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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

श्लोक, मंगलाचरण, समुद्र-लंघन, सुरसा-सिंहिका एवं लंका-प्रवेश (दोहा १-८)

॥ सत्यं शिवं सुन्दरम् ॥ 1349
श्रीरामचरितमानस
सुन्दरकाण्ड
सचित्र, सटीक, मोटा टाइप
गीताप्रेस गोरखपुर
GITA PRESS, GORAKHPUR
गीताप्रेस, गोरखपुर

॥ सत्यं शिवं सुन्दरम् ॥ 1349
श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजीविरचित
श्रीरामचरितमानस
सुन्दरकाण्ड, सचित्र, सटीक
श्रीहनुमानचालीसासहित, मोटा टाइप
रामदरबार
गीताप्रेस, गोरखपुर

॥ श्रीहरिः ॥
निवेदन
श्रीरामचरितमानस एक प्रासादिक ग्रन्थ है। इस पवित्र ग्रन्थके पठन-
पाठन और मननसे मनुष्यका सहज ही कल्याण होता है। इसका प्रत्येक
दोहा, चौपाई, सोरठा तथा छन्द महामन्त्र है। सुन्दरकाण्डके संदर्भमें तो
कहना ही क्या है? यद्यपि सम्पूर्ण श्रीरामचरितमानस ही मनोहर है, किन्तु
इसका सुन्दरकाण्ड अत्यन्त ही मनोहर है। जिस प्रकार महाभारतका
विराटपर्व सर्वश्रेष्ठ अंश है, उसी प्रकार श्रीरामचरितमानसमें सुन्दरकाण्ड
सर्वश्रेष्ठ अंश है। इसके श्रेष्ठताका कारण बताते हुए कहा गया है—'सुन्दरे
सुन्दरो रामः सुन्दरे सुन्दरी कथा। सुन्दरे सुन्दरी सीता सुन्दरे किन्न सुन्दरम्॥'
अर्थात् सुन्दरकाण्डमें श्रीराम सुन्दर हैं, कथा सुन्दर है, सीता सुन्दर हैं।
सुन्दरमें क्या सुन्दर नहीं है। इसके अतिरिक्त इसमें हनुमान्जीका पावन-
चरित्र है जो भक्तोंके लिये कल्पवृक्ष है।
एक बात निर्विवाद है कि सुन्दरकाण्डका श्रद्धालुजन अनुष्ठान करते
हैं, जिससे उनकी प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होती है। दूसरी बात सुन्दरकाण्डकी
कथा, पात्रोंके स्वभाव और आचरण आदिमें आध्यात्मिकता तथा
रहस्यात्मकताका मणिकाञ्चन-संयोग दिखायी पड़ता है।
सुन्दरकाण्डकी अनन्त विशेषताओंसे पाठकोंको परिचित करानेके
उद्देश्यसे गीताप्रेससे इसके कई संस्करण प्रकाशित किये गये हैं। इस संस्करणमें
पाठकोंको अनुष्ठानके रूपमें शुद्ध पाठ करनेकी सुविधा प्रदान करनेकी दृष्टिसे
प्रारम्भमें श्रीजानकीनाथजीकी आरती और पारायण-विधि दी गयी है, जिससे
पाठक आवाहन, न्यास तथा ध्यानके साथ शुद्ध पाठ कर सकें।
भक्तोंकी मान्यता है कि सुन्दरकाण्डके पाठकका प्रारम्भ किष्किन्धा-
काण्डके दोहा संख्या-२९ से करना चाहिये। अतः सुन्दरकाण्डके पूर्व
किष्किन्धाकाण्डका दोहा संख्या-२९ दिया गया है। अर्थसहित पाठ करनेकी
विशेष महत्ता बतायी गयी है, इसलिये इसमें मूल पाठके साथ अर्थसहित
सुन्दरकाण्ड और अन्तमें हनुमानचालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक, रामायणजीकी
आरती, हनुमान्जीकी आरती एवं श्रीरामस्तुति दी गयी है। इस संस्करणका
टाइप भी मोटा रखा गया है, जिससे वयोवृद्ध पाठकोंको भी पाठ करनेमें
सुविधा हो। आशा है, पाठकगण इसे अधिक-से-अधिक संख्यामें अपनाकर
हमारा उत्साहवर्धन करेंगे।
—प्रकाशक

