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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

१०६ स्पन्दकारिका
वेग से उभर आता है तब उसके मन पर इसकी एक विलक्षण प्रतिक्रिया हो जाती है । वह यह
कि जितनी अलक्ष्य तीव्रता से उभर आनेवाला भाव उभर आता है, उतनी ही तीव्रगति से उसका
पूर्ववर्ती मनोभाव डूब जाता है । इन दोनों मनोभावों के ऐसे अप्रत्याशित अन्त एवं आरम्भ
के बीचवाले संधिक्षण में सारी विशेषरूप मानसिक वृत्तियों की बहिर्मुखीन गति स्तब्ध हो
जाती है । दूसरे शब्दों में यह क्षण एक प्रकार का निर्विकल्प क्षण जैसा होता है और इसमें
बिजली की तीव्रतम कौंध की तरह, अलक्षित रूप में, विगलित-वेद्यान्तरता अपनी झलक
दिखाकर फिर शान्त हो जाती है । सुखिता, दुःखिता या मूढ़ता इत्यादि अन्तःकरणवृत्तियों
की चेतना का नाममात्र भी अवशिष्ट नहीं रहता है और फलस्वरूप इस क्षण में केवल
सामान्य स्पन्द-तत्त्व की प्रकाशमानता ही अवशिष्ट रह जाती है । प्रत्येक जीव की मानसिक
प्रक्रिया में, प्रतिसमय न जाने कितने ऐसे शक्तिप्रत्यस्तमित दशा के क्षण आते-जाते रहते हैं
क्योंकि प्रतिक्षण मनोभावों की उन्मज्जन और निमज्जन की क्रिया अविराम गति से चलती
रहती है । कठिनता तो यह है कि मनोभावों का उन्मज्जन और निमज्जन इतना तीव्र होता है
कि साधारण रूप में किसी मनुष्य को भी—मानवेतर प्राणियों की तो बात ही नहीं—इस बीच
वाले सन्धिक्षण का आभास भी नहीं मिलता है । इसका कारण यह कि यह क्षण अत्यन्त सूक्ष्म
होने के कारण स्थूल-बुद्धि के द्वारा ग्राह्य नहीं है ।
जिन भाग्यशाली व्यक्तियों पर परमेश्वर का तीव्रतम शक्तिपात हो उनको सद्गुरु
लोकोत्तर प्रातिभ-ज्ञान के द्वारा, इन अन्तरालवर्ती सन्धिक्षणों और इनमें प्रकाशमान रहने वाले
स्पन्दतत्त्व की अनुभूति करवा लेते हैं । अनन्तर वे अभ्यास की दृढ़ता से, ऐसे ही क्षणों पर,
अपनी बहिर्मुखीन शक्ति को कूर्मांग-२संकोच की युक्ति से एकदम समेट कर, अन्तर्मुख हो
जाते हैं और धीरे धीरे इस भाव पर स्थिर रहने की क्षमता भी प्राप्त कर लेते हैं ।
प्रस्तुत सूत्र में हर्ष, क्रोध और मूढ़ता इनसे क्रमशः सारी सुखात्मक, दुःखात्मक और
मोहात्मक अन्तःकरणवृत्तियों का ग्रहण करके, सारी ज्ञानेन्द्रियों की व्यापाररूपा जाग्रत्-अवस्था
सुनकर किंकर्तव्यविमूढ़ता अथवा जंगल के सुनसान मार्ग में चलते समय अचानक
सामने आते हुये शेर या फनियाले को देख कर भय का भाव उभर आता है । इसी
प्रकार अन्य मनोभावों के विषय में समझना चाहिये ।
१. क्षुताद्यन्ते भये शोके गह्वरे वा रणद्रुते ।
कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्तामयी दशा ॥ (वि० भै०, ११९)
इस विषय में वि० भै० ७१-१०१ और शि० दृ० १.९-११ भी द्रष्टव्य हैं ।
२. जिस प्रकार कछुआ भय की खनक पाते ही, पलक भर में, अपने सारे अंगों को अपनी
ही पीठ पर वर्तमान कटाह के नीचे समेट लेता है ।
'प्रसृताया अपि वा कूर्माङ्गसंकोचवत् त्राससमये हृत्प्रवेशवच्च सर्वतो निवर्तनम्' ।
(मा० वि० वा० १८)

सूत्र—(साधारण जीवभाव के स्तर पर, जिस प्रकार किसी महान् गौरवशाली और

चित्त की एकाग्रता—सोम-सूर्य १०७
में और दौड़ने की क्रिया के द्वारा सारी बहिरंग कर्मेन्द्रियवृत्तियों का ग्रहण करके कर्मे-
न्द्रियों की व्यापकरूपा जाग्रत्-अवस्था में, समान रूप से स्पन्द-तत्त्व की उपलब्धि की ओर
संकेत किया गया है ॥२२॥
[ चित्त की एकाग्रता—सोम-सूर्य ]
यहाँ तक के प्रकरण में जिस प्रकार का वर्णन किया गया है उस प्रकार की अनुभूति
प्राप्त करवाने में, शिष्य पर सद्गुरु की छत्रच्छाया का होना अनिवार्य है । परन्तु जिस समय
कोई साधक स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका में वास्तविक प्रवेश कर लेता है उस समय से सत्-गुरु
का साथ भी छूट जाता है । इसका कारण यह कि तुर्यधाम में प्रविष्ट होने के समय तक
विकल्पों का इतना संस्करण हुआ होता है कि गुरुभाव और शिष्यभाव का विकल्प भी समाप्त
हुआ होता है । फलतः यहाँ से आगे का क्षेत्र पार करने में, साधक की, अपनी उद्-बुद्ध
शक्ति ही पथप्रदर्शिका बन जाती है ।
अगले तीन¹ सूत्रों में, ऐसे ही, शाक्त-भूमिका में प्रविष्ट होने के बिल्कुल अभिमुख योगी
की, मानसिक संकल्प-बद्धता, यौगिक प्रक्रिया और सुषुम्नाधाम में अन्तिम लयीभवन का वर्णन
किया जा रहा है—
यामवस्थां समालम्ब्य यदयं मम वक्ष्यति ।
तदवश्यं करिष्येऽहमिति सङ्कल्प्य तिष्ठति ॥२३॥
तामाश्रित्योर्ध्वमार्गेण सोमसूर्यावुभावपि ।
सौषुम्नेऽध्वन्यस्तमितो हित्वा ब्रह्माण्डगोचरम् ॥२४॥
तदा तस्मिन् महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे ।
सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्यादनावृतः ॥२५॥
यां स्पन्दस्वरूपरूपामस्थामवलम्ब्य 'यत्किंचित् अयं मम वक्ष्यति, तत् अवश्यं
करिष्यामि' इत्यध्यवसायेन स्पन्दतत्त्वमधिष्ठाय यो वर्तते ॥२३॥
तस्य, तामवस्थामाश्रित्य पुरुषस्य, सोमसूर्यो द्वावपि सौषुम्ने अध्वनि मध्यनाड्य-
भिधाने, अस्तमयं कुरुतः, ब्रह्माण्डगोचरं शरीरमार्गं परित्यज्य योगिनः ॥२४॥
तस्मिन् महाव्योम्नि प्रत्यस्तमित-शशिभास्करे यस्य स्वस्वभावाभिव्यक्तिः न
सम्यक् वृत्ता, स स्वप्नादिना मुह्यमानोऽप्रबुद्धो निरुद्धः स्यात्, प्रबुद्धः पुनरनावृत एव
भवति ॥२५॥
अनुवाद—(सूत्र २३ दृष्टान्त के रूप में)
सूत्र—(साधारण जीवभाव के स्तर पर, जिस प्रकार किसी महान् गौरवशाली और
सहानुभूति से पूर्ण हृदय वाले स्वामी का परिचारक, उसकी कोई आवश्यक आज्ञा सुनने के
पूर्ववर्ती क्षण में—)
१. इन तीनों सूत्रों में से पहला सूत्र दृष्टान्त और दार्शनिक दोनों रूपों में प्रस्तुत हुआ है।

१०८ स्पन्दकारिका
'यह मेरा स्वामी जो कोई भी (साध्य या दुस्साध्य) कार्य करने की आज्ञा देगा, वह
मैं अवश्य उसी यथावत् रूप में करके ही रहूँगा' इस प्रकार संकल्पबद्ध होकर, जिस प्रकार की
मानसिक अवस्था (वृत्तिप्रत्यस्तमित-अवस्था) का आश्रय लेकर अवस्थित रहता है—
(दार्ष्टान्तिक के रूप में)
(उसी प्रकार साधना के क्षेत्र में कोई भी प्रबुद्ध-भूमिका पर अवस्थित साधक)
'यह स्पन्दात्मिका शक्ति मुझे जिस प्रकार की स्वरूपविमर्शात्मक अनुभूति करायेगी,
मैं उस पर आरूढ होकर रहूँगा'—इस प्रकार संकल्पबद्ध होकर जिस प्रकार की मानसिक
अवस्था (वृत्तित्रत्यस्तमित-अवस्था) का आश्रय लेकर अवस्थित रहता है ॥२३॥
उस योगी की उसी अवस्था का आश्रय लेकर, उसके चन्द्रमा और सूर्य (मनस् एवं
प्राण अथवा प्राण एवं अपान) शरीर व्याप्ति को छोड़कर, ऊर्ध्व-मार्ग से सुषुम्नाधाम में पहुँचकर,
उसी में लय हो जाते हैं ॥२४॥
जहाँ पहुँचकर चन्द्रमा और सूर्य दोनों ही लीन हो जाते हैं उस महान् आकाश में
(तुर्यरूप शाक्तभूमिका के अनन्त आकाश में) प्रबुद्ध योगी की चिन्मात्ररूप अनुभूति पर कोई भी
आवरण नहीं रहता है । इसके प्रतिकूल मूढ अर्थात् सम्यक्-अनुभूति से हीन योगी, उस
अवस्था में भी, सुषुप्ति१-पद की जैसी प्रगाढ़ अन्धतमस् की दशा में अचेत पड़ा रहता
है ॥२५॥
वृत्ति—(तुर्यरूप शाक्तभूमिका में प्रविष्ट होने के अभिमुखीभाव के अवसर पर) जो
योगी—'यह मेरी स्वभावभूत स्पन्द-शक्ति 'मुझे जो कुछ भी कहेगी अर्थात् तुर्या भूमिका में
प्रविष्ट होने के लिए जैसा भी पथप्रदर्शन करेगी, मैं अवश्य उसी का अनुसरण करूँगा' इस
प्रकार का अटल संकल्प धारण करके, स्पन्दतत्त्व का स्वरूप ही बनी हुई अवस्था का आश्रय
लेकर, स्पन्दतत्त्व पर अधिष्ठित होकर रहता है—
उस योगी की उसी अवस्था के आधार पर, उसके चन्द्रमा और सूर्य दोनों, शरीर
व्याप्ति को छोड़कर अर्थात् पाञ्चभौतिक काया में अपने बहिर्मुखोन प्रसार को छोड़कर, 'मध्य-
नाड़ी' नामवाले सुषुम्नामार्ग में लय हो जाते हैं । जिसमें चन्द्रमा और सूर्य दोनों का अस्तमन
हो जाता है उस महान् आकाश में अर्थात् विशुद्ध चिन्मात्ररूप तुर्या भूमिका के असीम आकाश
में, ऐसा योगी जिसको पूर्णरूप से स्वभाव की अभिव्यक्ति न हुई हो, साधारण स्वप्न इत्यादि
(लौकिक स्वप्न और सुषुप्ति) के द्वारा मूढभाव (तामसिक मोह) में डाला जाने के कारण,
अप्रबुद्ध बनकर२ निरुद्ध अवस्था में पड़ा रहता है । इसके प्रतिकूल प्रबुद्ध योगी की आत्मचेतना
निरावृत रूप में प्रकाशमान रहती है ॥२३-२५॥
१. यहाँ पर सुषुप्ति-पद से योगी की उस अवस्था का अभिप्राय है जिसमें उसको आत्म-
साक्षात्कार हो जाने पर भी उसकी चेतना नहीं रहती है ।
२. चित्त की ऐसी अवस्था जिसमें वह अपनी मौलिक चितिरूपता का साक्षात्कार करने के
क्षण पर मूढता (मोहग्रस्तता अथवा तमोऽभिभव) के कारण,

