सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 301

द्वारिका चरित ३४१
रखवारी कौं बहुत महाभट, दीन्हे रुक्म पठाई।
ते सब सावधान भए चहुँ दिसि, पंछी तहाँ न जाई।
कुंवरि पूजि गौरी बिनती करी, वर देउ जादवराई।
मैं पूजा कीन्ही इहिं कारन, गौरी सुनि मुसकाई।
पाइ प्रसाद अंबिका-मंदिर, रुकमिनी बाहर आई।
सुभट देखि सुन्दरता मोहे, धरनि गिरे मुरझाई।
इहिं अंतर जादोपति आए, रुकमिनी रथ बैठाई।
सूरज प्रभु पहुँचे दल अपनैं, तब सुभटनि सुधि पाई॥६॥
अर्थ—रुक्मिणी देवी मन्दिर में आईं। धूप, दीप तथा पूजा की समस्त सामग्री
सखियाँ साथ ले आईं। रुक्म ने रखवाली के लिए बहुत से बड़े वीरो को भेज दिया।
वे सभी वहाँ सावधान हो गये, वहाँ पक्षी भी नही जा पाता था। कुँवरि ने पूजा करके
पार्वती से (यह) विनती की कि (मुझे) कृष्ण को वर के रूप में दे। मैंने इसीलिए
पूजा की (है)। (यह) सुनकर गौरी मुस्करायी ! अंबिका के मन्दिर में प्रसाद (वरदान)
पाकर रुक्मिणी बाहर आईं। (वहाँ के) सुभट (उसकी) सुन्दरता देखकर मोहित हो गए
(और) पृथ्वी पर मूर्छित होकर गिर पड़े। इसी बीच कृष्ण (वहाँ) गए तथा (उन्होंने)
रुक्मिणी को रथ पर बिठा लिया। सूरज के प्रभु (कृष्ण) अपनी सेना मे (जब) पहुँच
गये तब (रुक्म द्वारा तैनात) सुभटों ने खबर पायी (कि रुक्मिणी हरण हो गया) ॥६॥
आवहु री मिलि मंगल गावहु।
हरि रुकमिनी लिए आवत हैं, यह आनंद जदुकुलहिं सुनावहु।
बाँधहु बन्दनवार मनोहर, कनक कलस भरि नीर धरावहु।
दधि अच्छत फल फूल परम रुचि, आँगन चंदन चौक पुरावहु।
कदली जूथ अनूप किसल दल, सुरँग सुमन लै मंडल छावहु।
हरद दूब केसर मग छिरकहु, भेरी मृदँग निसान बजावहु।
जरासंध सिसुपाल नृपति तैं, जीते हैं उठि अरघ चढ़ावहु।
बल समेत तन कुसल सूर प्रभु, आए हैं आरती बनावहु ॥७॥
अर्थ—(हे सखियो !) आओ, (सब) मिलकर मंगल (गीत) गाओ। हरि
रुक्मिणी को लेकर आ रहे हैं। यह आनंद यदुकुल को सुनाओ। मनोहर वंदनवार
बांधो (तथा) सोने के कलश (घड़े) मे जल भर कर रखवाओ। दही, अक्षत, परम
रुचिकर फल, फूलों के द्वारा आंगन मे चौक पुरवाओ। केले के समूहो, अनुपम किशलय
दलो (तथा) सुन्दर रंग के फूलो मे मंडप छावाओ। रास्ते मे हल्दी दूब (तथा) केसर
छिड़को; नगाड़ो (भेरी), मृदंग तथा ढोल (निशान) बजाओ। जरासंध शिशुपाल नृप
से (कृष्ण) जीत गये हैं। उठकर अर्घ्य (पूजन सामग्री) चढ़ाओ। बलराम सहित सूर
के प्रभु (कृष्ण) शरीर से कुशलता-पूर्वक आये है। (उनकी) आरती सजाओ ॥७॥