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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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द्वारिका चरित ३४६
नव-निधियां दी, (वे) और भी देते यदि (उनकी) पत्नी (रुक्मिणी) नाराज न
होती ॥१६॥
हरि बिनु कौन दरिद्र हरै ।
कहत सुदामा सुनि सुन्दरि, हरि मिलन न मन बिसरै ।
और मित्र ऐसी गति देखत, को पहिचान करै ।
विपत्ति परैं कुसलात न बूझै, बात नहीं बिचरै ।
उठि भेटे हरि तंदुल लीन्हे, मोहिं न वचन फुरै ।
सूरदास लछि दई कृपा करि, टारी निधि न टरै ॥२०॥
अर्थ—हरि के बिना दरिद्रता कौन दूर करे ? सुदामा कहते हैं (कि) हे सुन्दरी,
सुनो ! हरि का मिलना मन से भूलता नही । (मेरी) जैसी गति देखकर दूसरे मित्र
क्या मुझे पहचानते ? विपत्ति पड़ने पर (कोई) कुशलता (भी) नही पूँछते (तथा)
बातचीत (भी) नही करते । हरि (कृष्ण) ने उठकर भेट (और) चावल ले लिया
मुझसे (तो) वचन तक स्फुरित नही हुआ (मैं तो बोल भी न पाया) । सूरदास
(कहते हैं) (कि) (कृष्ण ने) कृपा करके (इतनी) लक्ष्मी (सम्पत्ति) दी, कि (वह)
निधि टाले नही टलती (खर्च करने पर भी समाप्त नही होती) ॥२०॥
व्रजनारी पथिक संवाद
तब तैं बहुरि न कोऊ आयौ ।
वहै जु एक बेर ऊधौ सौं, कछु संदेसौ पायौ ।
छिन-छिन सुरति करत जदुपति की, परत न मन समुझायौ ।
गोकुलनाथ हमारैं हित लगि, लिखि हूँ क्यौं न पठायौ ।
यहै विचार करौं धौं सजनी, इती गहरु क्यौं लायौ ।
सूर स्याम अब वेगि न मिलहू, मेघनि अम्बर छायौ ॥२१॥
अर्थ—(जब से कृष्ण गए) तब से (वहां से) लौटकर कोई नही आया । वहीं
एक बार ऊधो से (हमने) कुछ संदेश पाया था । हर क्षण यदुपति (कृष्ण) की स्मृति
करती हूँ; मन समझाते नही बनता । गोकुलपति (कृष्ण) ने हमारे हित के लिए
लिखकर भी (पत्र) नही भेजा । हे सखी ! यही विचार करती (रहती) हूँ (कि)
इतना विलंब क्यों किया । सूर के स्याम (कृष्ण) अब शीघ्र (ही) (क्यों) नही मिलते,
(अब तो) आकाश मे बादल छा गये हैं ॥२१॥
बहुरौ हो ब्रज बात न चाली ।
वहै सु एक बेर ऊधौ कर, कमल नयन पाती दै घाली ।
पथिक तिहारे पा लागति हौं, मथुरा जाहु जहाँ बनमाली ।
कहियौ प्रगट पुकारि द्वार ह्वै, कालिंदी फिरि आयौ काली ।
तब वह कृपा हुती नंदनंदन, रुचि रुचि रसिक प्रीति प्रतिपाली ।
माँगत कुसुम देखि ऊँचे द्रुम, लेत उछंग गोद करि आली ।