स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
सूत्र—यह बात निश्चित है कि यह पुरुष (मितप्रमाता) केवल पारमेश्वरी इच्छा के
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अवस्थित पशुप्रमाता (संसारी जीव) के लिए कौन सा स्थान अवशिष्ट रह जाता है ? क्या वह
सदा के लिए दोनों के बीच में अटका हुआ रहकर, कहीं और दिशा से आई हुई इच्छारूपी
चाबुक की मार से, इन्द्रियों को अपने अपने कार्य की ओर प्रवृत्त होने की मात्र प्रेरणा देता
रहता है ? इस शंका का निवारण अगले सूत्र में किया जा रहा है—
न हीच्छानोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते ।
'अपि त्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥ ८ ॥
न चेच्छाप्रेषणेन करणानि प्रेषयति, अपि तु स्वस्वरूपे स्थित्वा केवलं
यादृशी तस्येच्छा प्रवर्तते तथाविधमेव स बाह्यान्तरं कार्यमुत्पादयति, तेन न करण-
विषयमेव सामर्थ्यम्, किं तु तस्य सर्वत्र ॥८॥
अनुवाद
सूत्र—यह बात निश्चित है कि यह पुरुष (मितप्रमाता) केवल पारमेश्वरी इच्छा के
अंकुश का प्रेरकमात्र बनकर ही नहीं रह जाता है अपितु आत्मबल का स्पर्श होने की दशा में
स्वयं भी उसी (पतिप्रमाता) के समान बन जाता है ॥८॥
वृत्ति—यह नहीं सोचना चाहिये कि यह मितप्रमाता पारमेश्वरी इच्छारूपी अंकुश के
द्वारा इन्द्रियवर्ग को अपना अपना काम करने की मात्र प्रेरणा देता रहता है, अपितु, इसका
अभिप्राय यह है कि यह अपने स्वरूप में ही स्थित रहकर, अपनी इच्छा के अनुसार बाह्य
एवं आभ्यन्तर कार्यों की सृष्टि करता है। ऐसी दशा में इसको केवल इन्द्रियों को विषयाभि-
मुख बनाने का सामर्थ्य ही नहीं होता है अपितु प्रत्येक क्षेत्र में स्वतन्त्रता से कार्य करने की
क्षमता भी प्राप्त ही होती है ॥८॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्र वास्तव में पूर्वसूत्र की ही व्याख्या है। पूर्वसूत्र में जो कुछ कहा गया है
उससे यह शङ्का सहज ही में उत्पन्न हो सकती है कि जब पतिप्रमाता सीधा ही जडवर्ग में
चेतनासंचार करके संसार के कार्य चलाता है तो संसारी ग्राहकवर्ग अर्थात् संसार के सारे
जीवों का अस्तित्व ही संशय में पड़ जाता है परन्तु वस्तुस्थिति तो इससे कुछ भिन्न ही देखने
में आती है। संसार के प्रत्येक आदान-प्रदान के समय हम देखते हैं कि प्रत्येक संसारी जीव
(ग्राहक जीव) अपनी स्वतन्त्र इच्छा से अपनी इन्द्रियों को सहजरूप में विषयों की ओर अभि-
मुख या उनसे निवृत्त कर लेता है। आखिर किसी भी प्रकार का कार्यकलाप सम्पन्न होने के
समय परमेश्वर स्वयं ही हिमालय जैसे ऊंचे मंच पर खड़ा होकर जीवों को कठपुतलियों की
१. सूत्र के इन दो चरणों का यह अभिप्राय भी निकल सकता है कि साधारण जीवों में भी
आत्मबल का ही अंशतः स्पर्श होता है जिससे वे भी अपनी संकुचित परिधि में परमात्मा
की तरह ही अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने में सक्षम होते हैं।
मितप्रमाता में स्पन्दशक्ति का स्पर्श ५१
तरह नचाता तो नहीं रहता है। यदि ऐसी ही परिस्थिति होती तो संसार के सारे ग्राहकवर्ग
के अस्तित्व का अभिप्राय ही क्या होता ? साथ ही जब संसार का सारा ग्राहकवर्ग प्रत्यक्षरूप
में स्वयं ही प्रत्येक प्रकार का आदान-प्रदान करता हुआ देखने में आता है तो इस यथार्थ को
पारमेश्वरी इच्छामात्र का नाम देकर टाला भी कैसे जा सकता है।
इस शङ्का का समाधान तब तक मिलना असम्भव है जब तक यह न समझा जाये कि
शैवसिद्धान्त के अनुसार पतिप्रमाता१, पशुप्रमाता२ और सारे ग्राह्यवर्ग३ (जडप्रमेयवर्ग) का
वास्तविक स्वरूप क्या है ? क्या ये तीन प्रकार की अलग अलग और पारस्परिक सम्बन्ध-
रहित स्वतन्त्र सत्तायें हैं या एक ही मूलभूत सत्ता के तीन रूपान्तरमात्र हैं ?