चित्तवृत्ति एकाग्रता—सोमसूर्य १०९
विवरण
प्रस्तुत सूत्र (सूत्र २३) में विशेषस्पन्द कही जाने वाली बहिर्मुखीन चित्तवृत्तियों की
निरोधात्मक प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। बहिर्मुखीन चित्तवृत्तियों को, अलंग्रासयुक्ति के
द्वारा दिशा बदलकर, अन्तर्मुखीन बनाना ही 'चित्तनिरोध' है और यही शाक्त-उपाय का
आधार-स्तम्भ है। इस विषय में पहले भी पर्याप्त उल्लेख हो चुका है अतः उन बातों को फिर
दोहराने की आवश्यकता नहीं है। यहां पर केवल इस बात को ध्यान में रखने की आवश्यकता
है कि इस सूत्र में, एक कर्मचारी (जो अन्य सारे कर्त्तव्यों को भूलकर प्राणपन से अपने हितैषी
स्वामी की आज्ञा को पूर्ण करने पर उद्यत हो) की क्षणपर्यवसायिनी वृत्तिप्रत्यस्तमितदशा के
दृष्टान्त की पृष्ठभूमि पर, इस बात का स्पष्ट संकेत किया गया है कि, स्पन्दमयी शाक्तभूमिका
में प्रवेश पाने के प्रति उत्सुक योगी को, पहले अपने में प्रखर मानसिक नियन्त्रण की क्षमता
प्राप्त करना नितान्त आवश्यक है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये संकल्प की दृढ़ता,
सद्विचार, अटल श्रद्धा और आत्म-शक्ति की तीव्रता परम अपेक्षित अंग हैं। दृढ़संकल्प वाला
योगी ही, स्वरूप-की उपलब्धि के लिए सांसारिक बाधाओं एवं तथाकथित विभीषिकाओं को
अपनी शक्ति से परास्त कर सकता है, अन्यथा नहीं।
भारतीय जनगण के मानविहारी भगवान् मुरलीमनोहर ने 'चित्तनिरोध' की क्षमता
रखने वाले व्यक्ति को 'स्थित-प्रज्ञ' कहा है। भगवान् का कथन है कि स्थित-प्रज्ञ व्यक्ति सारी
सांसारिक कामनाओं को भूलकर केवल अपने आप में रमणशील होकर रहते हैं। वे न तो
किसी दुःख के आने पर उद्विग्न होते हैं और न सुखभोग की सरिता में ही बह जाते हैं। उन
पर भगवान् का पूर्ण अनुग्रह होता है जिससे वे मायिय द्वन्द्वों के द्वारा प्रभावान्वित होने के
बिना, अपने मार्ग पर आगे बढ़ते जाते हैं।
सूत्र २४ में योग की प्रक्रिया के द्वारा मनस् एवं प्राण अथवा प्राण एवं अपान को सुषुम्ना-
धाम के अन्तर्वर्ती चिदाकाश में लय करने का भाव अभिव्यक्त किया गया है। इस सम्बन्ध
में सूत्र में उल्लिखित कई पारिभाषिक शब्दों पर यथासम्भव प्रकाश डालना आवश्यक है—
सोमसूर्य—भट्टकल्लट ने अपनी वृत्ति में इन दो शब्दों को, व्याख्या करने के बिना,
अस्पष्ट रूप में ही छोड़ रखा है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने जान-बूझ कर ही ऐसा
किया होगा। आगमशास्त्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार की धारणाओं के आधार पर इस शब्द-युग्म
के भिन्न भिन्न अर्थ लगाये हैं। कहीं इनसे प्रमेयपद और प्रमाणपद का, कहीं प्राण और
अपान का अथवा कहीं शिवकला और जीवकला का अर्थ लिया गया है। शायद भट्टकल्लट
ने भी इसीबात को दृष्टि में रखकर, इस शब्द-युग्म को किसी निश्चित अर्थ की परिधि
में बांधने के बिना साधकों की रुचि पर ही छोड़ दिया है।
आध्यात्मिक विषयों की चर्चा करते समय अत्यन्त सावधानी से काम लेना आवश्यक
है अतः केवल इतना कहा जा सकता है कि प्रस्तुत सूत्र में पूर्व प्रकरण के आधार पर इन दो
शब्दों से 'मनस् एवं प्राण ये ही दो अभिप्राय लेना युक्तिसंगत है। कारण यह कि पूर्ववर्ती
१. चन्द्रसूर्यौ मनःप्राणौ द्वावपि। (स्प० का०, ७६ पृष्ठ)

११०
स्पन्दकारिका
सूत्रों में इस सिद्धान्त की स्थापना की गई है कि सामान्य स्पन्द-शक्ति एक ओर से ज्ञानरूपता
के द्वारा गुणत्रय पर आधारित अन्तःकरण की वृत्तियों (जिनको साधारण रूप में मनस्
या चित्त कहते हैं) और दूसरी ओर क्रियारूपता के द्वारा पाँच स्थूल प्राणों के रूप में,
पाञ्चभौतिक काया में व्याप्त होकर रहती है । कहना न होगा कि अपान स्वयं भी पांच
प्रकार के स्थूल प्राणों में ही अन्तर्भूत हो जाता है । फलतः योगी के लिए, प्राण के साथ मनस्
का भी चिदाकाश में लयीकरण परम आवश्यक है । श्रीयुत क्षेमराज ने अपनी व्याख्या में
इस शब्द-युग्म का अर्थ १ प्राण एवं अपान ही लगाया है ।
सुषुम्ना मार्ग—आगम शास्त्रों में सुषुम्ना नाडी का प्रधान नाम 'मध्यनाडी' रखा
गया है । भट्टकल्लट ने भी अपनी वृत्ति में इसी नाम से इसका उल्लेख किया है । इसके
अतिरिक्त इसको 'ब्रह्मनाडी' भी कहते हैं ।
इस नाडी को 'मध्य' कहे जाने के दो कारण हैं । एक यह कि मूलरूप में यह नाडी
स्वतः संवित्-रूपा ही है और संवित् ही प्रत्येक जड़ अथवा चेतन पदार्थ का 'मध्य' अर्थात्
२अन्तरतम जीवन है । प्रत्येक प्राणी के शरीर में यही नाडी जीवनी शक्ति का मूलस्रोत है ।
पहले भी कहा गया है कि संवित् भगवती ही अवरोहक्रम में सूक्ष्म ३प्राणना का रूप धारण
करके, क्रमशः उत्तरोत्तर स्थूलता को प्राप्त होती हुई, समूचे अस्थिमेदोमय स्थूल शरीरका
और उसमें फैली हुई असंख्य शिराओं के जाल का रूप धारण कर लेती है । ४स्वयं इन
असंख्य नाडियों के जाल के ठीक मध्य में ब्रह्मरन्ध्र से लेकर मूलाधार तक प्रधान प्राणशक्ति-
रूपा सुषुम्नानाडी के रूप से अवस्थित रहती है । शिराजाल के ठीक मध्य में इसका अवस्थित
रहना ही दूसरा कारण है जिसके लिये इसको 'मध्य' की संज्ञा दी गयी है । शिराजाल के
५मध्य में यह ठीक उसीप्रकार ऊपर से नीचे तक अवस्थित रहती है जिस प्रकार पलाश के
पत्ते के ठीक बीचोबीच एक प्रधान शिरा ऊपर से नीचे तक अवस्थित रहती है ।
मध्यनाडी के आकार-प्रकार के विषय में अनुभवी व्यक्तियों का कथन है कि यह नाडी
६मृणाल के तन्तु के समान अत्यन्त सूक्ष्म है । इसके अन्तराल में ७शून्य अवकाश की वर्तमानता
है और उसी को सूत्रकार ने 'महान् व्योम' की संज्ञा के द्वारा अभिव्यक्त किया है । यह अन्त-
१. चन्द्रसूर्यौ अपानः प्राणश्चोभावपि । (स्प० का०, ४२ पृष्ठ)
२. सर्वान्तरतमत्वेन वर्तमानत्वात् ......... संविदेव भगवती मध्यम् । (प्र० हृ०, १७)
३. सा तु मायादशायां .... प्राणशक्तिभूमिं स्वीकृत्य, अवरोहक्रमेण बुद्धिदेहादिभुवम् अधिशयाना
नाडीसहस्रसरणिम् अनुसृता । (प्र० हृ०, १७)
४. तत्रापि च पलाशपर्णमध्यशाखान्यायेन आब्रह्मरन्ध्राद् अधोवक्त्रपर्यन्तं प्राणशक्तिमध्यनाडी-
रूपतया प्राधान्येन स्थिता । (तत्रैव)
५. मध्यनाडी मध्यसंस्था । (वि० भै०, ३५)
६. सूक्ष्मत्वात् मृणालसूत्रतुल्यरूपतया (प्र० हृ०, १७)
मध्यनाड्या मन्तश्चिदात्मकं शून्यमेवास्ति । (तत्रैव)

