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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 359 में से

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पृष्ठ 307

द्वारिका चरित ३४७
कहिहैं स्याम सत्त इन छाँड्यौ, उतौ राँक ललचायौ ।
तृन की छहैं मिटी निधि मांगत, कौन दुखनि सौं छायौ ।
सागर नहीं समीप कुमति कैं, विधि कह अंत भ्रमायौ ।
चितवत चित्त विचारत मेरौ, मन सपनैं डर छायौ ।
सुरतरु, दासी, दास, अस्व, गज, बिभौ विनोद बनायौ ।
सूरज़ प्रभु नंद-सुवन मित्र व्है, भक्तनि लाड़ लड़ायौ ॥१६॥
अर्थ-(अपनी मड़ैया के स्थान पर सोने का आवास बना देखकर भौचक्का
सुदामा सोचता है।) क्या मैं लौटकर फिर द्वारिका आ गया ! (लगता है) मार्ग की
(स्थिति) मुझे समझ नही पड़ी । न किसी से (मैंने) पूछा, न किसी ने (स्वयमेव)
बताया । (मुझे पुनः आया देख) कृष्ण कहेंगे (कि) इन्होंने सत्य छोड़ दिया, वहाँ (यह)
दरिद्री था, (तभी तो) ललचा गया, (लौट आया) । ऐश्वर्य मांगने पर तृण की छाया
भी मिट गयी (कृष्ण के पास समृद्धि के लालच से गया, लौटा तो फूस का छप्पर भी
गायब) उसे कितनी कठिनाई से मैंने छाया था । (मुझ) कुमति के लिये समीप मे
सागर (भी) नही (कि जाकर डूब मरूँ), अन्त मे विधाता ने मुझे क्यो भरमाया ?
(कहाँ पहुँचा दिया) । (सोने का आवास) देखते हुए चित्त मे सोचता है; मन में स्वप्न
का (सा) डर छा गया ( मैं डरा, कही सपना तो नही देख रहा हूँ ! ) (यहाँ तो) वैभव
का कौतुक बना है- (जहां मड़ैया थी वहाँ अब) कल्पवृक्ष, दासी, घोडे, हाथी (हैं) सूरज़
(कहते हैं) (कि) नन्द के प्रभु (कृष्ण) मित्र होकर (अनुकूल होने पर), (इसी प्रकार)
भक्तों का लाड़ लड़ाया करते है (उन पर प्रेम का प्रदर्शन किया करते है) ॥१६॥
कहा भयौ मेरौ गृह माटी कौ ।
हौं तौ गयौ गुपालहिं भेंटन, और खरच तंदुल गाँठी कौ ।
विनु ग्रीवा कल सुभग न आन्यौ, हुतौ कमंडल दृढ़ काठी कौ ।
घुनौ बाँस जुत बुनौ खटोला, काहु कौ पलँग कनक पाटी कौ ।
नूतन छीरोदक जुवती पै, भूषन हुतौ न लोह माटी कौ ।
सूरदास प्रभु कहा निहोरौ, मानत रंक त्रास टाटी कौ ॥१७॥
अर्थ-मेरे मिट्टी के घर का क्या हुआ ? (वह कहाँ चला गया !) मैं तो गोपाल
से भेट करने गया था और (मैंने) गांठ के (अपने पास के) (चावल) भी खर्च किए
(गवाँ दिए) । विना गले का टूटा घडा (कलसु भगन ?) (मैं) लाया (था) कड़ी
लकड़ी (काठी) का कमंडल (मेरे पास ) था (तथा) घुने हुए बाँस का विना हुआ
खटोला (जहां) था (उसी घर मे अब) सोने की पारी वाला किसी का पलंग (पड़ा)
है । (जिस) युवती (पत्नी) के पास लोहे (अथवा) मिट्टी के आभूषण न थे (उसी के
पास अब) नयी रेशमी वस्त्र है । सूरदास के प्रभु से क्या प्रार्थना करूँ ? (जिस) दरिद्री

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