सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ साधु को अंग ॥ [ १३१
ज्यौं लट भृंग करै अपनै सम,
तासनि भिन्न कहै नहिं कोई ।
ज्यौ द्रुम और अनेक हि भातिनि,
चंदन के ढिग चंदन होई ॥
ज्यौ जल क्षुद्र मिलै जब गंगहि,
होत पवित्र उहै जल सोई ।
सुन्दर जाति सुभाव मिटै सब,
साधु कै संगतै साधु ही होई ॥३॥
जो कोउ आवत है उनके ढिग,
ताहि सुनावत शब्द सदेसौ ।
ताहि कै तैसी ही औषध लावत,
जाहि कै रोग ही जानत जैसौ ।
कर्म कलंक हि काटत है सब,
शुद्ध करै पुनि कंचन तैसौ ।
सुन्दर वस्तु विचारत है नित,
सतनि कौ जु प्रभाव है ऐसौ ॥४॥
(३) भृंग-भोरा । ढिग-पास । क्षुद्र-गंदा ।
(४) कंचन-सोना । ।