सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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आशीर्वाद देती हैं (कि) बहुत जुगो तक जियो । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं)
(कि) (हे पथिक!) हमारी तरफ से नद के पुत्र (कृष्ण) के पैर पड़ना (प्रणाम
करना) ॥३१॥
रुक्मिणी कृष्ण संवाद
रुकमिनी बूझति हैं गोपालहिं ।
कहौ बात अपने गोकुल की, कितिक प्रीति ब्रजबालहिं ।
तब तुम गाइ चरावन जाते, उर धरते बनमालहिं ।
कहा देखि रीझे राधा सौं, सुंदर नैन विसालहिं ।
इतनी सुनत नैन भरि आए, प्रेम विवस नँदलालहिं ।
सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै, घोष बात जनि चालहिं ॥३२॥
अर्थ—रुक्मिणी कृष्ण से पूछती हैं (कि) (जरा) अपने गोकुल की बात (तो)
कहो (और बताओ) ब्रज-बालाओं से (तुम्हारा) कितना प्रेम था । तब तुम गाय
चराने जाते थे, हृदय पर वनमाल धारण करते थे । क्या देखकर (तुम) सुन्दर विशाल
नेत्रो वाली राधा पर रीझे थे (उसकी विशेषताएं तो बताओ) । इतना सुनकर प्रेम से
विवश कृष्ण के नेत्र भर आये । सूरदास (कहते है कि) प्रभु (कृष्ण) मौन हो रहे।
(सिर्फ यही कहा) अहीरो की वस्ती (ब्रज) की बात (चर्चा) मत चलाओ ! ॥३२॥
रुकमिनी मोहिं निमेष न बिसरत, वे ब्रजवासी लोग ।
हम उनसौं कछु भली न कीन्हीं, निसि-दिन मरत वियोग ।
जदपि कनक मनि रची द्वारिका, विषय सकल संभोग ।
तद्यपि मन जु हरत बंसी-वट, ललिता कै संजोग ।
मैं ऊधौ पठयौ गोपिनि पै, दैन संदेसौ जोग ।
सूरदास देखत उनकी गति, किहिं उपदेसै सोग ॥३३॥
अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) हे रुक्मिणी ! मुझे क्षण भर भी ब्रजवासी-जन नही
भूलते । हमने उनके साथ (अर्थात् उनकी) कुछ (भी) भलाई नही की; (वे) रात-दिन
(मेरे) वियोग मे मरते हैं (दुख सहते हैं) । यद्यपि कनक तथा मणियों से द्वारिकां बनी
है, सुख के सभी विषय (उपकरण) (वहाँ उपलब्ध हैं), तब भी वंशी-वट (के नीचे)
ललिता का संयोग (सुख) मन को हर लेता है । मैंने ऊधो को गोपियो के पास योग
का संदेश देने को भेजा था । सूरदास (कहते हैं कि) उन (गोपियों के प्रेम) की गति
देखते हुए कौन शोक (युक्त) (योग का) उपदेश दे ? ॥३३॥
रुकमिनी मोहिं ब्रज बिसरत नाहीँ ।
वह क्रीड़ा वह केलि जमुन तट, सघन कदम की छाहीं ।
गोप बधुनि की भुजा कंध धरि, विहरत कुंजनि माहीं ।
और विनोद कहाँ लगि वरनौं, वरनत वरनि न जाहीं ।