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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 143

१३४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
ज्यौ खग छाह धरा परि दीसत,
सुन्दर पखि ऊडै असमानै ।
त्यौ शठ देहनि के कृत देखत,
सतनि की गति क्यौ कोऊ जानै ॥६॥
जौ खपरा कर लै घर डोलत,
मागत भीख हि तौ नहि लाजै ।
जौ सुख सेज पटंबर अंबर,
लावत चंदन तौ अति राजै ॥
जौ कोउ आइ कहै मुखतैं कछु,
जानत ताहि बयारि हि बाजै ।
सुन्दर सशय दूरि भयौ सब,
जो कछु साधु करै सोई छाजै ॥१०॥
कोऊक निंदत कोऊक वदत,
कोऊक आइ कै देत है भक्षन ।
कोऊक आड लगावत चंदन,
कोऊक डारत धूरि ततक्षन ॥
कोउ कहै यह मूरिख दीसत,
कोउ कहै यह आहि विचक्षन ।
सुन्दर काहू सौ राग न द्वेष सु,
ये सब जानहु साधु के लक्षन ॥११॥
(१०) खपरा-खप्पर ।
(११) विचक्षण-विद्वान् ।