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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 306

३४६ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—गुरु के घर (से) जब हम वन जाते थे, (तब) हमारे बदले (ये) सब दुख
सहकर लकड़ी जोड़ते (एकत्र करते) थे । एक दिन वन में वर्षा हुई, (हम लोग) उसी
स्थान पर रह गये । इनकी कृपा से मुझे श्रम नही हुआ, प्रातः होने पर गुरु (के घर)
आये । उस दिन सुदामा ने जो उपकार किया वह मुझे भूलता नही ! मुरारि (कृष्ण)
स्वयं कहते हैं कि प्रत्युपकार (बदले) (के रूप) मे क्या करूँ ? ।।१३।।
सुदामा गृह कौँ गमन कियौ ।
प्रगट बिप्र कौँ कछु न जनायौ, मन मैं बहुत दियौ ।
वेई चीर कुचील वहै विधि, मोकौँ कहा भयौ ।
धरिहौँ कहा जाय तिय आगैँ, भरि भरि लेत हियौ ।
सो संतोष मानि मन हीँ मन, आदर बहुत लियौ ।
सूरदास कीन्हे करनी बिनु, को पतियाइ बियौ ।।१४।।
अर्थ—सुदामा ने घर के लिए प्रस्थान किया । प्रकट रुप मे विप्र को कुछ
नही बताया, (लेकिन) मन मे बहुत दिया । (सुदामा सोचते है) वही मैले वस्त्र, वही
विधि मुझे हुआ ही क्या (क्या मिला) ? पत्नी के आगे जाकर क्या रखूंगा; (सुदामा का)
हृदय (दुख) से भर-भर आता था । (सुदामा ने) मन-ही-मन इस (बात पर) संतोष
किया (कि) (कृष्ण ने) बहुत आदर से (मुझे) लिया (मेरा बहुत आदरपूर्वक स्वागत
किया) । सूरदास (कहते है) (कि) करणी किये बिना दूसरा कौन विश्वास करेगा ।
(सुदामा सोचते है कि कृष्ण के अतिरिक्त दूसरा ऐसा कौन है जो मुझे जैसे अकर्मण्य
का विश्वास कर इतना आदर देगा) ।।१४।।
सुदामा मंदिर देखि डरचौ ।
इहाँ हुती मेरी तनक मड़ैया, को नृप आनि छरचौ ।
सीस धुनै दोऊ कर मीँड़े, अंतर सोच परचौ ।
ठाढ़ी तिया जु मारग जोवै, ऊँचै चरन धरयौ ।
तोहिँ आदरचौ त्रिभुवन कौ नायक, अब क्यौँ जात फिरचौ ।
सूरदास प्रभु की यह लीला, दारिद दुःख हरचौ ।।१५।।
अर्थ—(घर लोटने पर) सुदामा मंदिर (अपना घर) देखकर डर गया ! यहां
मेरी छोटी सी मड़इया थी, किस नृप ने आकर छल किया (छीन लिया) । (वे) सिर
घुमाते हैं, दोनो हाथ मलते है, मन के भीतर सोचने लगे । चरणो को ऊँचा करके
(ऊंचे स्थान पर खड़ी होकर) स्त्री खडी हुई मार्ग जोह रही है । (उसने कहा) त्रिभुवन
के नायक ने आदर दिया अब (घर से) क्यो वापस जाते हो ! सूरदास (कहते हैं)
(कि) यह प्रभु (कृष्ण) की लीला है कि (उन्होंने) (समस्त) दुख-दरिद्रता को हर
लिया ।।१५।।
हौँ फिरि बहुरि द्वारिका आयौ ।
समुझि न परी मोहिँ मारग की, कोउ बूझौ न बतायौ ।