प्रकाश डाला जा चुका है अतः यहाँ पर फिर से उन्हीं बातों को दोहराना पिष्टपेषण ही

CC-0.In विज्ञानानन्दी एकाग्रता Digitization eGangotri १११
रालवर्ती अवकाश अपरिमित चैतन्यरूप होने के कारण 'चिदाकाश' कहलाता है। इसी महान्
व्योम से १प्राणशक्ति का निकास होता रहता है और प्राणशक्ति पर ही विश्व के सारे चेतन
पदार्थों का जीवन निर्भर रहता है। फलतः मध्यनाडी ही शरीर की प्रधान नाडी है जहां से
शरीर के रोम रोम को चेतना वितीर्ण होती है; २जहाँ से सारी मानसिक वृत्तियां उदित होती
हैं और जिसमें अन्ततोगत्वा लय भी होती हैं।
साधारण जीवभाव की अवस्था में किसी भी जीवधारी को इस नाडी की वर्तमानता
अथवा इसकी मौलिक स्पन्दना का आभास नहीं मिल सकता है। केवल योगीजनो को ही
प्राणाभ्यास की प्रक्रिया के द्वारा इसके महत्त्व की अनुभूति हो पाती है।
ऊर्ध्वं मार्गं—साधारण रूप में इस शब्द का अर्थ उत्कृष्ट-मार्ग है और आगमशास्त्रों
में उत्कृष्ट मार्ग से उदान वायु के मध्यनाडी रूप मार्ग का अभिप्राय लिया जाता है। साधारण
जीवधारियों में, प्राण एवं अपान की प्रवहमानता का मार्ग, मध्यनाडी के बायें और दायें पाश्र्वों
में अवस्थित दो अन्य नाडियां हैं। इस अवस्था में प्राणापान की प्रवहमानता के लिये सुषुम्ना
का मार्ग बिल्कुल बन्द रहता है। योग की प्रक्रिया के द्वारा प्राण एवं अपान का छेदन करने से
अर्थात् दोनों के बहिर्मुखीन संचार को रोक कर दोनों को हृत्-मंडल में ही अवस्थित करने से, ये
उदानवायु का रूप धारण करके, सुषुम्नामार्ग अर्थात् ऊर्ध्वमार्ग से ३ऊर्ध्वसंचार करने लगते हैं।
प्राणापान के ऊर्ध्वसंचार की अवस्था पर पहुँचे हुये योगी के अन्तस् में विद्यमान भेद-भावना
स्वयं ही पिघल कर अभेद-भावना के रूप में उदित हो जाती है क्योंकि प्राणापान का ऊर्ध्व-
संचार तुर्यरूप शाक्तभूमिका का समावेश हो जाने पर ही होने लगता है।
सूत्र २५ में मूढ़ और प्रबुद्ध व्यक्तियों की समाधिकालीन अनुभूति के अन्तर को स्पष्ट
किया गया है। इस सम्बन्ध में पहले ही सूत्र १२ से सूत्र २० तक के विवरणों में पर्याप्त
प्रकाश डाला जा चुका है अतः यहाँ पर फिर से उन्हीं बातों को दोहराना पिष्टपेषण ही
होगा ॥ २३, २४, २५ ॥
इति श्रीकल्लटाचार्यविरचितायां स्पन्दकारिकावृत्तौ 'स्वरूपस्पन्दः'
नाम प्रथमो निःष्यन्दः ॥ १ ॥
श्रीकल्लटाचार्य के द्वारा विरचित स्पन्दकारिका वृत्ति का 'स्वरूपस्पन्द'
नामक पहला निःष्यन्द समाप्त हुआ ॥ १ ॥
१. तस्मात् (शून्यात्) प्राणशक्तिर्निःसरति । (प्र० हृ०, १७)
२. तत एव सर्ववृत्तीनामुदयात् तत्रैव च विश्रामात् । (प्र० हृ०, १७)
३. द्रष्टव्य—ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (३.२.१९-२०)
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

दूसरा निःष्यन्द
'सहजविद्योदय' नामक दूसरा निःष्यन्द
यहाँ तक के प्रकरण में ग्रन्थकार ने अनेक युक्तियों और उपपत्तियों के द्वारा यह तथ्य
निर्धारित किया कि विश्व के कण कण में चैतन्यमयी स्पन्दशक्ति सामान्यरूप में अनुस्यूत है।
योगी लोग पूर्वोक्त विकल्पसंस्कार की प्रक्रिया के द्वारा अपने संवेदन को निर्मल बना कर,
अपने ही हृदयमण्डल में इस शाक्त-भूमिका की अनुभूति प्राप्त करते हैं। फलस्वरूप वे पशुभाव
की संकुचित सीमाओं को लांघ कर असीम विश्वात्मभाव में लय हो जाते हैं।
अब प्रस्तुत प्रकरण के सूत्रों में आध्यात्मिक उपलब्धियों के आधार पर इस रहस्य का
उद्घाटन किया जा रहा है कि विकल्प-संस्कार की प्रक्रिया का निरन्तर अभ्यास करने से प्रबुद्ध
योगियों के हृदयों में 'सहजविद्या' का उदय हो जाता है। शुद्ध विकल्प अथवा अहंविमर्शात्मक
स्वरूप की यथार्थ अनुभूति ही इस 'सहजविद्या' का स्वरूप होता है। निर्मल हृदय में शुद्धविद्या
का प्रकाश फैल जाने से ही योगी को वास्तविक स्वरूप का परिचय प्राप्त होता है। उसको
मन्त्रवीर्य का अनुभव हो जाता है ओर वह प्रबुद्ध अवस्था से निकल कर सुप्रबुद्ध अवस्था में
प्रविष्ट हो जाता है।
[ मन्त्र और मन्त्रवीर्य ]
इस सम्बन्ध में अब सूत्रकार अगले दो सूत्रों में इस तथ्य का प्रतिपादन करते हैं कि
सिद्ध योगियों की वाणी में ऐसे आत्मबल का संचार हो जाता है कि उनके द्वारा उच्चारे गये
मन्त्र कागज के पत्रों पर लिखे हुए साधारण वर्णमात्र न रह कर अमोघ वीर्य बन जाते हैं।
उनमें, योगी की रुचि के अनुसार भोगरूप या मोक्षरूप फलों को प्राप्त करवाने की क्षमता
निश्चित बन जाती है :-
तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनाम् ॥ २६ ॥
तत् बलं निरावरणचिद्रूपमधिष्ठाय, मन्त्राः सर्वज्ञत्वादिना बलेन श्लाघायुक्ताः
प्रवर्तन्ते अनुग्रहादौ स्वाधिकारे। करणानि यथा देहिनाम्, नान्येन आकारादि-
विशेषेण ॥ २६ ॥
तत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः ।
सहाराधकचित्तेन तेन ते शिवधर्मिणः ॥ २७ ॥
तत्रैव स्वस्वभावव्योम्नि निवृत्ताधिकाराः प्रलीयन्ते, शान्तरूपाः, मायाकालुष्य-
रहिताः, सह साधकचित्तेन; अनेन कारणेन शिवसंयोजनास्वभावेन इति शिवात्मका
उच्यन्ते ॥ २७ ॥

सूत्र—(दूसरी ओर) वे मन्त्र शान्तरूप अर्थात् शुद्ध संवित्-रूप और निरञ्जन अर्थात्

मन्त्र और मन्त्रवीर्य ११३
अनुवाद
सूत्र—प्रत्येक प्रकार के मन्त्र उस स्पन्दरूप आत्मबल के साथ तादात्म्य प्राप्त करने
से ही सर्वज्ञता इत्यादि (छः प्रकार के) माहेश्वर ¹बलों को प्राप्त करके शोभित होने लगते
हैं। ऐसी परिस्थिति में वे (मन्त्र) किसी भी मनचाहे कार्य को अधिकार पूर्वक सिद्ध करने के
लिये, उसी प्रकार, सहज ही में प्रवृत्त होते हैं जिस प्रकार शरीरधारियों की इन्द्रियां संकल्प-
मात्र से ही अपने अपने कार्यों को सिद्ध कर देती हैं ॥ २६ ॥
वृत्ति—सारे मन्त्र उस आवरणहीन चिद्रूपता के साथ एकाकार होने से ही सर्वज्ञता
इत्यादि माहेश्वर बलों को प्राप्त करके श्लाघ्य बन जाते हैं और शरीरधारियों की इन्द्रियों
की तरह हो, अपने अनुग्रह इत्यादि अधिकारिता के कामों की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं।
(आत्मबल का स्पर्श प्राप्त करने के बिना) वे किसी दूसरे प्रकार के आकार विशेष अर्थात्
अक्षरों और मात्राओं की (किसी पुस्तकादि में अंकित) विशेष रचनामात्र के द्वारा किसी भी
कार्य को सिद्ध नहीं कर सकते हैं ॥ २६ ॥
सूत्र—(दूसरी ओर) वे मन्त्र शान्तरूप अर्थात् शुद्ध संवित्-रूप और निरञ्जन अर्थात्
मायीय उपराग से रहित होकर, आराधना करने वाले के चित्त के साथ-साथ, चिदाकाश में ही
लीन हो जाते हैं। इस कारण सारे मूलतः शिवधर्मा अर्थात् शिवरूप ही हैं ॥२७॥
वृत्ति—ये ही मन्त्र सांसारिक भोगसिद्धि से निवृत्त होकर और माया के उपराग से
रहित होकर शान्तरूप बन जाने के कारण, साधक के चित्त के साथ ही उस स्वभाव अर्थात्
विशुद्ध चिद्-रूपता या दूसरे शब्दों में सामान्य-स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका के असीम अवकाश में
लीन हो जाते हैं। वास्तव में प्रत्येक प्रकार के मन्त्र का पार्यन्तिक एवं अनौपचारिक स्वभाव
यही है कि वह (पशुभाव में पड़ी हुई) आत्मा को शिवभाव के साथ एकाकार बना लेता है।
इन कारणों से सारे मन्त्रों को शिवात्मक अर्थात् शिवरूप ही कहा जाता है ॥ २७ ॥
विवरण
भोगरूप और मोक्षरूप फलों के आधार पर मन्त्र दो प्रकार के हैं—(१) साञ्जन,
(२) निरञ्जन ।
मन्त्रशक्ति का साञ्जनरूप वह है जिसको सांसारिक भोगरूप फलों को प्राप्त करने
के अभिप्राय से प्रयोग में लाया जाता है। कई साधक, अपने में मन्त्रवीर्य को विकसित करने
के अनन्तर, उसके द्वारा दैनिक जीवव्यवहार के साथ सम्बन्ध रखने वाले कार्यों को सिद्ध करने
लगते हैं। उदाहरणार्थ वे किसी पर अनुग्रह, किसी पर निग्रह, किसी का रोगनिवारण,
किसी का मारण इत्यादि अवरकोटि के लक्ष्यों को पूरा करने में लग जाते हैं। ऐसे मन्त्र
मायीय उपरागों के द्वारा ही रंजित होने के कारण 'साञ्जन-मन्त्र' कहलाते हैं।
१. सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि-बोध, अप्रतिहत-स्वातन्त्र्य, शक्ति का निर्वाध प्रसार, विश्वरूप में
विकसित अनन्त शक्तियों का ऐश्वर्य, ये छः प्रकार के माहेश्वर बल हैं।
८