इस सम्बन्ध में यह भी विचारणीय है कि सूत्रकार ने इसी सूत्र में जो आत्मबल के स्पर्श
की पहेली बुझा दी है उसका वास्तविक अभिप्राय क्या है। आत्मबल स्वयं क्या है और वह किसको
स्पर्श करता है ? शैवशास्त्रियों का मन्तव्य है कि वास्तव में सतत-स्पन्दमयी पारमेश्वर सत्ता
स्वयं ही इन तीनों रूपों में प्रकाशमान है। वह४ सत्ता विभु होने के कारण सर्वव्यापक; नित्य
होने के कारण आदि और अन्त से रहित; विश्वाकृति होने के कारण स्वयं ही चेतनरूप और
जडरूप और विश्व के विचित्र आकार-प्रकारों का अवभासन करने वाली है। सच बात तो
यह कि इन कारणों से वह स्वयं ही बहुरूपिया है।
असीम एवं अनन्त शक्तियों से परिपूर्ण शिव, विश्व का बाह्य अवभासन करने की
ओर संकल्पात्मक उन्मुखता के समय सर्वप्रथम उसका अवभासन स्वरूप से अभिन्न अहंविमर्श
के रूप में ही करता है। इस अवभासन का शास्त्रीय नाम 'आदिसर्ग'५ है। अनन्तर अपनी ही
स्वातन्त्र्यशक्ति के रूपान्तर मायाशक्ति के द्वारा स्वरूप पर ही आवरण डालकर, स्वात्मरूप६
दर्पण में ही अनन्त प्रकार के ग्राहकों और ग्राह्यों का अवभासन करता है। संसारी ग्राहक-
दशा७ और ग्राह्यदशा स्वरूप पर पड़े हुए आवरण के तारतम्य और अनुपात पर ही आधारित
१. शिव—पूर्णप्रमाता, पतिप्रमाता।
२. जीव—संसारी ग्राहक, मितप्रमाता।
३. सारा जडवर्ग, ग्राह्य, ज्ञेयविषय।
४. विभुत्वात्सर्वगो नित्यभावादाद्यन्तवर्जितः ।
विश्वकृतित्वाच्चिदचित्तद्वैचित्र्यावभासकः ॥
ततोऽस्य बहुरूपत्वम्......... । (तं० १.६१-६२)
५. विश्वनिर्माणेच्छुर्हि परमेश्वरः प्रथमं स्वाव्यतिरिक्तमेव विश्वं प्रकाशयेत्, अयमेव हि 'आदि-
सर्गः' तत्र तत्रागमेषु उच्यते। (तं० वि०, १.१३५)
६. अनन्तरं यदास्य मायया सर्गचिकीर्षा भवति तदा स्वस्वातन्त्र्यात् स्वात्मदर्पणेऽनन्तग्राह्य-
ग्राहकद्वयाभाससन्ततीराभासयति। (तत्रैव)
७. सोऽयमात्मानमावृत्य स्थितो जडपदं गतः।
आवृतानावृतात्मा तु देवादिस्यावरान्तगः।
जडाजडस्याप्येतस्य द्वैरूप्यस्यास्ति चित्रता॥ (तं०, १.१३४-५)
५२ स्पन्दकारिका
है। इस प्रकार परमेश्वर स्वयं ही तीनों रूपों में भासमान है। निम्नलिखित तालिका से यह
बात स्पष्ट हो जायेगी:—
| प्रमाता का रूप | आवरण का तारतम्य | शक्तित्व का स्वरूप | आकार | भावों का रूप | भेद | |
|---|---|---|---|---|---|---|
| १. | पति प्रमाता | विशुद्ध, चिद्रूप<br>अनावृत | ज्ञातृत्व और कर्तृ-<br>त्वरूपपूर्ण-<br>स्वातन्त्र्य | विश्वात्मभाव<br>आकारहीन | सारे भाव अपने ही अंग जैसे | भेदरहित<br>सर्वव्यापक |
| २. | पशु प्रमाता | चिदचित्,<br>आधा आवृत<br>आधा अनावृत | संकुचित<br>ज्ञान और<br>क्रिया | देह, प्राण<br>पुर्यष्टक और<br>शून्य | सारे भाव<br>अपने से<br>भिन्न | देवता<br>मानव<br>पशुपक्षिवर्ग |
| ३. | जड<br>प्रमेय | अचित्<br>चिद्रूपता-<br>पूर्ण आवृत | ज्ञेयभाव<br>और<br>कार्यभाव | जड<br>पंचमहाभूत | घोरमूढ़ता में<br>पड़े रहने के<br>कारण<br>संज्ञाहीनता | सारी<br>स्थावर<br>प्रकृति के<br>असंख्यभेद |
| वास्तव¹ में संसार में दिखाई देने वाली अनन्त भावराशि परमात्मा की अनन्त | ||||||
| शक्तियों के विश्वमय प्रसार के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वह इसको अपने स्वतन्त्र | ||||||
