सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
॥ साधु को अंग ॥ [ १३१
ज्यौं लट भृंग करै अपनै सम,
तासनि भिन्न कहै नहिं कोई ।
ज्यौ द्रुम और अनेक हि भातिनि,
चंदन के ढिग चंदन होई ॥
ज्यौ जल क्षुद्र मिलै जब गंगहि,
होत पवित्र उहै जल सोई ।
सुन्दर जाति सुभाव मिटै सब,
साधु कै संगतै साधु ही होई ॥३॥
जो कोउ आवत है उनके ढिग,
ताहि सुनावत शब्द सदेसौ ।
ताहि कै तैसी ही औषध लावत,
जाहि कै रोग ही जानत जैसौ ।
कर्म कलंक हि काटत है सब,
शुद्ध करै पुनि कंचन तैसौ ।
सुन्दर वस्तु विचारत है नित,
सतनि कौ जु प्रभाव है ऐसौ ॥४॥
(३) भृंग-भोरा । ढिग-पास । क्षुद्र-गंदा ।
(४) कंचन-सोना । ।
३. अंग ११-१५: पञ्च-कोश विवेक, सांख्य-वेदान्त विचार व ब्रह्म-दर्शन
१३२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
जो परब्रह्म मिल्यौ कोऊ चाहत,
तो नित सत समागम कीजै ।
अंतरि मेटि निरतर व्है करि,
लै उनकौ अपनौ मन दीजै ॥
वै मुख द्वार उचार करै कछु,
सो अनयास सुधा रस पीजै ।
सुन्दर सूर प्रकासत है उर,
और अज्ञान सबै तम छीजै ॥५॥
जा दिन तें सतसंग मिल्यौ तब,
ता दिन तें भ्रम भाजि गयौ है ।
और उपाइ थके सव ही जब,
सतनि अद्वय ज्ञान दयौ है ॥
पोत पवारि हि क्यों करि छूवत,
एक अमोलिक लाल लह्यौ है ।
कौन प्रकार रहै रजनी तम,
सुन्दर सूर प्रकाश भयौ है ॥६॥
(५) अन्तर-भेद । अनयास-सरलता से ।
(६) अद्वय-अभेद । पोत पवार-काच के दाने ।
॥ साधु को अंग ॥ [ १३३
संत सदा सब कौ हित वांछत,
जानत है नर बूडत काढै ।
दे उपदेश मिटाइ सबै भ्रम,
ले करि ज्ञान जिहाज ही चाढै ॥
जे विषिया सुख नाहिन छाड़त,
ज्यौ कपि मूठि गहै शठ गाढ ॥
सुन्दर यौ दुख कौ सुख मानत,
हाट ही हाट विकावत आढै ॥७॥
सो अनयास तिरै भवसागर,
जो सतसंगति मैं चलि आवै ।
ज्यो कनिहार न भेद करै कछु,
आइ चढै तिहि नाव चढावै ॥
ब्राह्मन क्षत्रिय वैश्य हू शूद्र,
मलेच्छ चंडाल ही पार लगावै ।
सुन्दर बार कछू नही लागत,
या नर देह अभै पद पावै ॥८॥
ज्यौं हम खाहि पिवै अरु बोढहिं,
तैसे ही ये सब लोग वखानैं ।
ज्यौं जलमैं शशिकै प्रतिबिंव ही,
आप समा जल जत प्रवानैं ॥
(८) कनिहार-कर्णधार, केवट ।
१३४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
ज्यौ खग छाह धरा परि दीसत,
सुन्दर पखि ऊडै असमानै ।
त्यौ शठ देहनि के कृत देखत,
सतनि की गति क्यौ कोऊ जानै ॥६॥
जौ खपरा कर लै घर डोलत,
मागत भीख हि तौ नहि लाजै ।
जौ सुख सेज पटंबर अंबर,
लावत चंदन तौ अति राजै ॥
जौ कोउ आइ कहै मुखतैं कछु,
जानत ताहि बयारि हि बाजै ।
सुन्दर सशय दूरि भयौ सब,
जो कछु साधु करै सोई छाजै ॥१०॥
कोऊक निंदत कोऊक वदत,
कोऊक आइ कै देत है भक्षन ।
कोऊक आड लगावत चंदन,
कोऊक डारत धूरि ततक्षन ॥
कोउ कहै यह मूरिख दीसत,
कोउ कहै यह आहि विचक्षन ।
सुन्दर काहू सौ राग न द्वेष सु,
ये सब जानहु साधु के लक्षन ॥११॥
(१०) खपरा-खप्पर ।