भगवान् श्रीजानकीनाथजीकी आरती
ॐ जय जानकिनाथा, हो प्रभु जय श्री रघुनाथा।
दोऊ कर जोड़े विनवौं, प्रभु मेरी सुनो बाता॥ ॐ॥
तुम रघुनाथ हमारे, प्राण पिता माता।
तुम हो सजन सँगाती, भक्ति मुक्ति दाता॥ ॐ॥
चौरासी प्रभु फन्द छुड़ावो, मेटो यम त्रासा।
निश दिन प्रभु मोहि राखो, अपने संग साथा॥ ॐ॥
सीताराम लक्ष्मण भरत शत्रुहन, संग चारों भैया।
जगमग ज्योति विराजत, शोभा अति लहिया॥ ॐ॥
हनुमत नाद बजावत, नेवर ठुमकाता।
कंचन थाल आरती, करत कौशल्या माता॥ ॐ॥
किरिट मुकुट कर धनुष विराजत, शोभा अति भारी।
मनीराम दरशन कर, तुलसिदास दरशन कर, पल-पल बलिहारी॥ ॐ ॥
जय जानकिनाथा, हो प्रभु जय श्री रघुनाथा।
हो प्रभु जय सीता माता, हो प्रभु जय लक्ष्मण भ्राता॥ ॐ॥
हो प्रभु जय चारों भ्राता, हो प्रभु जय हनुमत दासा।
दोऊ कर जोड़े विनवौं, प्रभु मेरी सुनो बाता॥ ॐ॥

॥ श्रीहरिः ॥
पारायण-विधि
विधिपूर्वक पाठ करनेवाले महानुभावोंको पाठारम्भके पूर्व श्रीतुलसीदासजी,
श्रीवाल्मीकिजी, श्रीशिवजी तथा श्रीहनुमान्जीका आवाहन-पूजन करनेके
पश्चात् तीनों भाइयोंसहित श्रीसीतारामजीका आवाहन, षोडशोपचार-पूजन
और ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर पाठका आरम्भ करना चाहिये। सबके
आवाहन, पूजन और ध्यानके मन्त्र क्रमशः नीचे लिखे जाते हैं—
अथ आवाहनमन्त्रः
तुलसीक नमस्तुभ्यमिहागच्छ शुचिव्रत।
नैर्ऋत्य उपविश्येदं पूजनं प्रतिगृह्यताम्॥ १ ॥
ॐ तुलसीदासाय नमः।
श्रीवाल्मीक नमस्तुभ्यमिहागच्छ शुभप्रद।
उत्तरपूर्वयोर्मध्ये तिष्ठ गृह्णीष्व मेऽर्चनम्॥ २ ॥
ॐ वाल्मीकाय नमः।
गौरीपते नमस्तुभ्यमिहागच्छ महेश्वर।
पूर्वदक्षिणयोर्मध्ये तिष्ठ पूजां गृहाण मे॥ ३ ॥
ॐ गौरीपतये नमः।
श्रीलक्ष्मण नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः।
याम्यभागे समातिष्ठ पूजनं संगृहाण मे॥ ४ ॥
ॐ श्रीसपत्नीकाय लक्ष्मणाय नमः।
श्रीशत्रुघ्न नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः।
पीठस्य पश्चिमे भागे पूजनं स्वीकुरुष्व मे॥ ५ ॥
ॐ श्रीसपत्नीकाय शत्रुघ्नाय नमः।
श्रीभरत नमस्तुभ्यमिहागच्छ सहप्रियः।
पीठकस्योत्तरे भागे तिष्ठ पूजां गृहाण मे॥ ६ ॥
ॐ श्रीसपत्नीकाय भरताय नमः।
श्रीहनुमन्नमस्तुभ्यमिहागच्छ कृपानिधे।
पूर्वभागे समातिष्ठ पूजनं स्वीकुरु प्रभो॥ ७ ॥