| संकल्पमात्र से ही अवभासित करता है। स्वरूपतः एकाकार होने पर भी ग्राहकरूप या | ||||||
| ग्राह्यरूप अनेकाकारता को अवभासित करने की संकल्पात्मक क्षमता ही परमेश्वर का | ||||||
| क्रियात्मक स्वातन्त्र्य है जो संकुचित ग्राहकवर्ग में सम्भव नहीं हो सकता है। चैतन्य² किसी | ||||||
| दूसरे वस्तु की अपेक्षा से रूपप्रसार नहीं करता है अपितु यह उसका अकाट्य स्वभाव ही है। | ||||||
| भूमि में डाला हुआ बीज लोकयात्रा की अपेक्षा से अंकुर नहीं बनता है अपितु अंकुरित | ||||||
| १. एष चानन्तशक्तित्वादेवमाभासयत्यमून । | ||||||
| भावानिच्छावशादेषा क्रिया निर्मातृतास्य सा ॥ | ||||||
| (ई० प्र०, २. ४. २) | ||||||
| २. न लोकयात्राभिप्रायज्जनयेद् बीजमङ्कुरम् । | ||||||
| किन्तु स्वभावात्...........................॥ | ||||||
| (ई० सि०, ४१) |
पतिप्रमाता में स्पन्दशक्ति का स्पर्श ५३
होना उसका स्वभाव ही है। फलतः यह बात स्पष्ट हो जाती है कि संसारी ग्राहक (मित-
प्रमाता) और पतिप्रमाता स्वरूपतः भिन्न नहीं हैं। ऐसी दशा में उनकी इच्छाशक्ति भी भिन्न
नहीं हो सकती है। परिणामतः ज्ञान और क्रिया में भी भेद नहीं हो सकता है। हां
केवल स्वातन्त्र्य के अनुपात और तारतम्य में भेद अवश्य है। पतिप्रमाता पूर्ण स्वतन्त्र और
चिद्रूप होने के कारण विश्वरूप में इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियों को प्रयोग में ला सकता
है जबकि पशुप्रमाता अंशतः स्वतन्त्र और चिद्रूप होने के कारण, अपनी संकुचित परिधि में
ही इन तीनों शक्तियों को, उसी अनुपात से प्रयोग में ला सकता है। इतना ही नहीं, अपितु
संसार के अनन्त जीव-जन्तुओं में आपस में भी, चिद्रूपता पर पड़े हुए आवरण का अनुपात से
इन तीन शक्तियों की हीनता या अधिकता देखने में आती है। यदि एक छोटे से जीव का विश्व
की परिधि और शक्तित्रय का तारतम्य कुछ होता है वही उससे बड़े जीव या मनुष्य का
नहीं हो सकता है। महान् दावाग्नि बड़े जंगल को जला सकती है जब कि अंगारा एक छोटे
दाह्यपदार्थ को और चिंगारी एक रूई के रेशे को ही जला सकती है। परन्तु जिस प्रकार अग्नि
के छोटा या बड़ा होने से उसके जलाने के स्वभाव में कोई अन्तर नहीं पड़ता है उसी प्रकार
प्रमाता चाहे पतिभाव पर हो या पशुभाव पर, उसके स्पन्दात्मक चैतन्यस्वभाव में कोई अन्तर
नहीं पड़ सकता है। अब यदि कोई कहे कि छोटी सी चिंगारी भी कभी बड़ी से बड़ी आग
बन सकती है, तो ठीक है; पशुप्रमाता भी कभी कभी साधना के बल से पतिप्रमाता बन
सकता है ।
प्रमाता के इस पतिभाव और पशु के विषय में भगवान् उत्पलदेव का कथन है कि
प्रमाता¹ को जिस अवस्था में सारा भावमण्डल अपना अंग जैसा ही अर्थात् अपने अहंविम-
र्शात्मक स्वभाव से अभिन्न प्रतीत होता है उसको पतिप्रमातृभाव कहते हैं । उस प्रमाता
को 'पति' इसलिए कहते हैं कि उसका स्वतन्त्र साम्राज्य सारे भाववर्ग पर छाया रहता है
और वह उन सारे भावों को अपने चैतन्यामृत की बिन्दुओं से अनुप्राणन या पालन करता
रहता है। इसके प्रतिकूल जिस अवस्था में उसको, मायीय आवरण में ढके रहने के कारण,
अपने ही अंगभूत भाव अपने से व्यतिरिक्त रूप में प्रतीत होते हैं उसको 'पशुप्रमातृभाव'
कहते हैं। इस अवस्था में वह भाववर्ग का अधिपति न रहकर उनका दास बना रहता है।