(११) विचक्षण-विद्वान् ।
॥ साधू को अग ॥ [ १३५
तात मिलै पुनि मात मिलै,
सुत भ्रात मिलै युवती सुखदाई ।
राज मिलै गज बाज मिलै,
सर्ब साज मिलै मन वांछित पाई ॥
लोक मिलै सुरलोक मिलै,
बिधिलोक मिलै बैकुण्ठ हि जाई ।
सुन्दर और मिलै सबही सुख,
दुर्लभ सत समागम भाई ॥१२॥
मनहर छन्द
देव हू भये तै कहा, इन्द्र हू भये तै कहा,
विधि हू कै लोक तै बहुरि आइयतु है ।
मानुष भये तै कहा भूपति भये तै कहा,
द्विज हू भये तै कहा पार जाइयतु है ॥
पशु हू भये तै कहा पखी हूं भये तै कहा,
पन्नग भये तै कहौ क्यौं अघाइयतु है ।
छूटिबे कौ सुन्दर उपाइ एक साधु सग,
जिनकी कृपा तै अति सुख पाइयतु है ॥१३॥
(१२) तात-पिता ।
(१३) विधि-ब्रह्मा । पन्नग-सर्प ।
१३६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
इन्द्राणी शिगार करि चंदन लगायौ अंग,
वाही देखि इन्द्र अति काम बस भयौ है ।
शूक़री हू कर्द्दम कै चहले मैं लौटि करि,
आगै जाइ शूकर कौ मन हरि लयौ है ॥
जैसौ सुख शूकर कौ तैसौ सुख मधवा कौ,
तैसौ सुख नर पशु पखिन कौ दयौ है ।
सुन्दर कहत जाकै भयौ ब्रह्मानंद सुख,
सोई साधु जगत मैं जन्म जीति गयौ है ॥१४॥
धूलि जैसौ धन जाकै शूलि से ससार सुख,
भूलि जैसी भाग देखै अन्त की सी यारी है ।
पाप जैसी प्रभुताई साप जैसी सनमांन,
वडाई हू बिछुनी सी नागनी सी नारी है ।
अग्नि जैसौ इन्द्रलोक विघ्न जसौ विधिलोक,
कीरति कलंक जैसी सिद्धि सी ठगारि है ।
वासना न कोऊ वाकी ऐसी मति सदा जाकी,
सुन्दर कहत ताहि वदना हमारी है ॥१५॥
(१४) शृंगार-सजावट । कर्दम-कीचट । चहले में-
खड्डे में । शूकर-सूअर । मधवा-इन्द्र ।
॥ साधु को अंग ॥ [ १३७
काम ही न क्रोध जाकै लोभ ही न मोह ताकै,
मद ही न मच्छर न, कोऊ न विकारी है ।
दुख ही न सुख मानै पाप ही न पुन्य जानै,
हरष न शोक आन देह ही तै न्यारौ है ॥
निंदा न प्रशंसा कर राग ही न दोष धरै,
लेन ही न देन जाकै कछू न पसारौ है ।
सुन्दर कहत ताकी अगम अगाध गति,
ऐसी कोऊ साधु सु तौ रामजी कौ प्यारौ है ॥१६॥
आठौ जाम यम नेम आठौ जाम रहै प्रेम,
आठौ जाम जोग जज्ञ कियौ बहु दान जू ।
आठौ जाम जप तप आठौ जाम लियौ बत,
आठौ जाम तीरथ मैं करत है न्हान जू ॥
आठौ जाम पूजा बिधि आठौ जाम आरती हू,
आठौ जाम दडवत समरन ध्यान जू ।
सुन्दर कहत तिन कियौ सब आठौ जाम,
सोई साधु जाकै उर एक भगवान जू ॥१७॥
(१७) जाम-याम, पहर । जग्य-यज्ञ । न्हान-स्नान ।
समरण-स्मरण ।
१३८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
जैसे आरसी कौ मैल काटत सिकलीगर,
मुख मै न फेर कोऊ वहै वाकौ पोत है ।
जैसे बैद नैन मैं, सलाका मेलि शुद्ध करै,
पटल गये ते तहाँ ज्यौ की त्यौ ही जोत है ॥
जैसे वायु बादर बिखेरि कै उडाइ देत,
रवि तौ अकास माहि सदा ई उदोत है ।
सुन्दर कहत भ्रम छिन मैं बिलाइ जात,
साधु ही कै सग तै स्वरूप ज्ञान होत है ॥१८॥
मृतक दादुर जीव सकल जिवाये जिन,