[ ६ ]
ॐ हनुमते नमः।
अथ प्रधानपूजा च कर्तव्या विधिपूर्वकम्।
पुष्पाञ्जलिं गृहीत्वा तु ध्यानं कुर्यात्परस्य च॥ ८ ॥
रक्ताम्भोजदलाभिरामनयनं पीताम्बरालङ्कृतं
श्यामाङ्गं द्विभुजं प्रसन्नवदनं श्रीसीतया शोभितम्।
कारुण्यामृतसागरं प्रियगणैर्भ्रात्रादिभिर्भावितं
वन्दे विष्णुशिवादिसेव्यमनिशं भक्तेष्टसिद्धिप्रदम्॥ ९ ॥
आगच्छ जानकीनाथ जानक्या सह राघव।
गृहाण मम पूजां च वायुपुत्रादिभिर्युतः॥१०॥
इत्यावाहनम्
सुवर्णरचितं राम दिव्यास्तरणशोभितम्।
आसनं हि मया दत्तं गृहाण मणिविचित्रितम्॥११॥
इति षोडशोपचारैः पूजयेत्
ॐ अस्य श्रीमन्मानसरामायणश्रीरामचरितस्य
श्रीशिवकाकभुशुण्डियाज्ञवल्क्यगोस्वामितुलसीदासा
ऋषयः श्रीसीतारामो देवता श्रीरामनाम बीजं भवरोगहरी
भक्तिः शक्तिः मम नियन्त्रिताशेषविघ्नतया श्रीसीताराम-
प्रीतिपूर्वकसकलमनोरथसिद्धयर्थं पाठे विनियोगः।
अथ आचमनम्
श्रीसीतारामभ्यां नमः। श्रीरामचन्द्राय नमः।
श्रीरामभद्राय नमः।
इति मन्त्रत्रितयेन आचमनं कुर्यात्।
श्रीयुगलबीजमन्त्रेण प्राणायामं कुर्यात्॥
अथ करन्यासः
जग मंगल गुनग्राम राम के।
दानि मुकुति धन धरम धाम के॥
अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
राम राम कहि जे जमुहाहीं।
तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥

[ ७ ]
तर्जनीभ्यां नमः।
राम सकल नामन्ह ते अधिका।
होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥
मध्यमाभ्यां नमः।
उमा दारु जोषित की नाईं।
सबहि नचावत रामु गोसाईं॥
अनामिकाभ्यां नमः।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
मामभिरक्षय रघुकुल नायक।
धृत बर चाप रुचिर कर सायक॥
करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
इति करन्यासः
अथ हृदयादिन्यासः
जग मंगल गुनग्राम राम के।
दानि मुकुति धन धरम धाम के॥
हृदयाय नमः।
राम राम कहि जे जमुहाहीं।
तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥
शिरसे स्वाहा।
राम सकल नामन्ह ते अधिका।
होउ नाथ अघ खग गन बधिका॥
शिखायै वषट्।
उमा दारु जोषित की नाईं।
सबहि नचावत रामु गोसाईं॥
कवचाय हुम्।

[ ८ ]
सन्मुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
नेत्राभ्यां वौषट्।
मामभिरक्षय रघुकुल नायक।
धृत बर चाप रुचिर कर सायक॥
अस्त्राय फट्।
इति हृदयादिन्यासः
अथ ध्यानम्
मामवलोकय पंकज लोचन।
कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन॥
नील तामरस स्याम काम अरि।
हृदय कंज मकरंद मधुप हरि॥
जातुधान बरूथ बल भंजन।
मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन॥
भूसुर ससि नव बृंद बलाहक।
असरन सरन दीन जन गाहक॥
भुज बल बिपुल भार महि खंडित।
खर दूषन बिराध बध पंडित॥
रावनारि सुखरूप भूपबर।
जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर॥
सुजस पुरान बिदित निगमागम।
गावत सुर मुनि संत समागम॥
कारुनीक ब्यलीक मद खंडन।
सब बिधि कुसल कोसला मंडन॥
कलि मल मथन नाम ममताहन।
तुलसिदास प्रभु पाहि प्रनत जन॥
इति ध्यानम्

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥
किष्किन्धाकाण्ड
(दोहा २९)
बलि बाँधत प्रभु बाढ़ेउ सो तनु बरनि न जाइ।
उभय घरी महँ दीन्हीं सात प्रदच्छिन धाइ॥
अंगद कहइ जाउँ मैं पारा।
जियँ संसय कछु फिरती बारा॥
जामवंत कह तुम्ह सब लायक।
पठइअ किमि सब ही कर नायक॥१॥
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना।
का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना।
बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥२॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा।
सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥३॥
कनक बरन तन तेज बिराजा।
मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा॥
सिंहनाद करि बारहिं बारा।
लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा॥४॥

