सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ साधू को अंग ॥ [ १३६
हीरा ही न लाल ही न पारस न चिंतामनि,
और ऊ अनेक नग कहो कहा कीजियै ।
कामधेनु सुरतरु मदन मही समुद्र,
नौका रु विमान कोटि रंभाहू छीजियै ॥
पृथ्वी अप तेज वायु व्योम त्यों गगन जु,
चंद सूर जीवन तथा गुरु नाँजियै ।
सुन्दर विचार इम मोहि सब दीसे थोथ,
सन्तनि के मन कहो और कहा दीजियै ॥२०॥
जिन तन मन प्रान दियो सब मेरै हेत,
और हू ममत्व बुद्धि आपुनी उठाई है ।
जागतऊ सोवतऊ गावत है मेरे गुन,
मेरोई भजन ध्यान, दूसरी न काई है ॥
तिनके मैं पीछे लग्यो फिरत हों निसदिन,
सुन्दर कहत मेरी उन तै वडाई है ।
वे हैं मेरे प्रिय, मैं हू उनके अधीन सदा,
सतनि की महिमा तो श्रीमुख सुनाई है ॥२१॥
(२०) सुरतरु-कल्पवृक्ष । अप-जल । व्योम-आकाश ।
सूर-सूर्य ।
(२१) काई-काम ।