बरखत बानी मुख मेघ की सी धार कौ ।
देत उपदेश, कोऊ स्वार्थ न लंवलेश,
निश दिन करत है ब्रह्म ही बिचारे कौ ॥
और हू सदेह सब मेटत निमिष माहि,
सूरज मिटाइ देत जैसे अधकार कौ ।
सुन्दर कहत हस बासी सुख सागर के,
सतजन आये है सु पर उपकार कौ ॥१६॥
(१८) आरसी-काच, दर्पण । पोत-सफाई । सलाका-
शलाका-सलाई । उदोत-प्रकाशमान ।
(१६) मृतक-मरा हुआ । दादुर-मेढक । निमिष-क्षण ।
॥ साधू को अंग ॥ [ १३६
हीरा ही न लाल ही न पारस न चिंतामनि,
और ऊ अनेक नग कहो कहा कीजियै ।
कामधेनु सुरतरु मदन मही समुद्र,
नौका रु विमान कोटि रंभाहू छीजियै ॥
पृथ्वी अप तेज वायु व्योम त्यों गगन जु,
चंद सूर जीवन तथा गुरु नाँजियै ।
सुन्दर विचार इम मोहि सब दीसे थोथ,
सन्तनि के मन कहो और कहा दीजियै ॥२०॥
जिन तन मन प्रान दियो सब मेरै हेत,
और हू ममत्व बुद्धि आपुनी उठाई है ।
जागतऊ सोवतऊ गावत है मेरे गुन,
मेरोई भजन ध्यान, दूसरी न काई है ॥
तिनके मैं पीछे लग्यो फिरत हों निसदिन,
सुन्दर कहत मेरी उन तै वडाई है ।
वे हैं मेरे प्रिय, मैं हू उनके अधीन सदा,
सतनि की महिमा तो श्रीमुख सुनाई है ॥२१॥
(२०) सुरतरु-कल्पवृक्ष । अप-जल । व्योम-आकाश ।
सूर-सूर्य ।
(२१) काई-काम ।
१४० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
प्रथम सुजश लेत शील हू सतोष लेत,
क्षमा दया धर्म लेत पापतैं डरतु हैं ।
इन्द्रिनि कौ घेरि लेत, मनहू कौ फेर लेत,
जोग की जुगति लेत ध्यान लै धरतु है ॥
गुरु कौ बचन लेत, हरिजी कौ नाम लेत,
आतमा कौ सोधि लेत भौजल तिरतु हैं ।
सुन्दर कहत जग सत कछु लेत नाहि,
सतजन निस दिन लेबौई करतु है ॥२२॥
साचौ उपदेश देत भली भली मोख देत,
समता सुबुद्धि देत कुमति हरत है ।
मारग दिखाइ देत भाव हू भगति देत,
प्रेम की प्रतीति देत अभरा भरत हैं ॥
ज्ञान देत ध्यान देत आतमा बिचार देत,
ब्रह्म कौ बताइ देत ब्रह्म मैं चरत है ।
सुन्दर कहत जग सत कछ देत नाहि,
सतजन निश दिन देबौई करत है ॥२३॥
(२२) भौजल-भवजल, ससार-सागर ।
(२३) प्रतीति-भाव । अभरा-अपूर्ण, खाली । ब्रह्म मे
चरत है-स्वय ब्रह्मानन्द मे विहार करते है,
॥ साधु को अंग ॥ [ १४१
जगत ब्यौहार सब देखत है ऊपरि कौ,
अन्तहकरन कौ न नैक पहिचानि है ।
छाजन कै भोजन कै हलन चलन कछु,
और कोऊ क्रिया करै सोई तौ बखानि है ॥
आपुनेई गुननि आरोपत अज्ञानी नर,
सुन्दर कहत तातै निदाई कौ ठानि है ।
भाव मैं तौ अन्तरि है राति अरु दिन कौ सौ,
साधु की परीक्षा कोऊ कैसे करि जानि है ॥२४॥
कूप मैं कौ मीडूका तौ कूप कौ सराहत है,
राजहंस सौ कहै कितौक तेरी सर है ।
मशका कहत मेरी सरभरि कौन उडै,
मेरै आगै गरुड की कितीयक जर है ॥
गुबरेला गोली कौ लुढाई करि मानै मोद,
मधुप कौ निंदत सुगंध जाकौ घर है ।
आपुनि न जानै गति सतन की नाम धरै,
सुन्दर कहत देखौ ऐसौ मूढ नर है ॥२५॥
(२४) छाजन-छादन, वस्त्र । (२५) मशक-मच्छर ।
सरभरि-बराबर । जर-शक्ति, ताकत । गुबरेला-गोबर की
