वारिका
सुख का निधान (है), (फिर भी) गोकुल के समान नही (है)। सूरदास (कहते हैं
कि) मनोहर घनश्याम (उन्हें) स्मरण कर करके पछताते हैं ॥३४॥
रुकमिनि चलौ जन्म भूमि जाहिँ ।
जद्यपि तुम्ह्रौ विभव द्वारिका, मथुरा कैँ सम नाहिँ ।
जमुना कैँ तट गाइ चरावत, अमृत जल अँचवाहिँ ।
कुंज केलि अरु भुजा कंध धरि, सीतल द्रुम की छाँहिँ ।
सरस सुगंध मंद मलयानल, बिहरत कुंजन माहिँ ।
जो क्रीड़ा श्री बृन्दावन मैँ, तिहूँ लोक मैँ नाहिँ ।
सुरभी ग्वाल नंद अरु जसुमति, मम चित तैँ न टराहिँ ।
सूरदास प्रभु चतुर सिरोमनि, तिनकी सेव कराहिँ ॥३५॥
अर्थ-हे रुक्मिणी ! चलो, (हम) जन्म-भूमि चलें। यद्यपि द्वारिका में तुम्हारा
वैभव (है), (फिर भी) (वह) मथुरा की समता का नहीं (है)। (मथुरा में तो हम)
यमुना के तट पर गाय चराते थे (तथा) (यमुना के) अमृत (जैसे) जल का आचमन
(पान) करते थे। (वहाँ हम) कुंजो मे केलि (करते थे), (अपनी) भुजाओ को
(गोपियो के) कंधो पर रखकर वृक्षों की शीतल छाया मे (बिहार करते थे)। उत्तम
सुगन्ध-युक्त मंद मलयानल मे कुजो मे घूमते थे। जो क्रीड़ाएं वृन्दावन मे (की), (वे)
तीनो लोक मे (प्राप्त) नही (है)। गाये, ग्वाल, नद और यशोदा मेरे चित्त से नही
टलते; सूरदास के प्रभु चतुर शिरोमणि (हैं) उन (सब) की सेवा किया करते हैं ॥३५॥
कुरुक्षेत्र में कृष्ण-ब्रजवासी भेंट
ब्रज बासिनि कौ हेतु, हृदय मैँ राखि मुरारी ।
सब जादव सौँ कह्यौ, बैठि कै सभा मझारी ।
बड़ी परब रवि-ग्रहन, कहा कहौँ तासु बड़ाई ।
चलौ सकल कुरुखेत, तहाँ मिलि न्हैयें जाई ।
तात, मात, निज नारि लिए, हरि जू सब संगा ।
चले नगर के लोग, साजि रथ तरल तुरंगा ।
कुरुच्छेत्र मैँ आइ, दियौ इक दूत पठाई ।
नद जसोमति गोप ग्वाल, सब सूर बुलाई ॥३६॥
३५६ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—ब्रजवासियो के स्नेह को हृदय मे रखकर मुरारी ने सभा के मध्य बैठकर
सभी यादवों से कहा (कि) सूर्य-ग्रहण का बड़ा पर्व (है), उसकी बड़ाई मैं कहां तक
करूँ । सब लोग कुरुक्षेत्र चलो, वहां मिलकर नहाया जाय । हरि जी, पिता-माता,
अपनी पत्नी (तथा) सब (लोगो) के साथ (चले), घोडे सजाकर नगर के लोग (भी)
चल पडे । कुरुक्षेत्र आकर (कृष्ण ने) एक दूत भेज दिया । (सूरदास कहते हैं उन्होने)
नंद-यशोदा, गोपी, ग्वालो (तथा) सभी को बुला भेजा ॥३६॥
हौँ इहाँ तेरेहि कारन आयौ ।
तेरी सौं सुनि जननि जसोदा, मोहिँ गोपाल पठायौ ।
कहा भयौ जो लोग कहत हैं, देवकि माता जायौ ।
खान-पान परिधान सबै सुख, तैँ ही लाड़ लड़ायौ ।
इतौ हमारो राज द्वारिका, मोँ जी कछू न भायो ।
जब-जब सुरति होति उहिँ हितकी, विछुरि बच्छ ज्यौँ धायौ ।
अब हरि कुरुच्छेत्र मैँ आए, सो मैँ तुम्हें सुनायौ ।
सब कुल सहित नंद सूरज प्रभु, हित करि उहाँ बुलायौ ॥३७॥