[ १० ]
सहित सहाय रावनहि मारी।
आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी॥
जामवंत मैं पूँछउँ तोही।
उचित सिखावनु दीजहु मोही॥ ५ ॥
इतना करहु तात तुम्ह जाई।
सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥
तब निज भुज बल राजिवनैना।
कौतुक लागि संग कपि सेना॥ ६ ॥
[ छन्द ]
कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं।
त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं॥
जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई।
रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥
[ दोहा ३० (क) ]
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥
[ सोरठा ३० (ख) ]
नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।
सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक॥

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीरामचरितमानस
पञ्चम सोपान
सुन्दरकाण्ड
श्लोक
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥ १ ॥
शान्त, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणोंसे परे), निष्पाप, मोक्षरूप
परमशान्ति देनेवाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजीसे निरन्तर सेवित,
वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य, सर्वव्यापक, देवताओंमें सबसे बड़े,
मायासे मनुष्यरूपमें दीखनेवाले, समस्त पापोंको हरनेवाले,
करुणाकी खान, रघुकुलमें श्रेष्ठ तथा राजाओंके शिरोमणि, राम
कहलानेवाले जगदीश्वरकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ १ ॥
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥ २ ॥
हे रघुनाथजी! मैं सत्य कहता हूँ और फिर आप सबके

१२ * श्रीरामचरितमानस *
अन्तरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदयमें दूसरी कोई
इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति
दीजिये और मेरे मनको काम आदि दोषोंसे रहित कीजिये॥ २॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ ३॥
अतुल बलके धाम, सोनेके पर्वत (सुमेरु)-के समान
कान्तियुक्त शरीरवाले, दैत्यरूपी वन [-को ध्वंस करने]-के
लिये अग्निरूप, ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणोंके निधान,
वानरोंके स्वामी, श्रीरघुनाथजीके प्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमान्‌जीको
मैं प्रणाम करता हूँ॥ ३॥
जामवंत के बचन सुहाए।
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई।
सहि दुख कंद मूल फल खाई॥ १॥
जाम्बवान्‌के सुन्दर वचन सुनकर हनुमान्‌जीके हृदयको बहुत
ही भाये। [वे बोले—] हे भाई! तुमलोग दुःख सहकर, कन्द-
मूल-फल खाकर तबतक मेरी राह देखना॥ १॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥ २॥

  • सुन्दरकाण्ड * १३
    जबतक मैं सीताजीको देखकर [लौट] न आऊँ। काम
    अवश्य होगा, क्योंकि मुझे बहुत ही हर्ष हो रहा है। यह कहकर
    और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदयमें श्रीरघुनाथजीको धारण
    करके हनुमान्‌जी हर्षित होकर चले॥ २॥
    सिंधु तीर एक भूधर सुंदर।
    कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
    बार बार रघुबीर सँभारी।
    तरकेउ पवनतनय बल भारी॥ ३॥
    समुद्रके तीरपर एक सुन्दर पर्वत था। हनुमान्‌जी खेलसे ही
    (अनायास ही) कूदकर उसके ऊपर जा चढ़े और बार-बार
    श्रीरघुवीरका स्मरण करके अत्यन्त बलवान् हनुमान्‌जी उसपरसे
    बड़े वेगसे उछले॥ ३॥
    जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता।
    चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
    जिमि अमोघ रघुपति कर बाना।
    एही भाँति चलेउ हनुमाना॥ ४॥
    जिस पर्वतपर हनुमान्‌जी पैर रखकर चले (जिसपरसे वे
    उछले), वह तुरंत ही पातालमें धँस गया। जैसे श्रीरघुनाथजीका
    अमोघ बाण चलता है, उसी तरह हनुमान्‌जी चले॥ ४॥
    जलनिधि रघुपति दूत बिचारी।
    तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥ ५॥
    समुद्रने उन्हें श्रीरघुनाथजीका दूत समझकर मैनाक पर्वतसे
    कहा कि हे मैनाक! तू इनकी थकावट दूर करनेवाला हो
    (अर्थात् अपने ऊपर इन्हें विश्राम दे)॥ ५॥

