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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 15
  • सुन्दरकाण्ड * १५
    तब मैं आकर तुम्हारे मुँहमें घुस जाऊँगा [तुम मुझे खा
    लेना]। हे माता! मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे जाने दे। जब
    किसी भी उपायसे उसने जाने नहीं दिया, तब हनुमान्जीने
    कहा—तो फिर मुझे खा न ले॥ ३॥
    जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा।
    कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
    सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ।
    तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥ ४॥
    उसने योजनभर (चार कोसमें) मुँह फैलाया। तब हनुमान्जीने
    अपने शरीरको उससे दूना बढ़ा लिया। उसने सोलह योजनका
    मुख किया। हनुमान्जी तुरंत ही बत्तीस योजनके हो गये॥ ४॥
    जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।
    तासु दून कपि रूप देखावा॥
    सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।
    अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥ ५॥
    जैसे-जैसे सुरसा मुखका विस्तार बढ़ाती थी, हनुमान्जी
    उसका दूना रूप दिखलाते थे। उसने सौ योजन (चार सौ
    कोसका) मुख किया। तब हनुमान्जीने बहुत ही छोटा रूप
    धारण कर लिया॥ ५॥
    बदन पइठि पुनि बाहेर आवा।
    मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
    मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा।
    बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥ ६॥