अर्थ—(पथिक ने कहा कि) मैं यहां तेरे ही कारण आया हूँ; हे माता यशोदा
सुनो ! तुम्हारी सौगन्ध, मुझे गोपाल ने (ही) भेजा है। (हरि ने यह कहा है) क्या
हुआ, जो लोग कहते हैं (कि) देवकी माता ने (मुझे) पैदा किया ? खान, पान, वस्त्र
(आदि) सभी सुखो को देकर तूने ही (मेरा) लालन-पालन किया । यहां द्वारिका मे
हमारा राज (है), (लेकिन) (वह) मेरे जी (को) कुछ भी अच्छा नही लगता । जब-
जब (तुम्हारे) उस स्नेह की याद आती है, (गाय से) बिछुड़े हुए बछड़े की तरह (मैं)
(तुम्हारे पास) दौड़ पड़ता हूँ । (पथिक ने यह भी कहा) अब हरि कुरुक्षेत्र आ गये हैं
वह (समाचार) मैंने तुम्हें .सुनाया । सूरज के प्रभु ने स्नेहपूर्वक समस्त कुल सहित
नन्द को वहाँ बुलाया है ॥३७॥
वायस गहगहात सुनि सुंदरि, बानी विमल पूर्व दिस बोली ।
आजु मिलावा होइ स्याम कौ, तू सुनि सखी राधिका भोली ।
कुच भुज नैन अधर फरकत् हैं, बिनहिँ बात अंचल ध्वज डोली ।
सोच निवारि करौ मन आनँद, मानौ भाग दसा बिधि खोली ।
सुनत बात सजनी के मुख की, पुलकित प्रेम तरकि गई चोली ।
सूरदास अभिलाष नंदसुत, हरषी सुभग नारि अनमोली ॥३८॥
अर्थ—हे सुन्दरी ! सुनो, कौआ प्रफुल्लित हो रहा है; (उसकी) विमल वाणी पूर्व
दिशा मे सुनाई पड़ी । हे भोली राधिका ! तू सुन, आज श्याम से तेरा मिलन होगा ।
कुच, भुजा, नेत्र, ओंठ फड़क रहे हैं; (तथा) हवा के (ही) ध्वज (के समान) अंचल
हिल रहा है । (अब) चिन्ता छोडकर मन मे आनंद करो, मानो ब्रह्मा ने (तेरी) भाग्य-
दशा खोल दी (तेरा भाग्योदय हो गया) । सखी के मुख की बात सुनते ही (राधा) प्रेम
द्वारका चरित ३५७
से पुलकित (हुई) (तथा) उसकी चोली के बंद टूट गये । सूरदास (कहते हैं कि) नंद के
पुत्र (से मिलने की) अभिलाषा से सुन्दर अनमोल स्त्री (राधा) हर्षित हो गयी ॥३८॥
राधा नैन नीर भरि आए ।
कब धौँ मिलैँ स्याम सुंदर सखि, जदपि निकट हैं आए ।
कहा करौँ किहिँ भाँति जाहुँ अब, पंख नहीं तन पाए ।
सूर स्याम सुन्दर घन दरसैँ, तन के ताप नसाए ॥३६॥
अर्थ—राधा के नेत्रों मे पानी भर आया। यद्यपि कृष्ण निकट आ गये हैं,
(किन्तु) हे सखि ! श्यामसुन्दर न जाने कब मिलें । क्या करूँ किस तरह जाऊँ, शरीर में
पंख (भी) (तो) नहीं हैं (कि उड़कर चली जाऊँ) । सूरदास (कहते है कि) श्याम
सुंदर घन (कृष्ण) के देखने से (ही) (राधा के) शरीर का ताप नष्ट होगा ॥३६॥
अब हरि आइहैँ जनि सोचै ।
सुनु बिधुमुखी बारि नैननि तैँ, अब तू काहैँ मोचै ।
लै लेखनि मसि लिखि अपने, संदेसहिँ छाँड़ि सँकोचै ।
सूर सु बिरह जनाउ करत कत, प्रबल मदन रिपु पोचै ॥४०॥
अर्थ—अब हरि आयेगे (तू) चिन्ता मत कर । हे चन्द्रमुखी सुनो, अब तू नेत्रो
से जल (आंसू) क्यो गिराती है ? लेखनी (तथा) स्याही लेकर अपने संदेश को संकोच
