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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 284 में से

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पृष्ठ 152

॥ साधु को अंग ॥, [ १४३
परि है वज्राग ताकै ऊपरि अचानक,
धूरि उडि जाइ कहुं ठाहर न-पाइ है ।
पोछै कैऊ युग महा नरक मैं परै जाइ,
ऊपरि तै यमहू की मार बहु खाइ है ॥
ताकै पीछे भूत, प्रेत- थावर जगम जोनि,
सहैगौ सकट तब पीछे- पछताइ है ।
सुन्दर कहत और भुगतै अनंत दुख,
सतनि कौ निंदै ताकी सत्यानाश जाइ है ॥२८॥
ताही कै भगति भाव उपजि हैं अनायास,
जाकी मति सन्तन सौ सदा अनुरागी है ।
अति सुख पावै ताकै दुख सब दूरि हौहि,
औरहू काहू की जिन निंदा मुख त्यागी है ॥
संसार की पाशि काटि पाइ है परम पद,
सतसंग ही तै जाकै ऐसी मति जागी है ।
सुन्दर कहत ताकौ तुरत कल्यान होइ,
सतनि की गुन गहै सोई बडभागी है ॥२६॥
जोग जग्य जप तप तारथ व्रतादि दान,
साधन सकल नहि याकी सरभरि हैं ।
(२८) वज्राग=वज्र की अग्नि ।