सूत्रकार के इस उपरलिखित अभिप्राय को अच्छी प्रकार समझने के लिए मन्त्रशक्ति

११४ स्पन्दकारिका
निरञ्जन मन्त्रशक्ति वह है जिसको केवल अपने आप में शिवत्व की अभिव्यक्ति
के लिए ही प्रयोग में लाया जाता है। ऐसे मन्त्रों पर किसी भी प्रकार का मायीय रंग चढ़ा
हुआ नहीं होता है अतः ये 'निरञ्जन-मन्त्र' कहलाते हैं।
यह बात मन्त्रवीर्य के अनुभवी साधकों की रुचि पर निर्भर है कि क्या वे मन्त्रों का
साञ्जन उपयोग करें या निरञ्जन ?
प्रस्तुत दो सूत्रों में ऐसे लोगों का मुखमुद्रण करने का प्रयास किया गया है जिसके
विचार में मन्त्रशक्ति की बातें एक 'ढकोसले' अथवा आज की शब्दावली में 'शोषण' के अति-
रिक्त और कुछ नहीं है। सूत्रकार के विचारानुसार ऐसे लोग मन्त्र और मन्त्रवीर्य का वास्त-
विक रूप समझने में गलती कर रहे हैं। साधारण रूप में 'मन्त्र' शब्द से पुस्तकों के पन्नों में
अंकित अनेक प्रकार की १वर्णरचनाओं का अभिप्राय लिया जाता है परन्तु वह बिल्कुल गलत
है क्योंकि उसमें कोई बल नहीं होता है। वास्तव में मन्त्र उच्चतर-भूमिका पर अवस्थित
उस निर्मल एवं विकल्पहीन २संवेदन को कहते हैं जिसके द्वारा योगियों को अपनी भौतिक
काया में ही छिपी हुई अमोघ और असीम आत्मशक्ति की अनुभूति हो जाती है। फलतः
साधारण से साधारण मन्त्र का उच्चारण भी महान् प्रभावोत्पादक बन सकता है परन्तु यदि
उसके साथ आत्मशक्ति का सहयोग हो, अन्यथा नहीं।
सूत्रकार के इस उपरलिखित अभिप्राय को अच्छी प्रकार समझने के लिए मन्त्रशक्ति
के साथ सम्बन्ध रखने वाली कई निम्नलिखित बातें ध्यान में रखना आवश्यक है।
मन्त्र का स्वरूप — ३मन्त्र शब्द अवबोधनार्थक 'मनु' और पालनार्थक 'तृ' इन दो
धातुओं के संयोग से बना हुआ है। इस आधार पर मन्त्र का सीधा सम्बन्ध कोरी लिपिबद्ध
वर्णरचना से ऊपर उठ कर, आंतरिक संवेदन के साथ जुड़ जाता है क्योंकि मानव में संवे-
दनात्मक शक्ति ही ऐसी है जिसके द्वारा वह सामान्य-स्पन्दात्मक स्वरूप का आन्तररूप में
मनन करने से, अपनी आत्मा को पशुता के संकुचित स्तर से बहुत ऊपर उठाने के रूप में
उसका पालन कर सकता है। शैव शब्दों में संवेदन को 'चित्त' कहते हैं। चित्त के द्वारा
ही साधारण व्यवहार से लेकर परमतत्त्व के स्वरूप तक का विमर्श सम्भव हो सकता है।
पहले यह बात समझाई गई है कि संवेदन, चित्त, मन्त्र और विमर्श इनका स्वरूप आंतरिक
आत्मस्फुरणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है अतः ये सारे शब्द पर्यायवाची होने के कारण
एक ही आत्म-स्पन्दना के द्योतक हैं।
१. लिपिस्थितस्तु यो मन्त्रो निर्वीर्यः सोऽत्र कल्पितः (तं०, ४.६६ में उदाहृत)
२. मन्त्रदेवताविमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्तमेव मन्त्रः, न तु विचित्रवर्ण-
संघट्टनामात्रम् ............। (शिवसूत्रवि०, २.१)
३. 'मनु अवबोधने', 'तृ पालने' इत्येताभ्यां निष्पन्नतया निर्वचनीयत्वेन निर्णीततया उच्यते।
(शिवसूत्र, २.१ की टिप्पणी)

मन्त्र और मन्त्रवीर्य ११५
शैवदार्शनिकों के विचारानुसार विमर्श या आत्मस्पन्दना ही प्रत्येक भाव का 'हृदय
है क्योंकि सारे भाव यहाँ से निकलकर अन्ततोगत्वा इसी में विश्रान्त भी हो जाते हैं। इस
बात का उल्लेख हो चुका है कि अभिनवगुप्ताचार्य जी के कथनानुसार जड़ का हृदय चेतन,
चेतन का हृदय प्रकाश और प्रकाश का हृदय विमर्श है। विमर्शात्मक आत्म-स्फुरणा ही
परमन्त्र है और इसका वास्तविक स्वरूप मात्र 'अहंविमर्श' है।
यहाँ तक यह बात स्पष्ट हो गई कि २'मन्त्र' का वास्तविक स्वरूप 'अहंविमर्श' है।
अब देखना यह है कि विमर्श किस रूप में कार्यनिरत होता है? विमर्श चाहे जिस किसी भी
भूमिका पर अवस्थित हो शब्दना अथवा अभिलाप ही इसका रूप है। शब्दना से रहित
विमर्श के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। उच्चतम भूमिका पर अवस्थित
विमर्शात्मक शब्दना को शास्त्रीय शब्दों में 'परा-वाणी' कहते हैं। यह परा-वाणी अथवा
आन्तर-शब्दना एक ऐसी मात्र स्पन्दनामयी शब्दना है जिसमें अनन्त एवं अतर्क्य स्थूल वाचक
और वाच्यरूप शब्दराशि, मोर के अण्डरस के न्याय से, केवल स्फुरणा के रूप में ही अवस्थित
है। इस भूमिका पर अवस्थित शब्दना में कोई स्थूल वाच्यवाचकरूप विभाग न होने के कारण
यह 'बीजरूप' अर्थात् 'अहंरूप' ही है। सारे मन्त्र मूलतः 'परा-वाणी' रूप ही हैं।
'परा-वाणी' के विषय में पहले भी इस बात का उल्लेख किया जा चुका है कि यही
वह सामान्य स्पन्दना है जिसका स्वरूप अगतिमय गति है और जो अचल आत्मा में ३चलता
का आभास करा देती है। यह चलता ही परमेश्वर की ज्ञानक्रियात्मक विमर्शना है।
परा-शब्दना बहिर्मुख प्रसार की प्रक्रिया में पश्यन्ती और मध्यमा अवस्थाओं में से
प्रसृत होती हुई और उत्तरोत्तर स्थूल होती हुई, वैखरी वाणी का रूप धारण करके, ४'अ'
से 'क्ष' तक मातृका या 'न' से 'फ' तक मालिनी के रूप में विकसित होती है। इस दृष्टि
से यदि देखा जाये तो अनेक शास्त्रों में लिखे गये केवल विशिष्ट वर्ण-रचनात्मक मंत्र ही नहीं
१. हृदयं च नाम प्रतिष्ठास्थानमुच्यते, तच्च उक्तनीत्या जडानां चेतनम्, तस्यापि प्रकाशा-
त्मकत्वम्, तस्यापि विमर्शशक्तिः-इति विश्वस्य परमे पदे तिष्ठतो विश्रान्तस्य इदमेव
हृदयं विमर्शरूपं परमन्त्रात्मकं यत्र-तत्र अभिधीयते । (ई० प्र० वि, १.५.१४)
२. मन्त्रश्च विमर्शनात्मा (ई० प्र० वि, १.५.१४)
३. एषैव च किञ्चिद्रूपता यत् अचलमपि चलमाभासते । (ई० प्र० वि०, १.५.१४) -
४. संस्कृत वर्णमाला का 'अ'से 'क्ष' तक का क्रम आज भी प्रचलित है। इस क्रम को शास्त्रीय
शब्दों में 'मातृका' या 'पूर्वमालिनी' कहते हैं। स्वच्छन्दतन्त्र में इसी क्रम को स्वीकारा
गया है। इसके प्रतिकूल मालिनी-विजयोत्तरतन्त्र में वर्णमाला को 'न' से 'फ' तक के दूसरे
क्रम में भी रखा गया है। इसका शास्त्रीय नाम 'मालिनी' है। यह क्रम इस प्रकार है-
न, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, थ, च, ध, ई, ण, उ, ऊ, ब, क, ख, ग, घ, ङ, इ, अ, व, भ,
य, ड़, ढ़, ठ ज्ञ, ण, ज, र, ट, प, छ, ल, आ, स, अः, ह, ष, क्ष, म, श, अं, त,
ए, ऐ, ओ, औ, द, फ।
(ये कुल पचास अक्षर हैं)