छोड़कर लिख । सूरदास (कहते हैं कि) (अब) विरह शरीर मे क्यो प्रभाव जमा रहा
है, (तथा) शत्रु, नीच कामदेव (क्यो) प्रबल (होता जा रहा है) ॥४०॥
पथिक, कहियौ हरि सौँ यह बात ।
भक्त बछल है बिरद तुम्हारौ, हम सब किए सनाथ ।
प्रान हमारे संग तिहारैँ, हमहूँ हैं अब आवत ।
सूर स्याम सौँ कहत संदेसौ, नैनन नीर बहावत ॥४१॥
अर्थ—हे पथिक ! हरि से यह बात कहना कि आपका यश भक्तवत्सलता का
है, (आपने) हम सबों को सनाथ कर दिया है। हमारे प्राण तुम्हारे साथ (हैं), अब
हम भी आती है। सूरदास (कहते है कि) श्याम से संदेश कहती हुई (गोपियाँ) नेत्रो
से नीर बहाती हैं ॥४१॥
नंद जसोदा सब ब्रजवासी ।
अपने-अपने सकट साजिकै, मिलन चले अबिनासी ।
कोउ गावत कोउ बेनु बजावत, कोउ उतावल धावत ।
हरि दरसन की आसा कारन, बिबिध मुदित सब आवत ।
दरसन कियौ आइ हरि जू कौँ, कहत स्वप्न कै साँचौ ।
प्रेम मगन कछु सुधि न रही अँग, रहे स्याम रँग राँचौ ।
३५८ सुरसागर सार सटीक
जासों जैसी भाँति चाहिये, ताहि मिले त्यों धाइ ।
देस-देस के नृपति देखि यह, प्रीति रहे थरगाइ ।
उमँग्यौ प्रेम समुद्र दुहूँ दिसि, परिमिति कही न जाइ ।
सूरदास यह सुख सो जानैँ, जाकैँ हृदय समाइ ॥४२॥
अर्थ—नंद, यशोदा और सब ब्रजवासी अपनी-अपनी गाड़ियां सजाकर अविनाशी
(कृष्ण) से मिलने चल पडे । कोई गाता है, कोई वंशी बजाता है (तथा) कोई उतावला
(मस्त) होकर दौडता है। हरि दर्शन की आशा के लिए सभी प्रसन्न (होकर) आते
हैं। (जब उन्होने) आकर हरि जी के दर्शन किये (तब वे) कहते हैं (कि) (यह) स्वप्न
(है) या वास्तविकता (है) । प्रेम मे मग्न (होने के कारण) अंग की कुछ स्मृति (शेष)
न रही; (वे सब) श्याम के रंग मे रंग गये । जिससे जिस तरह उचित था उससे उसी
तरह (कृष्ण) दौड़कर मिले । देश-देश के राजा यह प्रेम देखकर चुप हो गये (किकर्तव्य
हो गये) । दोनो दिशाओ से प्रेम का (ऐसा) समुद्र उमडा (कि) उसकी सीमा अकथ-
नीय है। सूरदास कहते है (कि) इस सुख को वही जान सकता है जिसके हृदय मे (यह
प्रेम) समा जाय (जो इसे मनोगत या समझ सके) ॥४२॥
तेरी जीवन मूरि मिलहि किन माई ।
महाराज जदुनाथ कहावत, तबहिँ हुते सिसु कुँवर कन्हाई ।
पानि परे भुज धरे कमल मुख, पेखत पूरव कथा चलाई ।
परम उदार पानि अवलोकत, हीन जानि कछु कहत न जाई ।
फिर-फिर अब सनमुखही चितवति, प्रीतिसकुच जानी जदुराई ।
अब हँसि भेंटहु कहि मोहिं निज-जन, बाल तिहारौ नंद दुहाई ।
रोम पुलक गदगद तन तीछन, जलधारा नैननि वरषाई ।
मिले सु तात, मात, बांधव सब, कुसल-कुसल करि प्रस्न चलाई ।
आसन देइ बहुत करी बिनती, सुत धोखै तब बुद्धि हिराई ।
सूरदास प्रभु कृपा करी अब, चितहिँ धरे पुनि करी बड़ाई ॥४३॥
अर्थ—(हे सखी !) तेरी जीवन बूटी (जिलाने वाली जडी : कृष्ण) क्यो नही
मिलती ? (कारण यह है कि) तब (गोकुल मे जब थे) तो (वे) शिशु (रूप मे) "कन्हाई"
