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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 313

निकट बसत मतिहीन भईं हम, मिलिहुँ न आईँ सुत्यागि भवन ।
सूरदास तरसत मन निसि दिन, जदुपति लौं लै जाइ कवन ॥२९॥
अर्थ—हे सखी ! हरि का ब्रज लौटना कैसे संभव हो ? सखी, (लोग) कहते
हैं (कि) मधुबन से स्याम ने कही अन्यत्र गमन किया है। जो (जहाँ का) रास्ता अगम
(है), (जो) दूर दक्षिण दिशा मे (स्थित है), सखी ! सुनते हैं वहां लवण का समुद्र
है। अब हरि वहां परिवार सहित चले गये, (और) (वहां जाते समय) मार्ग मे
(उन्होने) काल यवन (राक्षस) को मारा। पास बसते समय (जब कृष्ण मथुरा मे ही
थे), (उस समय) हमारी अकल मारी गई (थी), (नही तो) भवन त्याग कर (उनसे)
मिल न आती । सूरदास (कहते हैं) (कि) रात-दिन मन तरसता है, यदुपति (कृष्ण)
के पास तक (अब) कौन ले जाय ॥२९॥
सुनियत कहुँ द्वारिका बसाई ।
दच्छिन दिशा तीर सागर कैं, कंचन कोट गोमती खाई ।
पंथ न चलै संदेस न आवै, इती दूर नर कोऊ न जाई ।
सत जोजन मथुरा तैं कहियत, यह सुधि एक पथिक पै पाई ।
सब ब्रज दुखी नंद जसुदा हू, इक टक स्याम राम लव लाई ।
सूरदास प्रभु के दरसन बिनु, भई विदित ब्रज काम दुहाई ॥३०॥
अर्थ—सुनती हूँ (कृष्ण ने) कही द्वारिका बसायी है। दक्षिण दिशा में सागर
के किनारे (वहाँ) सोने के किले (तथा), (किलों की सुरक्षा के लिए) गोमती की
नहर (बनी है), वह रास्ता नही चलता (उस तरफ पथिक नही जाते), (वहाँ से)
संदेश (भी) नही आता (तथा) इतनी दूर कोई मनुष्य नही जाता। मथुरा से (वह
नगरी) एक सौ योजन कही जाती है, यह खबर एक पथिक से (हमे) मिली। सब
ब्रज (वासी) (तथा) नंद-यशोदा (भी) दुखी हैं; (वे) एकटक श्याम और बलराम मे
ध्यान लगाये है। सूरदास कहते हैं (कि) प्रभु (कृष्ण) के दर्शन के बिना ब्रज मे
कामदेव की दुहाई विदित हुई (कामदेव के प्रताप का डंका बज गया) ॥३०॥
बीर बटाऊ पाती लीजौ ।
जब तुम जाहु द्वारिका नगरी, हमरे रसाल गुपालहिं दीजौ ।
रंगभूमि रमनीक मधुपुरी, रजधानी ब्रज को सुधि कीजौ ।
छार समुद्र छाँड़ि किन आवत, निर्मल जल जमुना कौ पीजौ ।
या गोकुल की सकल ग्वालिनी, देतिं असीस बहुत जुग जीजौ ।
सूरदास प्रभु हमरे कौतैं, नंद नंदन के पाईं परीजौ ॥३१॥
अर्थ—भाई पथिक ! (यह) पत्रिका लीजिए। जब तुम द्वारिका नगरी जाना
तो (इसे) हमारे रसिक गोपाल को देना। (कहना कि) ब्रज की राजधानी रमणीक
रंगभूमि मथुरा, की खबर (तो) लो। खारे समुद्र को छोड़कर क्यो नही आते; (यहाँ
आकर) यमुना के स्वच्छ जल को पिएं ! इस गोकुल की सभी ग्वालिनियां (तुम्हे)
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