सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वारका चरित ३५५
जद्यपि सुख निधान द्वारावति, गोकुल कें सम नाहीं ।
सूरदास घनस्याम मनोहर, सुमिरि-सुमिरि पछिताहीं ॥३४॥
अर्थ-हे रुक्मिणी ! मुझे ब्रज भूलता नही। वह क्रीडा, यमुना तट की वह
केलि, (तथा) सघन कदंब (के नीचे) की (वह) छाया (हम कैसे भूल जायें)। गोप-
बन्धुओं की भुजाएँ कंधो पर रखकर कुंजों (के बीच) विहार करना-और विनोद
कहां तक वर्णित करूँ, वर्णन करने पर (भो) वर्णित नही हो पाते। यद्यपि द्वारिका
सुख का निधान (है), (फिर भी) गोकुल के समान नही (है)। सूरदास (कहते हैं
कि) मनोहर घनश्याम (उन्हें) स्मरण कर करके पछताते हैं ॥३४॥
रुकमिनि चलौ जन्म भूमि जाहिँ ।
जद्यपि तुम्ह्रौ विभव द्वारिका, मथुरा कैँ सम नाहिँ ।
जमुना कैँ तट गाइ चरावत, अमृत जल अँचवाहिँ ।
कुंज केलि अरु भुजा कंध धरि, सीतल द्रुम की छाँहिँ ।
सरस सुगंध मंद मलयानल, बिहरत कुंजन माहिँ ।
जो क्रीड़ा श्री बृन्दावन मैँ, तिहूँ लोक मैँ नाहिँ ।
सुरभी ग्वाल नंद अरु जसुमति, मम चित तैँ न टराहिँ ।
सूरदास प्रभु चतुर सिरोमनि, तिनकी सेव कराहिँ ॥३५॥
अर्थ-हे रुक्मिणी ! चलो, (हम) जन्म-भूमि चलें। यद्यपि द्वारिका में तुम्हारा
वैभव (है), (फिर भी) (वह) मथुरा की समता का नहीं (है)। (मथुरा में तो हम)
यमुना के तट पर गाय चराते थे (तथा) (यमुना के) अमृत (जैसे) जल का आचमन
(पान) करते थे। (वहाँ हम) कुंजो मे केलि (करते थे), (अपनी) भुजाओ को
(गोपियो के) कंधो पर रखकर वृक्षों की शीतल छाया मे (बिहार करते थे)। उत्तम
सुगन्ध-युक्त मंद मलयानल मे कुजो मे घूमते थे। जो क्रीड़ाएं वृन्दावन मे (की), (वे)
तीनो लोक मे (प्राप्त) नही (है)। गाये, ग्वाल, नद और यशोदा मेरे चित्त से नही
टलते; सूरदास के प्रभु चतुर शिरोमणि (हैं) उन (सब) की सेवा किया करते हैं ॥३५॥
कुरुक्षेत्र में कृष्ण-ब्रजवासी भेंट
ब्रज बासिनि कौ हेतु, हृदय मैँ राखि मुरारी ।
सब जादव सौँ कह्यौ, बैठि कै सभा मझारी ।
बड़ी परब रवि-ग्रहन, कहा कहौँ तासु बड़ाई ।
चलौ सकल कुरुखेत, तहाँ मिलि न्हैयें जाई ।
तात, मात, निज नारि लिए, हरि जू सब संगा ।
चले नगर के लोग, साजि रथ तरल तुरंगा ।
कुरुच्छेत्र मैँ आइ, दियौ इक दूत पठाई ।
नद जसोमति गोप ग्वाल, सब सूर बुलाई ॥३६॥