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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 316

३५६ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—ब्रजवासियो के स्नेह को हृदय मे रखकर मुरारी ने सभा के मध्य बैठकर
सभी यादवों से कहा (कि) सूर्य-ग्रहण का बड़ा पर्व (है), उसकी बड़ाई मैं कहां तक
करूँ । सब लोग कुरुक्षेत्र चलो, वहां मिलकर नहाया जाय । हरि जी, पिता-माता,
अपनी पत्नी (तथा) सब (लोगो) के साथ (चले), घोडे सजाकर नगर के लोग (भी)
चल पडे । कुरुक्षेत्र आकर (कृष्ण ने) एक दूत भेज दिया । (सूरदास कहते हैं उन्होने)
नंद-यशोदा, गोपी, ग्वालो (तथा) सभी को बुला भेजा ॥३६॥
हौँ इहाँ तेरेहि कारन आयौ ।
तेरी सौं सुनि जननि जसोदा, मोहिँ गोपाल पठायौ ।
कहा भयौ जो लोग कहत हैं, देवकि माता जायौ ।
खान-पान परिधान सबै सुख, तैँ ही लाड़ लड़ायौ ।
इतौ हमारो राज द्वारिका, मोँ जी कछू न भायो ।
जब-जब सुरति होति उहिँ हितकी, विछुरि बच्छ ज्यौँ धायौ ।
अब हरि कुरुच्छेत्र मैँ आए, सो मैँ तुम्हें सुनायौ ।
सब कुल सहित नंद सूरज प्रभु, हित करि उहाँ बुलायौ ॥३७॥
अर्थ—(पथिक ने कहा कि) मैं यहां तेरे ही कारण आया हूँ; हे माता यशोदा
सुनो ! तुम्हारी सौगन्ध, मुझे गोपाल ने (ही) भेजा है। (हरि ने यह कहा है) क्या
हुआ, जो लोग कहते हैं (कि) देवकी माता ने (मुझे) पैदा किया ? खान, पान, वस्त्र
(आदि) सभी सुखो को देकर तूने ही (मेरा) लालन-पालन किया । यहां द्वारिका मे
हमारा राज (है), (लेकिन) (वह) मेरे जी (को) कुछ भी अच्छा नही लगता । जब-
जब (तुम्हारे) उस स्नेह की याद आती है, (गाय से) बिछुड़े हुए बछड़े की तरह (मैं)
(तुम्हारे पास) दौड़ पड़ता हूँ । (पथिक ने यह भी कहा) अब हरि कुरुक्षेत्र आ गये हैं
वह (समाचार) मैंने तुम्हें .सुनाया । सूरज के प्रभु ने स्नेहपूर्वक समस्त कुल सहित
नन्द को वहाँ बुलाया है ॥३७॥
वायस गहगहात सुनि सुंदरि, बानी विमल पूर्व दिस बोली ।
आजु मिलावा होइ स्याम कौ, तू सुनि सखी राधिका भोली ।
कुच भुज नैन अधर फरकत् हैं, बिनहिँ बात अंचल ध्वज डोली ।
सोच निवारि करौ मन आनँद, मानौ भाग दसा बिधि खोली ।
सुनत बात सजनी के मुख की, पुलकित प्रेम तरकि गई चोली ।
सूरदास अभिलाष नंदसुत, हरषी सुभग नारि अनमोली ॥३८॥
अर्थ—हे सुन्दरी ! सुनो, कौआ प्रफुल्लित हो रहा है; (उसकी) विमल वाणी पूर्व
दिशा मे सुनाई पड़ी । हे भोली राधिका ! तू सुन, आज श्याम से तेरा मिलन होगा ।
कुच, भुजा, नेत्र, ओंठ फड़क रहे हैं; (तथा) हवा के (ही) ध्वज (के समान) अंचल
हिल रहा है । (अब) चिन्ता छोडकर मन मे आनंद करो, मानो ब्रह्मा ने (तेरी) भाग्य-
दशा खोल दी (तेरा भाग्योदय हो गया) । सखी के मुख की बात सुनते ही (राधा) प्रेम