१४ * श्रीरामचरितमानस *
[दोहा १]
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥
हनुमान्‌जीने उसे हाथसे छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा—
भाई! श्रीरामचन्द्रजीका काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ? ॥ १ ॥
जात पवनसुत देवन्ह देखा।
जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता।
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥ १ ॥
देवताओंने पवनपुत्र हनुमान्‌जीको जाते हुए देखा। उनकी
विशेष बल-बुद्धिको जाननेके लिये (परीक्षार्थ) उन्होंने सुरसा
नामक सर्पोंकी माताको भेजा, उसने आकर हनुमान्‌जीसे यह
बात कही—॥ १ ॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा।
सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं।
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥ २ ॥
आज देवताओंने मुझे भोजन दिया है। यह वचन सुनकर
पवनकुमार हनुमान्‌जीने कहा—श्रीरामजीका कार्य करके मैं लौट
आऊँ और सीताजीकी खबर प्रभुको सुना दूँ, ॥ २ ॥
तब तव बदन पैठिहउँ आई।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना।
ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥ ३ ॥

  • सुन्दरकाण्ड * १५
    तब मैं आकर तुम्हारे मुँहमें घुस जाऊँगा [तुम मुझे खा
    लेना]। हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे। जब
    किसी भी उपायसे उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमान्जीने
    कहा—तो फिर मुझे खा न ले॥ ३॥
    जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा।
    कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
    सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ।
    तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥ ४॥
    उसने योजनभर (चार कोसमें) मुँह फैलाया। तब हनुमान्जीने
    अपने शरीरको उससे दूना बढ़ा लिया। उसने सोलह योजनका
    मुख किया। हनुमान्जी तुरंत ही बत्तीस योजनके हो गये॥ ४॥
    जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।
    तासु दून कपि रूप देखावा॥
    सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।
    अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥ ५॥
    जैसे-जैसे सुरसा मुखका विस्तार बढ़ाती थी, हनुमान्जी
    उसका दूना रूप दिखलाते थे। उसने सौ योजन (चार सौ
    कोसका) मुख किया। तब हनुमान्जीने बहुत ही छोटा रूप
    धारण कर लिया॥ ५॥
    बदन पइठि पुनि बाहेर आवा।
    मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
    मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा।
    बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥ ६॥

१६ * श्रीरामचरितमानस *
और वे उसके मुखमें घुसकर [तुरंत] फिर बाहर निकल
आये और उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे। [उसने कहा—]
मैंने तुम्हारे बुद्धि-बलका भेद पा लिया, जिसके लिये देवताओंने
मुझे भेजा था॥६॥
[दोहा २]
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥
तुम श्रीरामचन्द्रजीका सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल-
बुद्धिके भण्डार हो। यह आशीर्वाद देकर वह चली गयी, तब
हनुमान्‌जी हर्षित होकर चले॥२॥
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई।
करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं।
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥ १॥
समुद्रमें एक राक्षसी रहती थी। वह माया करके आकाशमें
उड़ते हुए पक्षियोंको पकड़ लेती थी। आकाशमें जो जीव-जन्तु
उड़ा करते थे, वह जलमें उनकी परछाईं देखकर, ॥१॥
गहइ छाँहँ सक सो न उड़ाई।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा।
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥ २॥
उस परछाईंको पकड़ लेती थी, जिससे वे उड़ नहीं सकते
थे [और जलमें गिर पड़ते थे]। इस प्रकार वह सदा आकाशमें
उड़नेवाले जीवोंको खाया करती थी। उसने वही छल हनुमान्‌जीसे

  • सुन्दरकाण्ड * १७
    भी किया। हनुमान्‌जीने तुरंत ही उसका कपट पहचान लिया॥ २॥
    ताहि मारि मारुतसुत बीरा।
    बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
    तहाँ जाइ देखी बन सोभा।
    गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥ ३॥
    पवनपुत्र धीरबुद्धि वीर श्रीहनुमान्‌जी उसको मारकर समुद्रके
    पार गये। वहाँ जाकर उन्होंने वनकी शोभा देखी। मधु
    (पुष्परस)-के लोभसे भौंरे गुञ्जार कर रहे थे॥ ३॥
    नाना तरु फल फूल सुहाए।
    खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
    सैल बिसाल देखि एक आगें।
    ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥ ४॥
    अनेकों प्रकारके वृक्ष फल-फूलसे शोभित हैं। पक्षी और
    पशुओंके समूहको देखकर तो वे मनमें [बहुत ही] प्रसन्न हुए।
    सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमान्‌जी भय त्यागकर उसपर
    दौड़कर जा चढ़े॥ ४॥
    उमा न कछु कपि कै अधिकाई।
    प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
    गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी।
    कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥ ५॥
    [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! इसमें वानर हनुमान्‌की कुछ
    बड़ाई नहीं है। यह प्रभुका प्रताप है, जो कालको भी खा जाता
    है। पर्वतपर चढ़कर उन्होंने लङ्का देखी। बहुत ही बड़ा किला
    है, कुछ कहा नहीं जाता॥ ५॥