(ही) थे, (किन्तु) (अब) (वे) महाराज यदुनाथ कहे जाते है ! (कृष्ण के) हाथ पडने
(मिलने) पर (सभी ब्रजवासियों ने) (उनकी) भुजाओं (तथा) कमल मुख का स्पर्श
किया; (उन्हें) देखते (ही) पूर्व-लीलाओं की चर्चा चलाई । (वे कृष्ण के) अत्यन्त श्रेष्ठ
हाथों को देखते है, (अपने को) हीन (छोटा) जानकर (उनसे) (संकोच वश) कुछ कहते
नही बनता । अब (वे) बार-बार (कृष्ण के) सम्मुख ही देखते हैं; (तब) यदुराय (कृष्ण)
ने (उनका) प्रेम (पूर्ण) संकोच जान लिया । (कृष्ण ने कहा) अब हंसकर मुझे अपना
जन कहकर भेंटो; नंद की दुहाई देकर (तुम से) कहता हूँ (कि) मैं तुम्हारा बालक (ही)
द्वारका चरित ३५८
हूँ । (कृष्ण के) रोम पुलकित (हो गये), शरीर गदगद (हो गया) तथा नेत्रों से जल
की तेज (तीक्ष्ण) धारा बरस पडी । (वे) पिता-माता, तथा सभी बंधुओं से मिले (तथा)
(सब से) कुशल प्रश्न की (चर्चा) की (सब से अलग अलग कुशलता की बात पूछी) ।
(उन्हे) आसन देकर (बिठाकर) (कृष्ण ने) बहुत विनती की (और कहा) उस समय-
जब हम (ब्रज में थे) तब पुत्र के भ्रम मे (अर्थात् मुझे पुत्र मान लेने के कारण)
(तुम्हारी) बुद्धि खो गई थी । सूरदास के प्रभु (कृष्ण) ने अब कृपा की, (नंद-यशोदा
को) चित्त मे धारण किया; पुनः (उनकी) प्रशंसा की ॥४३॥
माधव या लगि है जग जीजत ।
जातैं हरि सौं प्रेम पुरातन, बहुरि नयौ करि लीजत ।
कहँ ह्वौ तुम जदुनाथ सिंधु तट, कहँ हम गोकुल बासी ।
वह बियोग, यह मिलन कहाँ अब, काल चाल औरासी ।
कहँ रबि राहु कहाँ यह अवसर, बिधि संयोग बनायौ ।
उहिँ उपकार आजु इन नैननि, हरि दरसन सचुपायौ ।
तब अरु अब यह कठिन परम अति, निमिषहुँ पीर न जानी ।
सूरदास प्रभु जानि आपने, सबहिनि सौं रुचि मानी ॥४४॥
अर्थ—हे माधव ! इसीलिए संसार जीता है (संसार अभी तक स्थित है) ।
चूंकि हरि से (हमारा) प्रेम पुराना है (जन्म-जन्मान्तर का है), (इसलिए) (हम)
(उसे) फिर नया कर लेते हैं । कहां तुम सिंधु के किनारे (रहने वाले) (महाराजा)
यदुनाथ; (और) कहां हम गोकुल (गांव) के निवासी ! कहां वह (महान्) (दुखदायी)
वियोग, (और) कहां अब यह (अत्यन्त सुखदायक) मिलन ! (सचमुच) काल की गति
विलक्षण है। कहां सूर्य (और) राहु (दोनों) मे कोई सम्बन्ध नही (तथा) कहां (आज)
यह अवसर (जब सूर्य राहु द्वारा ग्रसित हो रहा है); ब्रह्मा ने (यह) संयोग (सूर्यग्रहण)
बनाया है। उसी (ब्रह्मा) की कृपा से आज (हमारे) इन नेत्रो ने कृष्ण के दर्शन पाकर
सुख पाया । तब और अब (दोनो अवसरों पर) यह अत्यधिक कठिन है (आसानी से
समझ में नही आता), (किन्तु अब तो) क्षण मात्र के लिए भी पीडा नही जान पड़ी ।
सूरदास के प्रभु ने (उन्हे) अपना जन (भक्त) जानकर सभी से रुचिकर व्यवहार किया
(प्रेम प्रदर्शित किया) ॥४४॥