·११६ स्पन्दकारिका
प्रत्युत प्रत्येक शब्द, वर्ण, मात्रा अर्थात् मुख से उच्चारण की जाने वाली प्रत्येक ध्वनि 'मन्त्र'
कहलाती है। इन वैखरी रूप स्थूल ध्वनियों की पृष्ठभूमि में भी वह आन्तर-विमर्श ही कार्य-
निरत होता है। यही कारण है कि साधारण सांसारिक आदान-प्रदानों में भी मुख से उच्चा-
रित ध्वनियां विचित्र प्रकार के प्रवाहों को उत्पन्न कर सकती हैं। स्पष्ट है कि जब स्पन्दशक्ति
का ही विकासमात्र होने के कारण साधारण से साधारण वर्ण भी कभी कभी कल्पनातीत
हलचल को पैदा करने की क्षमता रखता है तो मन्त्र में ऐसी शक्ति क्योंकर नहीं हो सकती
है ? १वास्तव में सारे वर्ण पररूप अर्थात् शिवरूप और उनसे बने मन्त्र शक्तिरूप हैं।
तन्त्रशास्त्रों में अनेक प्रकार के मन्त्रों का उल्लेख मिलता है। साथ ही वहाँ पर, उनसे
विशेष प्रकार के प्रभावों को उत्पन्न करने के लिये, उनके उच्चारणों और जपों की विशेष
परिपाटियों और तदनुकूल विशेष वातावरणों एवं देश-कालों का लेखा-जोखा भी प्रस्तुत किया
गया है। अनुभवी गुरुओं का कथन है कि यदि शास्त्रों में वर्णित नियमों का शत-प्रतिशत
पालन करते हुये, मन्त्रों का अभ्यास किया जाये तो वे अवश्य मनचाहे प्रभावों को उत्पन्न कर
लेते हैं। शर्त केवल इतनी है कि साधक को मन्त्रशक्ति का प्रयोग करने से पहले आत्मशक्ति
की अनुभूति हुई होनी चाहिये।
गुरुओं का कथन है कि २मन्त्रों में स्पन्दात्मक बल स्वभाव से ही अन्तर्निहित है।
कसर इस बात की है कि पशुओं के चित्त की निर्मलता पर कुत्सित विकल्पों की काई जमी होती
है अतः उनको अपनी ही शक्ति का परिचय नहीं होता है। आत्मबल की विस्मृति की
अवस्था में मन्त्र का वीर्यहीन होना स्वाभाविक है और बार बार उच्चारण करने पर भी
पतझड़ की मेघमाला के समान, उससे कोई अभीष्ट फल प्राप्त नहीं हो सकता है।
योगियों को मन्त्रशक्ति का अनुभव स्वरूप की स्पन्दमयता का निरन्तर ३अनुसन्धान
करने के भगीरथ प्रयत्न से होता है, अन्यथा नहीं। वास्तव में स्वरूप का विकास ही
४मंत्रशक्ति का विकास समझना चाहिये। आन्तर अनुसन्धान के परिपक्व हो जाने पर मन्त्र
के उच्चारणमात्र से ही अभीष्ट परिणाम प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि ऐसी अवस्था में मन्त्रशक्ति
५स्वात्मरूप में ही स्फुरित होती है।
आन्तर अनुसन्धान की क्षमता प्राप्त करने के लिये सबसे पहले अपने चित्त को
निर्मल बनाना एक मौलिक आवश्यकता है क्योंकि निर्मल चित्त में ही स्वरूप का प्रकाशपुञ्ज
१. सर्वे वर्णात्मिका मन्त्रास्ते च शक्त्यात्मकाः प्रिये।
(तं० स०, शि० सूत्र २.३ में उदाहृत)
२. मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरन्वया।
तया हीना वरारोहे । निष्फलाः शरदभ्रवत् ॥
(तं० स०, शि० सू० २. १ में उदाहृत)
३. तस्यानुसन्धानम्.......मन्त्रवीर्यस्यानुभवः । (शिवसूत्रवि०, १. २२)
४. शक्तिः मन्त्रवीर्यस्फाररूपा । (शिवसूत्र, २. १ उपक्रमणिका)
५. स्वात्मरूपतया स्फुरणं भवति । (शिवसूत्रवि०, १. २२)

मन्त्र और मन्त्रवीर्य ११७
अखण्डरूप में प्रतिबिम्बित हो जाता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने लिये पूर्वोक्त
'विकल्पसंस्कार' की युक्ति ही सरलतम हो उपाय है क्योंकि इसमें अन्य उपायों के लिये आवश्यक
दुरूह शास्त्रीय विधि-विधानों का पालन करने की माथापच्ची का टंटा नहीं होता है। पहले
भी कहा गया है कि उत्सुक व्यक्ति दैनिक आदान-प्रदान करता हुआ भी, अपने मानसिक
संतुलन पर दृढ नियन्त्रण रखकर, धीरे धीरे सद्धिमर्श के द्वारा चित्त से कुत्सित विकल्पों का
बहिष्कार कर सकता है। विकल्पों का संस्कार करने से भावनायें निर्मल हो जाती हैं और
परिणामतः मनमें स्वयं ही शुद्धविद्या का उदय हो जाता है। सावक को, मन में शुद्धविद्या के
स्वर्णिम आलोक का उदय होते ही, मन्त्रशक्ति की अनुभूति हो जाती है।
इस सम्बन्ध में भगवान् १अभिनवगुप्त ने अपने ग्रन्थ तन्त्रालोक में भावनाओं की
स्वच्छता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। उन्होंने इस महान् ग्रंथ में एक स्थान पर श्री-मालिनी-
विजय के प्रमाणवाक्य को उद्धृत करके 'तदाक्रम्य' इत्यादि प्रस्तुत सूत्रों का यही अभिप्राय
निकाला है कि आत्मोद्धार करने के दुर्गम मार्ग को पार करने के लिये भावनाओं की निर्मलता
से बढ़कर और कोई भी सहायक सामग्री उपयुक्त नहीं बन सकती है। फलतः मन्त्रवीर्य की
अनुभूति प्राप्त करने का सरलतम और प्रभावोत्पादक उपाय 'विकल्प संस्कार' ही है।
अभी ऊपर जिस शुद्धविद्या का उल्लेख किया गया है उसके सम्बन्ध में यहाँ पर थोड़ा
सा स्पष्टीकरण आवश्यक है। छत्तीस तत्त्वों में ईश्वरतत्त्व से नीचे और मायातत्त्व से ऊपर
एक अन्तरालवर्ती तत्त्व है। उसको 'शुद्धविद्या-तत्त्व' कहते हैं। प्रस्तुत प्रकरण में शुद्धविद्या
शब्द से उसका अभिप्राय नहीं है, अपितु यहाँ पर यह शब्द उसी पूर्वोक्त शुद्धविमर्श का
द्योतक है जिसके उदय में आते ही योगी के हृदय में सर्वज्ञता, सर्वकर्तृता इत्यादि छः माहेश्वर
धर्म स्वयं ही निखर उठते हैं। शैवशास्त्रियों ने, प्रस्तुत २'विद्या' शब्द की व्युत्पत्ति लाभार्थक
'विद्लृ' धातु, विचारार्थक 'विद्' धातु और ज्ञानार्थक 'विद्' धातु इन तीन धातुओं से मानकर,
इसका निर्वचन निम्नलिखित तीन प्रकार से किया है।
१. विद्या (लाभार्थक 'विद्लृ' धातु)—विमर्श की वह उच्चत्तम भूमिका जिसके
विकसित हो जाने पर, योगी को सर्वज्ञता इत्यादि शिवधर्मों का लाभ सहज ही में हो
जाता है।
१. नियतिप्राणतायोगात् सामग्रीतस्तु यद्यपि।
सिद्धयो भाववैमल्यं तथापि निखिलोत्तम् ॥
उक्तं श्रीसारशास्त्रे च निर्विकल्पो हि सिद्ध्यति ।
क्लिश्यन्ते सविकल्पास्तु कल्पोक्तेऽपि कृते सति ॥
'तदाक्रम्य बलं मन्त्रा'—'अयमेवोदयः स्फुटः' ।
इत्यादिभिः स्पन्दवाक्यैरैतदेव निरूपितम् ॥—(तं०, ३.११०-१४)
२. द्रष्टव्य—स्वच्छन्दोद्योत (४. ३९५-९६)

११८ स्पन्दकारिका
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२. विद्या (विचारार्थक 'विद्' धातु)—विमर्श की वह उच्चतम भूमिका जिसके विकसित
हो जाने पर, योगी में अकस्मात् यह विचार उत्पन्न हो जाता है कि मैं अनादिधर्मा हूँ अर्थात्
स्वातन्त्र्यशक्ति ही मेरा वास्तविक स्वभाव है।
३. विद्या (ज्ञानार्थक 'विद्' धातु)—योगिसंवेदन की वह अवस्था जिस पर पहुँचकर
योगी को, स्वयं ऐसा ज्ञान हो जाता है कि वास्तव में मैं स्वयं ही शक्ति-केन्द्र शिव हूँ और
यह समूचा विश्व मेरे ही स्वरूप की स्पन्दनामात्र है।
संवेदन की ऐसी तीव्र अवस्था को शास्त्रीय शब्दों में 'उन्मना' अवस्था भी
कहते हैं।
फलतः सूत्रकार के मन्तव्य का निष्कर्ष यह कि योगी का संवेदन जब इतना परिपक्व
हो जाता है कि मन्त्र का उच्चारण करते ही उसके चित्त, मन्त्र और मन्त्रदेवता की सघन
संवेदनात्मक एकाकारता हो जाती है तब मन्त्र, लिखित वर्णों की विशेष रचनामात्र न रह
कर, एक ऐसी अमोघ शक्ति बन जाता है कि उससे कोई भी अभीष्ट फल अवश्य प्राप्त किया
जा सकता है ॥२६-२७॥
[ आत्मसत्ता और संवेद्यविषय ]
अगले तीन सूत्रों में यह समझाया जा रहा है कि वेदकरूप आत्मसत्ता की व्यापकता
केवल मन्त्रसमुदाय तक ही सीमित नहीं, प्रत्युत सारा वेद्यवेदक संक्षोभ ही स्वरूप का विकास
है। फलतः जब भगवान् शिव सर्वमय है तो उसी का पशुरूप जीव भी वास्तव में सर्वमय ही
है। योगी लोग अपने विशुद्ध संवेदन के द्वारा इस बात की अनुभूति प्राप्त करके जीवनमुक्त
बन जाते हैं :—
यस्मात् सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवात् ।
तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः ॥२८॥
सर्वात्मक एवायमात्मा सर्वानुभावोत्पत्तिद्वारेण अनुभूयमानस्यैव संवेदनात्
बाह्यार्थमनुभूयमानमेव शरीरत्वेन गृह्णाति, न तु शिरःपाण्यादिलक्षितम् एकमेवास्य
शरीरम् ॥२८॥
तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः ।
भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥२९॥
तेन तथाविधेन सर्वात्मकेन स्वभावेन, शब्दार्थयोः चिन्तासु न सा अवस्था या
शिवस्वभावं न व्यञ्जयति, अतो भोक्तैव हि भोग्यभावेन सर्वत्रावस्थितो, न त्वन्यत्
भोग्यमस्ति ॥२९॥
इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ।
स पश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥३०॥
एवंस्वभावं यस्य चित्तं, यथा—'मन्मयमेव जगत् सर्वम् इति', स सर्वं क्रीडा-
त्वेन पश्यन् नित्ययुक्तत्वात् जीवन्नेव ईश्वरवत् मुक्तो, न त्वस्य शरीरादि बन्धकत्वेन
वर्तते ॥३०॥

