सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ * श्रीरामचरितमानस *
और वे उसके मुखमें घुसकर [तुरंत] फिर बाहर निकल
आये और उसे सिर नवाकर विदा माँगने लगे। [उसने कहा—]
मैंने तुम्हारे बुद्धि-बलका भेद पा लिया, जिसके लिये देवताओंने
मुझे भेजा था॥६॥
[दोहा २]
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥
तुम श्रीरामचन्द्रजीका सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल-
बुद्धिके भण्डार हो। यह आशीर्वाद देकर वह चली गयी, तब
हनुमान्जी हर्षित होकर चले॥२॥
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई।
करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं।
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥ १॥
समुद्रमें एक राक्षसी रहती थी। वह माया करके आकाशमें
उड़ते हुए पक्षियोंको पकड़ लेती थी। आकाशमें जो जीव-जन्तु
उड़ा करते थे, वह जलमें उनकी परछाईं देखकर, ॥१॥
गहइ छाँहँ सक सो न उड़ाई।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा।
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥ २॥
उस परछाईंको पकड़ लेती थी, जिससे वे उड़ नहीं सकते
थे [और जलमें गिर पड़ते थे]। इस प्रकार वह सदा आकाशमें
उड़नेवाले जीवोंको खाया करती थी। उसने वही छल हनुमान्जीसे