राधा कृष्ण मिलन
हरि सौं बूझति रुकमिनी इनमैं, को बृषभानु किसोरी ।
बारक हमैं दिखावहु अपने, बालापन की जोरी ।
जाकौ हेत निरंतर लीन्हे, डोलत ब्रज की खोरी ।
अति आतुर ह्वै गाइ दुहावन, जाते पर-घर चोरी ।
रचते सेज स्वकर सुमननि की, नव-पल्लव पुट तोरी ।
बिन देखें ताके मन तरसैं, छिन बीतै जुग कोरी ।
सूर सोच सुख करि भरि लोचन, अंतर प्रीति न थोरी।
सिथिल गात मुख बचन फुरत नहिं, ह्वै जु गई मति भोरी ॥४५॥
अर्थ—हरि से रुक्मिणी पूछती हैं (कि) इनमें वृषभानु की पुत्री (राधा) कौन
है ? एक बार (तो) जरा हमे अपने बचपन की जोड़ी (संगिनी) दिखाओ; जिस (राधा)
के प्रेम को लिए (प्रेम में मग्न) (तुम) निरन्तर ब्रज की गलियो मे डोला करते थे।
दूसरों के घर चोरी (करने) (तथा) बहुत आतुर होकर (ग्वालों की) गाय दुहाने जाते
थे। नवीन पल्लव तोड़कर, (उनका) पुट (देकर) अपने हाथो से फूलो की सेज रचते
थे। बिना देखे (तुम्हारा) मन तरसता था तथा एक क्षण युग के समान बीतता था ।
सूरदास (कहते हैं) (कृष्ण ने) उस सुख को सोचकर नेत्रो मे आंसू भर लिए; उनके हृदय
मे (राधा के प्रति) कम प्रेम न था। उनका शरीर शिथिल (हो गया) मुख से बात
नही फूटती (निकलती) थी, उनकी बुद्धि भ्रमित हो गयी ॥४५॥
बूझति है रुकमिनी पिय इनमैं, को वृषभानु किसोरी ।
नैंकु हमैं दिखरावहु अपनी, बालापन की जोरी।
परम चतुर जिन कीन्हे मोहन, अल्प वैस ही थोरी।
बारे तैं जिहिं यहै पढ़ायौ, बुधि बल कल विधि चोरी।
जाके गुन गनि ग्रंथित माला, कबहुँ न उत तैं छोरी।
मनसा सुमिरन, रूप ध्यान उर, दृष्टि न इत उत मोरी।
वह लखि जुवति वृन्द मैं ठाढ़ी, नील वसन तन गोरी ।
सूरदास मेरौ मन बाकी, चितवनि बंक हरयौ री ॥४६॥
अर्थ—रुक्मिणी (कृष्ण से) पूछती हैं (कि) हे प्रिय ! इनमे वृषभानु की बेटी
(राधा) कौन है ? हमे थोड़ा अपने बचपन की जोड़ी (तो) दिखाओ ! जिसने अल्प-
आयु ही मे कृष्ण को परम चतुर बना दिया। बचपन से ही जिसने यही पढ़ाया कि
बुद्धि के बल से (तथा) फल (कौतुक) के बल से चोरी (कैसे की जाय) जिसके गुणो के
समूह से ग्रन्थित माला (तुमने) कभी भी हृदय से नही हटायी (जिसके गुण तुम कभी
नहीं भूले) एकाग्रचित्त होकर (तुमने) स्मरण किया तथा हृदय मे जिसके रूप का
ध्यान किया। (कृष्ण ने उत्तर दिया :) वह देखो, नीले वस्त्रो (से युक्त) गोरे शरीर
वाली (राधा) युवतियों के समूह मे खड़ी है। सूरदास (कृष्ण) (कहते हैं) उसी की
तिरछी नजर ने मेरे चित्त को हर लिया ॥४६॥
हरि जू इते दिन कहाँ लगाए।
तबहिं अवधि मैं कहत न समुझी, गनत अचानक आए।
भली करी जु बहुरि इन नैननि, सुदर दरस दिखाए।
जानी कृपा राज काजहु हम, निमिष नहीं बिसराए।
बिरहिनि बिकल बिलोकि सूर प्रभु, धाइ हृदै करि लाए।
कछु इक सारथि सौं कहि पठयौ, रथ के तुरँग छुड़ाए ॥४७॥