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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 142

॥ साधु को अंग ॥ [ १३३
संत सदा सब कौ हित वांछत,
जानत है नर बूडत काढै ।
दे उपदेश मिटाइ सबै भ्रम,
ले करि ज्ञान जिहाज ही चाढै ॥
जे विषिया सुख नाहिन छाड़त,
ज्यौ कपि मूठि गहै शठ गाढ ॥
सुन्दर यौ दुख कौ सुख मानत,
हाट ही हाट विकावत आढै ॥७॥
सो अनयास तिरै भवसागर,
जो सतसंगति मैं चलि आवै ।
ज्यो कनिहार न भेद करै कछु,
आइ चढै तिहि नाव चढावै ॥
ब्राह्मन क्षत्रिय वैश्य हू शूद्र,
मलेच्छ चंडाल ही पार लगावै ।
सुन्दर बार कछू नही लागत,
या नर देह अभै पद पावै ॥८॥
ज्यौं हम खाहि पिवै अरु बोढहिं,
तैसे ही ये सब लोग वखानैं ।
ज्यौं जलमैं शशिकै प्रतिबिंव ही,
आप समा जल जत प्रवानैं ॥
(८) कनिहार-कर्णधार, केवट ।