सूत्र- जीव (पशुप्रमाता) सर्वमय ही है क्योंकि यह भी (पतिप्रमाता की तरह) संसार

आत्मसत्ता और संवेद्य विषय ११६
अनुवाद
सूत्र- जीव (पशुप्रमाता) सर्वमय ही है क्योंकि यह भी (पतिप्रमाता की तरह) संसार
के सारे (घट, सुख इत्यादि) भावों के साथ संवेदनात्मक तादात्म्य प्राप्त करके उनकी १सर्जना
करता रहता है ॥ २८ ॥
वृत्ति- यह जीवात्मा सर्वमय है क्योंकि यह निजी संवेदन के द्वारा संसार के प्रत्येक
भाव की सर्जना करता रहता है। जो ही पदार्थ अनुभव में आता है वही संवेदन का विषय बन
जाता है। यह (जीवात्मा) किसी भी बाह्य पदार्थ का अनुभव करने के बाद तत्काल ही, उसको
अपने शरीर के रूप में ग्रहण कर लेता है। अतः इसका वही एक शरीर नहीं होता है जिसके
साथ सिर, पैर इत्यादि अंगों के चिह्न लगे हुये हों ॥ २८ ॥
सूत्र- अतः सारे वाचक और वाच्यरूप पदार्थों की संवेदनाओं की कोई भी ऐसी
अवस्था नहीं जो शिवरूप नहीं है। वास्तविक स्थिति यह कि प्रत्येक स्थान पर भोक्ता (आत्मा)
ही भोग्य (प्रमेय) पदार्थों के रूप में उल्लसित होकर शाश्वतरूप में वर्तमान है ॥ २९ ॥
वृत्ति- आत्मा का वैसा सर्वमय स्वभाव होने के कारण, शब्दों और अर्थों की संवे-
दनाओं की कोई भी ऐसी अवस्था नहीं जो शिवमम स्वभाव को अभिव्यक्त करने वाली नहीं
है। अतः वस्तुस्थिति यही है कि प्रत्येक स्थान पर भोक्ता (वेदक सत्ता) ही भोग्य पदार्थों
(वेद्यसत्ता) के रूप में आभासमान है। भोग्य पदार्थ चेतन भोक्ता से इतर नहीं हैं ॥ २९ ॥
सूत्र- जिस योगी के संवेदन का ऐसा रूप विकास में आया हो, वह सारे विश्व को
केवल अपनी खिलकौरी के रूप में देखता हुआ, नित्ययुक्त (स्वरूप के साथ तन्मय) हो जाता
है। अतः इस बात में कोई संशय नहीं कि वही पुरुष जीवन्मुक्त है ॥ ३० ॥
वृत्ति- जिस योगी के चित्त का ऐसा स्वभाव विकास में आया हो कि 'यह समूचा
विश्व मेरा ही स्वरूप है', वह समूचे प्रमेयविश्व को अपने खिलौने के रूप में देखता हुआ,
२नित्ययुक्त होने के कारण, पाञ्चभौतिक काया में रहता हुआ भी ईश्वर की तरह मुक्त है।
ऐसे व्यक्ति के लिये शरीर इत्यादि की वर्तमानता बन्धक के रूप में नहीं होती है ॥ ३० ॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्रों में आत्मसत्ता की वास्तविक सर्वमयता का मन्तव्य प्रस्तुत किया गया है।
इस मन्तव्य के अनुसार संसारी जीव भी वैसा ही विश्वशरीरी है जैसा कि स्वयं भगवान् शिव
है। जिसप्रकार भगवान् अपनी नित्यस्पन्दमयी विमर्शशक्ति के द्वारा अनन्त प्रकार के वेदकों
और वेद्योँ से परिपूर्ण विश्व को सत्ता देकर, उसको अपने शरीर के रूप में धारण करके अव-
स्थित है, उसी प्रकार जीव भी पग पग पर अपने संवेदन के द्वारा प्रत्येक प्रकार के भूतात्मक
या भावात्मक पदार्थों को सत्ता देकर, उनको अपने शरीर के रूप में ग्रहण करता हुआ अव-
१. स्पन्दशास्त्र में 'सृष्टि' शब्द से सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान और अनुग्रह इन पाँचों
कृत्यों का अभिप्राय लिया जाता है।
२. प्रतिसमय स्वरूपसत्ता के साथ आंतरिक रूप में जुड़ा हुआ।

१२० स्पन्दकारिका
स्थित रहता है। आत्मसत्ता चाहे शिवभाव पर अवस्थित हो या पशुभाव पर, स्वभावतः
वेदक सत्ता है क्योंकि ज्ञान-क्रियामयी स्पन्दना ही इसका मात्र स्वरूप है। सारे वेद्य पदार्थों
का अस्तित्व या अनस्तित्व मौलिक वेदक-सत्ता पर ही निर्भर है क्योंकि वही चेतन होने के
कारण अपने स्वतन्त्र संवेदन के द्वारा उनको १ सत्ता प्रदान करती है। फलतः विशेष आकार-
प्रकार वाला और सिर पैर इत्यादि अङ्गों की सहकारिता से उपलक्षित, पाञ्चभौतिक शरीर
ही जीवात्मा का मात्र २ शरीर नहीं होता है अपितु उससे इतर जिन जिन पदार्थों के साथ
उसकी संवेदनात्मक एकाकारता होती रहती है, उन उन में संवेदन के ही रूप में अनुप्रविष्ट
होकर, उनको अपना शरीर बनाता रहता है। अतः इस दृष्टिकोण की पृष्ठभूमि पर यदि
दृढ़ अनुसंधान किया जाये तो स्वयं यह तथ्य अनुभव में आ जाता है कि जीवात्मा भी वास्तव
में विश्वशरीरी (सर्वमय) है।
संसार के सारे संवेद्य विषय, जिनको जीवात्मा संवेदन के द्वारा शरीर रूप में स्वीकारता
या नकारता रहता है, दो प्रकार के हैं—'भूतात्मक विषय' और 'भावात्मक विषय'। इनकी
परिभाषा इस प्रकार है—
१. भूतात्मक विषय—वे विषय, जो पाँच महाभूतों के मिश्रण से बने हुए, विचित्र एवं
अनेक आकार-प्रकारों वाले, बाह्य इन्द्रियों से ग्राह्य, निश्चत सिर, पैर, हाथ इत्यादि अङ्गों से
युक्त और स्थूल हैं। इनमें प्रत्येक प्रकार के स्थूल शरीर अन्तर्भूत हो जाते हैं।
२. भावात्मक विषय—वे विषय, जिनका कोई अङ्गों और उपाङ्गों वाला और
स्थूल आकार-प्रकार वाला मूर्त शरीर नहीं है और केवल संवेदनात्मक अनुभूति से ही
गम्य हैं, इनमें सुख, दुःख, धर्म, अधर्म इत्यादि अनन्त प्रकार के विषय अन्तर्भूत हो
जाते हैं।
इसके अतिरिक्त संवेद्य विषयों के और भी दो रूप होते हैं 'भावरूप विषय' और
'अभावरूप विषय'।
भावरूप विषय—वे विषय, जिनका संसार में भावरूप में अस्तित्व विद्यमान है जैसे
घट, पट, सुख, दुःख, इत्यादि।
अभावरूप विषय—वे विषय, जिसका अस्तित्व तो है परन्तु अभावरूप में जैसे—
आकाशपुष्प, खरगोश के सींग, बांझ का बेटा, साप के कान इत्यादि।
ऊपर की यह विभागकल्पना मात्र औपचारिक है क्योंकि संवेदन में प्रत्येक प्रकार के
विषय की स्थिति में कोई अन्तर नहीं है। संवेदन में मूर्त घट की जैसी अनुभूति होती है वैसी
ही अमूर्त सुख-दुःखादि की भी। दूसरी बात यह है कि संवेदन में प्रत्येक प्रकार के विषय की
१. यावन्न वेदका एते तावद्वेद्याः कथं प्रिये ।
वेदकं वेद्यमेकं तु...................॥
(उ० भै०, शिवसूत्र १.१ में उदाहृत)
२. एवञ्च यद् यदयं जीवः संवेत्ति तत्तदस्य शरीरमेव संपद्यते, न तु नियतशिरःपाण्याद्यव-
यवसंनिवेश एव । (स्प० का० वि०, ३.३)

