सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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॥ साधू को अग ॥ [ १३५
तात मिलै पुनि मात मिलै,
सुत भ्रात मिलै युवती सुखदाई ।
राज मिलै गज बाज मिलै,
सर्ब साज मिलै मन वांछित पाई ॥
लोक मिलै सुरलोक मिलै,
बिधिलोक मिलै बैकुण्ठ हि जाई ।
सुन्दर और मिलै सबही सुख,
दुर्लभ सत समागम भाई ॥१२॥
मनहर छन्द
देव हू भये तै कहा, इन्द्र हू भये तै कहा,
विधि हू कै लोक तै बहुरि आइयतु है ।
मानुष भये तै कहा भूपति भये तै कहा,
द्विज हू भये तै कहा पार जाइयतु है ॥
पशु हू भये तै कहा पखी हूं भये तै कहा,
पन्नग भये तै कहौ क्यौं अघाइयतु है ।
छूटिबे कौ सुन्दर उपाइ एक साधु सग,
जिनकी कृपा तै अति सुख पाइयतु है ॥१३॥
(१२) तात-पिता ।
(१३) विधि-ब्रह्मा । पन्नग-सर्प ।