गोली बनाने वाला जानवर । मधुप-भौरा ।
१४२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
कोऊ साध भजनीक हुतौ लयलीन अति,
कबहू प्रारब्ध कर्म धक्का आइ दयौ है ।
जैसे कोऊ मारग मैं चलतै आखुटि परै,
फेरि करि उठै तब उहै पथ लयौ है ॥
जैसे चन्द्रमा की पुनि कला क्षीन होइ गई,
सुन्दर सकल लोक दुतीया कौ नयौ है ।
देव कौ देवातन गयौ तौ कहा भयौ बीर,
पीतर कौ मोल सु तौ नहि कछु गयौ है ॥२६॥
उही दगाबाज उही कुष्ठी जु कलंक भयौ,
उही महापापी वाकैं नख सिख कीच है ।
उही गुरुद्रोही, गो ब्राह्मण कौ हननहार,
उही आतमा कौ घाती हिंसा वाकै बीच है ॥
उही अघ कौ समुद्र उही अघ कौ पहार,
सुन्दर कहत वाकी बुरी भाति मीच है ।
उहो है मलेच्छ उही चंडाल बुरे तें बुरौ,
संतन की निंदा करै सु तौ महानीच है ॥२७॥
(२६) भजनीक-भजन करने वाला । आखुटि-ठोकर
खाकर ।
(२७) अघ-पाप । मीच-मौत । मलेछ-मलेच्छ ।
॥ साधु को अंग ॥, [ १४३
परि है वज्राग ताकै ऊपरि अचानक,
धूरि उडि जाइ कहुं ठाहर न-पाइ है ।
पोछै कैऊ युग महा नरक मैं परै जाइ,
ऊपरि तै यमहू की मार बहु खाइ है ॥
ताकै पीछे भूत, प्रेत- थावर जगम जोनि,
सहैगौ सकट तब पीछे- पछताइ है ।
सुन्दर कहत और भुगतै अनंत दुख,
सतनि कौ निंदै ताकी सत्यानाश जाइ है ॥२८॥
ताही कै भगति भाव उपजि हैं अनायास,
जाकी मति सन्तन सौ सदा अनुरागी है ।
अति सुख पावै ताकै दुख सब दूरि हौहि,
औरहू काहू की जिन निंदा मुख त्यागी है ॥
संसार की पाशि काटि पाइ है परम पद,
सतसंग ही तै जाकै ऐसी मति जागी है ।
सुन्दर कहत ताकौ तुरत कल्यान होइ,
सतनि की गुन गहै सोई बडभागी है ॥२६॥
जोग जग्य जप तप तारथ व्रतादि दान,
साधन सकल नहि याकी सरभरि हैं ।
(२८) वज्राग=वज्र की अग्नि ।
१४४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
और देवी देव हू उपासना अनेक भांति,
शक सब दूरि करि तिनतै न डरि हैं ॥
सब ही के सीस पर पाव दे मुकति होइ,
सुन्दर कहत सो तौ जनमै न मरि हैं ।
मन बच काय करि अंतरि न राखै कछु,
सतनि की सेवा करै सोई निसतरि है ॥३०॥
॥ इति साधु को अंग सम्पूर्ण ॥
(३०) मुकति-मुक्त । अन्तर-भेद, फर्क ।
॥ भक्ति ज्ञान मिश्रित को अंग ॥ [ १४५
अथ भक्ति ज्ञान मिश्रित को अंग
॥२१॥
बैठत राम हि ऊठत राम हि,
बोलत राम हि राम कह्यौ है ।
जीमत राम हि पीवत राम हि,
घीमत राम हि राम गह्यौ है ॥
जागत राम हि सोवत राम हि,
जोवत राम हि राम लह्यौ है ।
देतहु राम हि लेतहु राम हि,
सुन्दर राम हि राम कह्यो है ॥१॥
श्रोत्रहु राम हि नेत्रहु राम हि,
वक्त्र हु राम हि राम हि गाजै ।
शीशहु राम हि हाथहु राम हि,
पांव हु राम हि राम हि साजै ॥
पेटं हु राम हि पीठ हु राम हि,
रोम हु राम हि राम हि वाजै ।
अन्तरि राम निरतर राम हि,
सुन्दर राम हि राम विराजै ॥२॥
(१-२) घीमत-ध्यान करते हुए । वक्त्र-मुख ।
१४६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
