सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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बलभद्र ब्रज यात्रा
स्याम राम के गुन नित गाऊँ । स्याम राम ही सौं चित लाऊँ ।
एक बार हरि निज पुर छाए । हलधर जी बृन्दावन गए ।
रथ देखत लोगनि सुख पाए । जान्यौ स्याम राम दोउ आए ।
नन्द जसोमति जब सुधि पाई । देह गेह की सुरति भुलाई ।
आगैं ह्वै लैबे कौं धाए । हलधर दौरि चरन लपटाए ।
बल कौं हित करि गरैं लगाए । दै असीस बोले या भाए ।
तुम तौ भली करी बलराम । कहाँ रहे मन मोहन स्याम ।
देखो कान्हर की निठुराई । कबहुँ पाती हू न पठाई ।
आपु जाइ ह्वाँ राजा भए । हमकौं बिछुरि बहुत दुख दए ।
कहौ कबहुँ हमरी सुधि करत । हम तौ उन बिनु बहु दुख भरत ।
कहा करैं ह्वाँ कोउ न जात । उन बिनु पल पल जुग सम जात ।
इहिँ अन्तर आए सब ग्वार । भेंटे सबनि जथा ब्यौहार ।
नमस्कार काहूँ कौ कियौ । काहू कौं अंकम भरि लियौ ।
पुनि गोपी जुरि मिलि सब आईँ । तिन हित साथ असीस सुनाईँ ।
हरि सुधि करि सुधि बुधि बिसराई । तिनकौ प्रेम कह्यौ नहिं जाई ।
कोउ कहै हरि ब्याही बहु नार । तिनकौ बढ़्यौ बहुत परिवार ।
उनकौं यह हम देतिँ असीस । सुख सौं जीवैं कोटि बरीस ।
कोउ कहै हरि नाहीँ हम चीन्हौ । बिनु चीन्हैं उनकौं मन दीन्हौ ।
निसि दिन रोवत हमैँ बिहाइ । कहौ करैं अब कहा उपाइ ।
कोउ कहै इहाँ चरावत गाइ । राजा भए द्वारिका जाइ ।
काहे कौं वै आवैं इहाँ । भोग बिलास करत नित उहाँ ।
कोउ कहै हरि रिपु छै किए । अरु मित्रनि कौ बहु सुख दिए ।
बिरह हमारौ कहँ रहि गयौ । जिन हमकौं अति हीँ दुख दयौ ।
कोउ कहै जे हरि की रानी । कौन भाँति हरि कौं पतियानी ।
कोऊ चतुर नारि जो होइ । करै नहीं पतिआरी सोइ ।
कोउ कहै हम तुम कत पतियाईँ । उनकैं हित कुल लाज गवाईँ ।
हरि कछु ऐसौ टोना जानत । सबकौं मन अपनैं बस आनत ।
कोउ कहै हरि हम सब बिसराईं । कहा कहैं कछु कह्यौ न जाई ।
हरिकौं सुमिरि नयन जल धारैं । नैंकु नहीँ मन धीरज धारैं ।
यह सुनि हलधर धीरज धारि । कह्यौ आइहैं हरि निरधारि ।
जब बल यह संदेस सुनायौ । तब कछु इक मन धीरज आयौ ।
बल तहं बहुरि रहे द्वै मास । ब्रज बासिनि सौं करत विलास ।
सब सौं मिलि पुनि निजपुर आए । सूरदास हरि के गुन गाए ॥८॥