सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
पृष्ठ 12, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ें१२ * श्रीरामचरितमानस *
अन्तरात्मा ही हैं (सब जानते ही हैं) कि मेरे हृदयमें दूसरी कोई
इच्छा नहीं है। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी निर्भरा (पूर्ण) भक्ति
दीजिये और मेरे मनको काम आदि दोषोंसे रहित कीजिये॥ २॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ ३॥
अतुल बलके धाम, सोनेके पर्वत (सुमेरु)-के समान
कान्तियुक्त शरीरवाले, दैत्यरूपी वन [-को ध्वंस करने]-के
लिये अग्निरूप, ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, सम्पूर्ण गुणोंके निधान,
वानरोंके स्वामी, श्रीरघुनाथजीके प्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमान्जीको
मैं प्रणाम करता हूँ॥ ३॥
जामवंत के बचन सुहाए।
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई।
सहि दुख कंद मूल फल खाई॥ १॥
जाम्बवान्के सुन्दर वचन सुनकर हनुमान्जीके हृदयको बहुत
ही भाये। [वे बोले—] हे भाई! तुमलोग दुःख सहकर, कन्द-
मूल-फल खाकर तबतक मेरी राह देखना॥ १॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥ २॥