मन्त्रदेवता और चित्त १२१
CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri
अनुभूति हमेशा भावरूप में ही होती है, अभावरूप में नहीं। उदाहरणार्थ संवेदन में आकाशपुष्प
इत्यादि अभावरूप पदर्थों का अस्तित्व भी घट-पट इत्यादि भावरूप पदार्थों का जैसा ही होता
है। वास्तव में यह बात निर्विवाद है कि संवेदन में जो कुछ है उसी का अस्तित्व है, अन्य का
नहीं।
१जीवात्मा को जिस समय किसी विषय की ओर संवेदनात्मक उन्मुखता हो जाती है
उस संवेद्यमानता के समय में वही विषय उसका शरीर बन जाता है क्योंकि उस समय संवेदन
तद्-रूप ही बन जाता है। वास्तव में संवेद्यमानता२ शब्द का अभिप्रायः ही यह है कि उस
समय संवेदन उसी विषय के रूप में प्रकाशमान होने लगता है।
संवेद्यमानता के किसी विषय को शरीर के रूप में ग्रहण करने का ही अर्थ यह है कि
उस समय जीवात्मा स्वतन्त्र संवेदन के द्वारा उस विषय को सत्ता देकर उसकी सृष्टि करता
है। दूसरे ही क्षण किसी दूसरे विषय की ओर संवेदनात्मक उन्मुखता हो जाने पर पहले विषय
का संहार और दूसरे की सृष्टि का कार्य सम्पन्न हो जाता है। इस प्रकार जीवात्मा भी
विश्वात्मा की तरह ही क्षण क्षण अन्यान्य शरीरों को स्वीकारता या नकारता हुआ, उनकी
सृष्टि और संहार३ आदि करता रहता है।
वस्तुस्थिति तो यही है, जिसका ऊपर उल्लेख किया जा चुका है। परन्तु शोक इस
बात का है कि पशुभाव के कारागार का बन्दी अपनी पाञ्चभौतिक काया की दृढ प्राचीरों के
बाहर भी फैले हुये अपने रूपविस्तार को देखता हुआ भी देख नहीं पाता है। यही शक्ति-
दरिद्रता की विडम्बना है ।।२८-२९-३०।।
[ अन्त्रदेवता और चित्त ]
अगले दो सूत्रों में यह समझाया जा रहा है कि आत्मसत्ता की ऐसी ही पूर्वोक्त व्यापकता
का बार बार अनुसन्धान करने से योगी का संवेदन इतना तीव्र हो जाता है कि मन्त्र का
उच्चारण करने से तत्काल ही उसका चित्त मन्त्र के देवता के साथ एकाकार हो जाता है। यह
तीव्र एकाग्रता ही उसको अन्ततोगत्वा शिवभाव पर पहुँचा देती है—
अयमेवोदयस्तस्य ध्येयस्य ध्यायिचेतसि ।
तदात्मतासमापत्तिरिच्छतः साधकस्य या ॥३१॥
तत्संवेदनद्वारेण यः तदात्मग्रहो मन्त्रन्यासात्मकः स एवोदयः तस्य ध्येयस्य
मन्त्रात्मनः साधकचेतसि, तादात्म्यं तत्स्वभावत्वप्राप्तिः मन्त्रदेवतया सह साधकस्य
मन्त्रोच्चारणेच्छया संपादिता ।।३१।।
१. एवञ्च...............संवेद्यमानतावस्थायामेव शरीरी भवति ।
( स्प० का० वि०, ३.३ )
२. संवेद्यमानता च तेन तेन रूपेण प्रकाशमानता (तत्रैव)।
३. शेष तीन कृत्यों की प्रक्रिया को समझने के लिये विशेषरूप से द्रष्टव्य—'स्पन्दसंदोह'
क्षेमराजाचार्यकृत ।
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

सूत्र—ध्यान करने वाले (योगी) के चित्त में, ध्येय (ध्यान का विषय बने हुये देवता)

१२२ स्पन्दकारिका
इयमेवामृतप्राप्तिरयमेवात्मनो ग्रहः ।
इयं निर्वाणदीक्षा च शिवसद्भावदायिनी ॥३२॥
इयमेव सा मिथ्याज्ञानशून्यस्य साधकस्य निरावरणस्वस्वरूपसंवित्तिः अमृतत्व-
प्राप्तिः न तु रसास्वादरूपस्य धातुसारस्य स्थूलस्यास्वादनम् अमृतप्राप्तिरुक्ता, यैव मन्त्रो-
च्चारणमात्रेणैव मन्त्रस्वरूपावस्थिति प्राप्तिः सैवात्मनो ग्रहणमित्युक्ता । यस्मात् 'आत्मनो
ग्रहणं कुर्याद्दीक्षाकाले गुरुर्धिया' इति । न पुनर्लोष्टादिवत् हस्तेन तस्यामूर्तस्य ग्रहणं
भवति, अत एव चेयमेव सा निर्वाणदीक्षा शिवसद्भावदायिनी, परमशिवस्वरूपाभिव्य-
ञ्जिका ॥३२॥
अनुवाद
सूत्र—ध्यान करने वाले (योगी) के चित्त में, ध्येय (ध्यान का विषय बने हुये देवता)
का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होना इसी को कहते हैं कि उसके चित्त की (मन्त्र का उच्चारण करने
की) इच्छा होने के तत्काल ही उसके साथ (देवता के साथ) तादात्म्य हो जाता है ॥३१॥
वृत्ति—संवेदन के द्वारा जो उस ध्येय अर्थात् मन्त्रस्वरूप अथवा मन्त्र के द्वारा ध्येय
देवता का, मन्त्रात्मक या न्यासात्मक अर्थात् मन्त्र पढ़ने या न्यास करने के साथ ही, आत्मरूप
में ग्रहण अर्थात् तादात्म्य हो जाता है, उसी को साधक के चित्त में उस देवता का उदय होना
अर्थात् प्रत्यक्ष साक्षात्कार होना कहते हैं। तादात्म्य हो जाने का अभिप्राय यह है कि साधक
उस देवता के स्वभाव को ही प्राप्त कर लेता है। साधक का उस मन्त्रदेवता के साथ
ऐसा तादात्म्य मन्त्र का उच्चारण करने की इच्छामात्र से ही सम्पन्न हो जाता है ॥३१॥
सूत्र—यही अमृत को प्राप्त करना होता है; इसी को आत्मा का ग्रहण१ कहते हैं,
यही वास्तविक निर्वाण-दीक्षा होती है और यही (साधक को) शिवभाव की प्राप्ति करवा
लेती है ॥३२॥
वृत्ति—ज्ञानी होने की ढोंगबाजी से रहित योगी का ऐसा आवरणहीन और निर्मल
स्वात्मसंवेदन ही उसके लिये वास्तव में अमृतत्व अर्थात् अविनश्वर शिवभाव को प्राप्त करना
होता है। इसके प्रतिकूल किसी स्थूल और २धातुओं के संमिश्रण से बनाये गये, शरीर के
अन्तर्वर्ती धातुओं को पुष्टि देने वाले और स्वादिष्ट (केवल जीभ को मीठा लगने वाले)
३रस का आस्वाद लेना अमृतत्व को प्राप्त करना नहीं होता है। (साधनामार्ग में) आत्मग्रह
१. शांभव और शाक्त उपायों के अधिकारी योगियों के लिए 'आत्मग्रह' आत्मज्ञान या
स्वरूपविकास होता है और आणव उपाय पर अवस्थित अवर अधिकारियों के लिये इस
शब्द का अर्थ 'मानसिक-निग्रह' होता है।
२. यहाँ पर 'धातुओं' से वैद्यक के अनुसार धातुओं को फूँक कर बनाये गये भस्मों का
अभिप्राय है।
३. वैद्यक के अनुसार धातुओं के भस्मों को मिलाकर बनाई गई स्वादिष्ट एवं पौष्टिक
औषधियों को रस कहते हैं। यद्यपि वैद्यक में कहा गया है कि रस मनुष्य को अमर बना
लेते हैं तथापि वह तो दीर्घायु को सूचित करने के लिये केवल एक औपचारिक प्रयोग है।

सूत्र संख्या ३१ में मन्त्र देवता का ध्यान करने वाले साधक के चित्त में उस देवता

मन्त्रदेवता और चित्त १२३
अर्थात् आत्मा की अनुभूति प्राप्त करना ऐसी स्थिति को कहते हैं जब मन्त्र का उच्चारणमात्र
करने से ही मन्त्रस्वरूप में अवस्थिति अर्थात् मन्त्रदेवता के साथ स्वरूपतादात्म्य की स्थिति
प्राप्त होती है, क्योंकि :-
'दीक्षा के समय गुरु आत्मा का ग्रहण करे अर्थात् अन्तर्विमर्श के द्वारा, शिष्य
को दिये जाने वाले मन्त्र की देवता के स्वरूप में स्वयं अवस्थित रहे।' ऐसा कहा
गया है।
निराकार आत्मा को मिट्टी के ढेले या दूसरे किसी स्थूल पदार्थ की तरह (हाथ से)
पकड़ा नहीं जाता है। इस कारण से यह आत्म-अनुभूति ही वास्तविक 'निर्वाण-दीक्षा'
होती है जो कि (साधक के अन्तर में ही) अनुत्तर शिवभाव को अभिव्यक्त कर
देती है ॥३२॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्रों का भाव अच्छी प्रकार समझने के लिये निम्नलिखित बातें ध्यान में
रखना परम आवश्यक है—
सूत्र संख्या ३१ में मन्त्र देवता का ध्यान करने वाले साधक के चित्त में उस देवता
के उदय होने की अथवा दूसरे शब्दों में उसका साक्षात्कार होने की चर्चा की गई है। इस
सम्बन्ध में यह बात उल्लेखनीय है कि विकल्प-संस्कार के उपाय से योगी के संवेदन की
विशुद्धता और एकाग्रता इतनी तीव्र हो जाती है कि वह इन्द्रियों के द्वारों से बाहर की ओर
स्पन्दित होती हुई संवित् की धारा को पूर्वोक्त अलंग्रास की युक्ति से अन्तर्हृदय के अवकाश
में केन्द्रित कर सकता है। ऐसी अवस्था में उसको किसी भी मन्त्र का विमर्श करने के बाद
तत्काल ही उस मन्त्रदेवता के साथ चित्त की एकाकारता हो जाती है। साधना के क्षेत्र में
इसी को मन्त्रदेवता का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होना कहा जाता है। यह साक्षात्कार बिल्कुल
संवेदनात्मक होता है क्योंकि देवता, स्वरूप से व्यतिरिक्त और किसी विशेष कायिक आकार-
प्रकार को धारण करके सामने नहीं आता है। स्मरण रहे कि यह शाक्त-उपाय की उच्चतर
भूमिका है और इसपर परमेश्वर के तीव्र शक्तिपात से पवित्र बने हुए अन्तःकरणों वाले कुछ
इने गिने व्यक्ति ही पहुँच सकते हैं। भगवान् अभिनवगुप्त ने ऐसे सौभाग्यशाली साधकों की
महत्ता का वर्णन करते हुए कहा है कि—"जिस प्रकार १केतकीपुष्प के सौरभ का रसिक
भौंरा ही होता है, मक्खी नहीं, उसी प्रकार किसी विरले ही व्यक्ति के मन में भैरवीय
अभेदभूमिका को प्राप्त करने के प्रति अतिशय रुचि होती है। ऐसे रुचिसम्पन्न योगी के लिये
२संसार का आडम्बर स्वयं ही उसी प्रकार गलता जाता है जिस प्रकार ग्रीष्म की चिलचिलाती
धूप में सुदृढ़ हिमानियां स्वयं ही गलकर बह जाती हैं।
१. केतकीकुसुमसौरभे भृशं भृङ्ग एव रसिको न मक्षिका ।
भैरवीयपरमाद्वयार्चने कोऽपि रज्यति महेशचोदितः ।। (तं०, ४. २७६)
२. अस्मिंश्च यागे विश्रान्तिं कुर्वतां भवडम्बरः ।
हिमानीव महाग्रीष्मे स्वयमेव विलीयते ।। (तत्रैव, ४.२७७)

