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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

३४४ सूरसागर सार सटीक
सुदामा चरित
कंत सिधारौ मधुसूदन पै, सुनियत हैं वे मीत तुम्हारे।
बाल-सखा अरु बिपति विभंजन, संकट हरन मुकुंद मुरारे।
और जु अतिसय प्रीति देखियै, निज तन मन की प्रीति बिसारे।
सरबस रीझि देत भक्तनि कौं, रंक नृपति काहूँ न विचारे।
जद्यपि तुम संतोष भजत हौ, दरसन सुख तैं होत जु न्यारे।
सूरदास प्रभु मिले सुदामा, सब सुख दै पुनि अटल न टारे ॥६॥
अर्थ-(सुदामा की स्त्री कहती है) हे पति ! मधुसूदन (कृष्ण) के पास जाओ,
सुनती हूँ वे तुम्हारे मित्र हैं ! (वे तुम्हारे) बाल मित्र हैं; मुकुंद मुरारी विपत्तियों के
भंजक (तथा) संकट हरने वाले है। और जो (जहां) अतिशय प्रेम देखते हैं तो (वहां)
अपने तन-मन की प्रीति (भी) भुला देते है। रीझ कर भक्तों को सर्वस्व देते हैं, (वे)
दरिद्र (और) नृपति किसी का विचार नही करते। यद्यपि तुम संतोष धारण करते
हो, (और) (वहां न जाकर) दर्शन सुख से वंचित होते हो (फिर भी) सूरदास
(कहते है) (कि) प्रभु (कृष्ण) से सुदामा मिलने पर सब सुख देकर (उससे) मिले,
फिर वह सुख अटल (होगा), नही टाला (सदैव प्राप्त हुआ) ॥६॥
सुदामा सोचत पंथ चले।
कैसैं करि मिलिहैं मोहिँ श्रीपति, भए तब सगुन भले।
पहुँचौ जाइ राजद्वारे पर, काहूँ नहिँ अटकायौ।
इत उत चितै धँस्यौ मंदिर मैं, हरि कौ दरसन पायौ।
मन मैं अति आनंद कियौ हरि, बाल-मीत पहिचान।
धाए मिलन नगन पग आतुर, सूरज प्रभु भगवान ॥१०॥
अर्थ-सुदामा रास्ते मे सोचते हुए चले (कि) श्रीपति (कृष्ण) हमसे कैसे
मिलेगे, तब (उस समय) अच्छे सगुन हुये। (सुदामा) राजद्वार पर जा पहुँचा, कही
भी रोक नही हुई। इधर-उधर देखकर मन्दिर (महल) मे प्रविष्ट हुआ। (और) हरि
(कृष्ण) का दर्शन पाया। बचपन के साथी को पहचान कर हरि ने मन मे अत्यधिक
आनंद माना (प्रसन्न हुए)। आतुर होकर नगे पांव (ही) मिलने के लिए सूरज के प्रभु
भगवान् दौड़े ॥१०॥
दूरहिँ तैं देख्यौ वलवीर।
अपने बालसखा जु सुदामा, मलिन बसन अरु छीन सरीर।
पौढ़े हे परजंक परम रुचि, रुकमिनी चाँर डुलावति तीर।
उठि अकुलाइ अगमने लीन्हें, मिलत नैन भरि आए नीर।
निज आसन बैठारि स्याम-घन, पूछी कुसल कह्यौ मति धीर।
ल्याए हौ सु देहु किन हमकौं, कहा दुरावन लागे चोर।