१८ * श्रीरामचरितमानस *
अति उतंग जलनिधि चहु पासा।
कनक कोट कर परम प्रकासा॥ ६ ॥
वह अत्यन्त ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्र है। सोनेके
परकोटे (चहारदीवारी)-का परम प्रकाश हो रहा है॥ ६॥
[छन्द १]
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥
विचित्र मणियोंसे जड़ा हुआ सोनेका परकोटा है, उसके
अंदर बहुत-से सुन्दर-सुन्दर घर हैं। चौराहे, बाजार, सुन्दर मार्ग
और गलियाँ हैं; सुन्दर नगर बहुत प्रकारसे सजा हुआ है। हाथी,
घोड़े, खच्चरोंके समूह तथा पैदल और रथोंके समूहोंको कौन
गिन सकता है ? अनेक रूपोंके राक्षसोंके दल हैं, उनकी अत्यन्त
बलवती सेना वर्णन करते नहीं बनती॥ १॥
[छन्द २]
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहूँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥
वन, बाग, उपवन (बगीचे), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और
बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओं और गन्धर्वोंकी
कन्याएँ अपने सौन्दर्यसे मुनियोंके भी मनोंको मोहे लेती हैं।
कहीं पर्वतके समान विशाल शरीरवाले बड़े ही बलवान् मल्ल
(पहलवान) गरज रहे हैं। वे अनेकों अखाड़ोंमें बहुत प्रकारसे
भिड़ते और एक-दूसरेको ललकारते हैं॥ २॥

  • सुन्दरकाण्ड * १९
    [छन्द ३]
    करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
    कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
    एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
    रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥
    भयंकर शरीरवाले करोड़ों योद्धा यत्न करके (बड़ी सावधानीसे)
    नगरकी चारों दिशाओंमें (सब ओरसे) रखवाली करते हैं। कहीं
    दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरोंको खा रहे
    हैं। तुलसीदासने इनकी कथा इसीलिये कुछ थोड़ी-सी कही है
    कि ये निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीके बाणरूपी तीर्थमें शरीरोंको
    त्यागकर परमगति पावेंगे॥ ३॥
    [दोहा ३]
    पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
    अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥
    नगरके बहुसंख्यक रखवालोंको देखकर हनुमान्‌जीने मनमें
    विचार किया कि अत्यन्त छोटा रूप धरूँ और रातके समय
    नगरमें प्रवेश करूँ॥ ३॥
    मसक समान रूप कपि धरी।
    लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
    नाम लंकिनी एक निसिचरी।
    सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥ १॥
    हनुमान्‌जी मच्छरके समान (छोटा-सा) रूप धारण कर
    नररूपसे लीला करनेवाले भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके
    लङ्काको चले। [लङ्काके द्वारपर] लङ्किनी नामकी एक राक्षसी
    रहती थी। वह बोली—मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे)

२० * श्रीरामचरितमानस *
कहाँ चला जा रहा है?॥ १॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा।
मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी।
रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥ २॥
हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना? जहाँतक (जितने) चोर हैं,
वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमान्‌जीने उसे एक घूँसा मारा,
जिससे वह खूनकी उलटी करती हुई पृथ्वीपर लुढ़क पड़ी॥ २॥
पुनि संभारि उठी सो लंका।
जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा।
चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥ ३॥
वह लङ्किनी फिर अपनेको सँभालकर उठी और डरके मारे
हाथ जोड़कर विनती करने लगी। [वह बोली—] रावणको जब
ब्रह्माजीने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसोंके
विनाशकी यह पहचान बता दी थी कि—॥ ३॥
बिकल होसि तैं कपि के मारे।
तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता।
देखेउँ नयन राम कर दूता॥ ४॥
जब तू बंदरके मारनेसे व्याकुल हो जाय, तब तू राक्षसोंका
संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं
श्रीरामचन्द्रजीके दूत (आप)-को नेत्रोंसे देख पायी॥ ४॥