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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 14

१४ * श्रीरामचरितमानस *
[दोहा १]
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥
हनुमान्‌जीने उसे हाथसे छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा—
भाई! श्रीरामचन्द्रजीका काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ? ॥ १ ॥
जात पवनसुत देवन्ह देखा।
जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता।
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥ १ ॥
देवताओंने पवनपुत्र हनुमान्‌जीको जाते हुए देखा। उनकी
विशेष बल-बुद्धिको जाननेके लिये (परीक्षार्थ) उन्होंने सुरसा
नामक सर्पोंकी माताको भेजा, उसने आकर हनुमान्‌जीसे यह
बात कही—॥ १ ॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा।
सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं।
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥ २ ॥
आज देवताओंने मुझे भोजन दिया है। यह वचन सुनकर
पवनकुमार हनुमान्‌जीने कहा—श्रीरामजीका कार्य करके मैं लौट
आऊँ और सीताजीकी खबर प्रभुको सुना दूँ, ॥ २ ॥
तब तव बदन पैठिहउँ आई।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना।
ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥ ३ ॥