भूमिहु राम ही आपहु रामै हि,
तेज हु राम हि वायु हु रामै ।
व्योमहु राम हि चदहु राम हि,
सूरहु राम हि शीत न घामै ॥
आदिहु रामहि अतहु राम हि,
मध्य हु राम हि पु स न बामै ॥
आजहु रामहि कालहु राम हि,
सुन्दर रामहि म्हा महि थामै ॥३॥
देख हु राम अदेख हु राम हि,
लेख हु राम अलेख हु रामै ।
एक हु राम अनेक हु राम हि,
शेषहु राम अशेष हु तामै ॥
मौन हू राम अमौनहु राम हि,
गौनहु राम हि भौनहु ठामै ।
बाहिर राम हि भीतर राम हि,
सुन्दर रामहि है जग जामै ॥४॥
(३) पुस-पुरुष। वामै-स्त्री। म्हामहि-हम सब मे।
थामैं-तुम सब मे।
॥ भक्ति ज्ञान मिश्रित को अंग ॥ [ १४७
दूरि हु राम नजीक हु राम हि,
देश हु राम प्रदेश हु रामै ।
पूरब राम हि पच्छिम राम हि,
दक्षिण राम हि उत्तर धामै ॥
आगैहु राम हि पीछैहु राम हि,
व्यापक राम हि है वन ग्रामै ।
सुन्दर राम दसौं दिसि पूरन,
सुरगहु राम पतालहु तामै ॥५॥
आप हु राम उपावत राम हि,
भंजन राम सवारन रामै ।
दृष्टि हु राम अदृष्टि हु राम हि,
इष्ट हु राम करै सब कामै ॥
वर्ण हु राम अवर्ण हु राम हि,
रक्त न पीत न श्वेत न श्यामै ।
सुनिहु राम अमुनि हु राम हि,
सुन्दर राम हि नाम अनामै ॥६॥
॥ इति भक्ति ज्ञान मिश्रित को अंग ॥
(५) सुरग-स्वर्ग । (६) उपावत-उत्पन्न करने वाले ।
भंजन-मिटाने वाले । सवारन-सुधारने वाले, रक्षा करने
वाले ।
१४८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ विपर्यय शब्द को अंग ॥२२॥
सवैया छंद
श्रवनहु देखि सुनै पुनि नैनहुं,
जिव्हा सूंधि नासिका बोल ।
गुदा खाइ इन्द्रिय जल पीवै,
बिनही हाथ सुमेर हि तोल ॥
ऊंचे पाइ मूड नीचे कौ,
बिचरत तीनि लोक मैं डोल ।
सुन्दरदास कहै सुनि ज्ञानी,
भलीभाति या अर्थ हि खोल ॥१॥
अंधा तीनि लक कौ देखै,
बहिरा सुनै बहुत बिधि नाद ।
नकटा बास कमल की लेवै,
गूंगा करै बहुत सबाद ॥
टूटा पकरि उठावै पर्वत,
पगुल करै नृत्य अहलाद ।
जो कोऊ याकौ अर्थ बिचारै,
सुन्दर सोई पावै स्वाद ॥२॥
कुंजर कौ कीरी गिलि बैठी,
सिंघ हि खाइ अघानौ श्याल ।
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१५० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
देव माहि तैं देवल प्रगट्यौ,
देवल मैं तैं प्रगट्यौ देव ।
सिष गुरु ही उपदेशन लागौ,
राजा करै रंक की सेब ॥
बंध्या पुत्र पंगु एक जायौ,
ताकौ घर खोवन की टेव ।
सुन्दर कहै सु पण्डित ज्ञाता,
जो कोऊ याकौ जानै भेव ॥१६॥
कमल मांहि तैं पानी उपज्यौ,
पानी मंहि तै उपज्यौ सूर ।
सूर मांहि शीतलता उपजी,
शीतलता में सुख भरपूर ॥
ता सुख को क्षय होइ न कबहू,
सदा एकरस निकट न दूर ।
सुन्दर कहै सत्य यह यौ ही,
यामैँ रती न जानहु कूर ॥१७॥
हंस चढ्यौ ब्रह्मा के ऊपर,
गरुड चढ्यौ पुनि हरि की पीठि ।
बैल चढ्यौ है शिव के ऊपर,
सो हम देख्यौ अपनी दीठि ॥
देव चढ्यौ पाती के ऊपर,
जरख चढ्यौ डाषनि परि नीठि ।