सूत्र संख्या ३२ में 'निर्वाण दीक्षा' का उल्लेख किया गया है । इस सम्बन्ध में

१२४ स्पन्दकारिका
इसके अतिरिक्त भट्टकल्लट ने इसी सूत्र में उल्लिखित 'इच्छतः' शब्द का अर्थ मन्त्र
का उच्चारण करने की इच्छा लगाया है । इस सम्बन्ध में यह समझना आवश्यक है कि किसी
भी शब्द का उच्चारण करते समय उच्चारण की दो स्थितियाँ सक्रिय होती हैं । एक अव्यक्त
ध्वनिरूपा आन्तरिक विमर्शमयी और दूसरी उसकी अनुगामिनी व्यक्त ध्वनिरूपा बाह्य
वैखरीमयी स्थिति । इनमें से पहली विमर्शमयी स्थिति मूलभूत इच्छारूपा स्थिति होती है ।
यद्यपि यह स्थिति प्रतिसमय प्रत्येक प्राणी के अन्तस् में क्रियाशील रहती है परन्तु बहिर्मुख
होने के कारण वह उससे सचेत नहीं होता है । प्रस्तुत प्रकरण में मन्त्रोच्चारण के सम्बन्ध में,
मन्त्रोच्चारण की इसी पहली 'विमर्शमयी अथवा इच्छारूपा स्थिति का ही अभिप्राय है क्योंकि
शाक्त-उपाय पर चलने वाले साधकों की सारी क्रियायें विमर्शमयी ही होती हैं। वैखरीवाणी
के द्वारा ऊँची आवाज़ में मन्त्रों का उच्चारण करना आणव उपाय पर चलने वाले अवर
अधिकारियों के लिये ही लाभप्रद सिद्ध हो सकता है । मन्त्रों के विमर्शमय उच्चारण में इतनी
शक्ति होती है कि साधक का चित्त और परप्रकाशरूप २बिन्दु, उसी प्रकार तीव्रगति से एक
दूसरे की ओर आकर एकाकार हो जाते हैं, जिस प्रकार धनुष के प्रचण्ड आघात से धकेला
गया तीर अतिस्वनिक वेग में दौड़ कर लक्ष्य के साथ मिल जाता है ।
सूत्र संख्या ३२ में 'निर्वाण दीक्षा' का उल्लेख किया गया है । इस सम्बन्ध में
निम्नलिखित बातें ध्यान में रखना आवश्यक है ।
आध्यात्मिक जगत् में 'दीक्षा' शब्द से ऐसे विशेष प्रकार के संस्कारों का अभिप्राय
लिया जाता है जिनके द्वारा सिद्ध गुरु अपने शिष्यों में, उनकी मानसिक योग्यताओं के अनु-
सार, अनेक प्रकार की योग सम्बन्धी अनुभूतियों को संक्रमित करके, पलक भर में उनका
उद्धार कर लेते हैं । शास्त्रों के अनुसार ३'दीक्षा' शब्द के 'दी' वर्ण में ज्ञान के संक्रमण और
'क्षा' वर्ण में कर्मवासनाओं का नाश किये जाने का अभिप्राय अन्तर्निहित है ।
तन्त्रशास्त्रों में अनेक प्रकार की दीक्षाओं और उनके साथ सम्बन्धित शास्त्रीय विधि-
विधानों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । शिष्यों की मानसिक योग्यताओं को अच्छी
प्रकार जांचने के अनन्तर ही गुरु यह निर्णय कर लेता है कि किस शिष्य को कैसी दीक्षा देना
उचित है ।
सारी दीक्षाओं में 'निर्वाण-४दीक्षा' असामान्य और दुर्लभ मानी जाती है क्योंकि जिस
१. उच्चारेण विमर्शरूपेण न तु स्थानकरणप्रयत्नरूपबीजाक्षरोच्चारेण, तस्याणवोपायपर्यव-
सायित्वात् । (शिवसूत्रवि०, २.२ की टिप्पणी)
२. यथा शरो धनुःसंस्थो यत्नेनाताड्य धावति ।
तथा बिन्दुर्वरारोहे! उच्चारेणैव धावति ।। (तं० सं०, शिवसूत्र, २.२ में उदाहृत)
३. दीयते ज्ञानसद्भावः क्षीयन्ते कर्मवासनाः ।
दानक्षपणसंयुक्ता दीक्षा तेनेह कीर्तिता ।। (तं० वि०, १.४३)
४. तथा इयमेव निर्वाणदीक्षा.........संस्कारविशेषः । (स्प० का०, ४२)

मन्त्रदेवता और चित्त १२५
सौभाग्यशाली को यह मिले, उसके मन में, युगयुगों से संचित और पिंड न छोड़ने वाली
वासनायें, क्षणभर में विगलित हो जाती हैं और वह सहसा पुर्यष्टक के बन्धन से मुक्त होकर
स्वरूप में अवस्थित हो जाता है।
अब प्रश्न यह है कि क्या आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिये 'निर्वाण-दीक्षा' संस्कार का
और उसके शास्त्रीय विधि-विधानों का पूरा किया जाना एक अनिवार्य आवश्यकता है ?
सूत्रकार ने इस शङ्का का समाधान मूलसूत्र में शब्दों को एक विशेष ढंग में रखने से ही किया
है। उसने सूत्र के पहले और दूसरे चरण में जहाँ 'अमृतप्राप्तिः' और 'आत्मनो ग्रहः' इन दो
शब्दों के साथ निश्चित रूप से 'एव' शब्द का प्रयोग किया है वहाँ तीसरे चरण में 'निर्वाण
दीक्षा' शब्द के साथ जानबूझ कर 'एव' के बदले 'च' का प्रयोग किया है। ऐसा किये जाने
का विशेष अभिप्राय यह है कि 'निर्वाण-दीक्षा' नामक संस्कार के आश्चर्यजनक महत्त्व की
उपेक्षा कदापि नहीं की जा सकती है परन्तु ईश्वरीय अनुग्रह के लोकोत्तर तौरतरीके मात्र
शास्त्रीय विधि-विधानों के वशवर्ती भी नहीं हैं। जिन महान् आत्माओं पर परमेश्वर का दृढ़
शक्तिपात हो उनको १देवियों ने अर्थात् पारमेश्वरी शक्तियों ने स्वयं अज्ञातरूप में दीक्षित
किया होता है जिसके फलस्वरूप उनके मन में सांसिद्धिक रूप में सत्-तर्क (शुद्धविद्या) का
उदय होता है। फलतः जिन व्यक्तियों को किसी भी अचिन्त्य या अज्ञात प्रकार से मन्त्रवीर्य
की अनुभूति हो जाये तो वही उनके लिये निर्वाण-दीक्षा होती है, भले ही २घी के दीये
जलाकर और सामग्री के भण्डार जला कर संस्कार के शास्त्रीय विधि-विधानों को पूरा करने
का आडम्बर न भी रचाया गया हो।
श्रीमत् सोमानन्दाचार्य, श्रीमद् उत्पलाचार्य या श्रीमद् अभिनवगुप्ताचार्य जैसे शैवदर्शन
के उद्भट और वरिष्ठ सिद्धों का इस बात पर मतैक्य है कि आत्मशक्ति का प्रत्यभिज्ञान चाहे
किसी भी ३प्रमाण से, शास्त्रों के अध्ययन, गुरुओं के उपदेश से या अन्य किसी अदृश्य प्रकार
से यदि हो गया तो हो गया, फिर सारे उपायजालों या निर्वाणदीक्षा जैसे संस्कारों के शास्त्रीय
विधि-विधानों का काई प्रयोजन अवशिष्ट नहीं रहता है। एक बार यह ज्ञान हो गया कि
अमुक पदार्थ खरा सोना है तो उसको परखने के लिये कसौटियों पर घिसने की आवश्यकता
नहीं रहती है ॥३१-३२॥
इति श्रीकल्लटाचार्यविरचितायां स्पन्दकारिकावृत्तौ 'सहजविद्योदयो'
नाम द्वितीयो निःष्यन्दः ॥२॥
श्रीमान् कल्लटाचार्य के द्वारा विरचित 'स्पन्दकारिकावृत्ति' का
'सहजविद्योदय' नामक दूसरा निःष्यन्द समाप्त हुआ ॥
१. तत्र आयातदृढशक्तिपाताविद्धस्य स्वयमेव सांसिद्धिकतया सत्तर्क उदेति,
योऽसौ देवीभिः दीक्षित इति उच्यते। (तं० सा०, २३ पृष्ठ)
२. एवं यो वेद तत्त्वेन तस्य निर्वाणदायिनी ।
दीक्षा भवत्यसंदिग्धा तिलाज्याहुतिवर्जिता ॥ (प० त्रि०, २५)
३. द्रष्टव्य शिवदृष्टि आह्निक ७ और तंत्रालोक आह्निक २.