भावों का क्षोभ (उथल पुथल) ही उसके लिए बन्धन बन जाता है जिसमें फँसकर वह पशु
और जन्ममरण की संसृति से दुरत्यय पथ का राही बन जाता है ।
इन तीनों रूपों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में शैवगुरुओं ने लम्बी-चौड़ी और
पेचदार दिमागी कवायद करने के अनन्तर यह निष्कर्ष निकाला है कि ये तीनों आपस में
अभेद-सम्बन्ध में स्थित हैं ।
१. स्वाङ्गरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः ।
मायातो भेदिषु क्लेशकर्मादिक्लुषः पशुः ॥
(ई० प्र०, ३. २. ३)
५४ स्पन्दकारिका
अब रह जाता है प्रश्न आत्मबल और उसके स्पर्श का। आत्मसत्ता में स्पन्दमयी
पूर्णाहन्ता का बल है। पतिप्रमातृभाव की अवस्था में यह बल अपरिमित एवं पूर्ण स्वतन्त्र है।
संसारी ग्राहकभाव की अवस्था में इसका 'स्पर्श' अर्थात् अंशतः विद्यमानता है अतः वह
परिमित एवं अंशतः स्वतन्त्र है। यही कारण है कि जहाँ पतिप्रमाता असीम रूप में सब कुछ
युगपत् ही चाहता है, जानता है और करता है, वहाँ पशुप्रमाता, देह, प्राण एवं पुर्यष्टक के
पिंजरे में बद्ध होने के कारण, ससीम रूप में और निश्चितक्रम में कुछ ही चाहता है, जानता
है और करता है। परन्तु दोनों रूपों में प्रवर्त्तमान क्रियाशीलता वास्तव में मौलिक¹ आत्म-
सत्ता पर ही आश्रित है। फलतः पशुप्रमाता भी वास्तव में स्वरूप में ही अवस्थित है, उससे
बाहर नहीं है। इसके अतिरिक्त 'आत्मबलस्पर्श' का अभिप्राय स्वरूप की पूर्णानुभूति होना
भी है। पशुप्रमाता को अलक्ष्य अनुग्रह से जब वास्तविक पूर्ण अहन्तारूप स्वरूप की अनुभूति
हो जाती है तब वह भी पशुभाव से मुक्त होकर साक्षात् शिव ही बन जाता है। ऐसी दशा
में उसकी इच्छा विश्वात्मा की ही इच्छा होती है।
आत्मबल के विषय पर आगे भी यथासम्भव विवेचन किया जायेगा। यहाँ पर केवल
इतना ही कहना पर्याप्त है कि आत्मबल का महत्त्व शब्दों के द्वारा अवर्णनीय है। इसके
स्पर्शमात्र से, करणवर्ग ही क्या, सारे विश्व में हलचल मच जाती है। आज का यांत्रिक युग
तो इसका ज्वलन्त उदाहरण है। किसी भी बिन्दु पर आत्मबल का स्पर्श पाते ही सारा
जडवर्ग ऐसे नाचने लगता है कि मानो कठपुतलियाँ नाच रही हों। प्रत्येक प्राणी की पंच-
भौतिक काया, प्राण इत्यादि भी इसके अपवाद नहीं हैं ॥८॥
[ क्षोभ की शान्ति और स्पन्द की उपलब्धि ]
पूर्व सूत्र में यह बात सिद्ध की गई कि वास्तव में पतिप्रमाता में कोई स्वरूपगत भेद
नहीं है। इस सिद्धान्त को स्वीकारने में कोई आपत्ति नहीं थी परन्तु सूत्र का अन्तिम चरण
इसमें अड़चन उत्पन्न कर रहा है। वह यह कि यदि जीव और शिव में कोई स्वरूपगत भेद
नहीं है तो इस अन्तिम चरण-'पुरुषस्तत्समो भवेत्' में पुरुष को शिव के साथ समानता प्राप्त
करने की आवश्यकता को अभिव्यक्त करने का क्या प्रयोजन है ? अतः स्पष्ट है कि स्वरूपगत
भेद न होने पर भी पुरुष किसी बात में शिव से न्यून है। अगले सूत्र में इसी बात पर प्रकाश
डाला जा रहा है—
निजशुद्ध्याससमर्थस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः ।
यदा क्षोभः प्रलीयेत तदा स्यात्परमं पदम् ॥९॥
स चास्य आत्मबलस्पर्शः सहजया अशुद्ध्या व्याप्तस्य कार्यमिच्छतोऽपि न भवति,
किन्तु यदा क्षोभः 'अहमिति' प्रत्ययभावरूपोऽस्य प्रलीयेत, तदास्य भवति परमे पदे
प्रतिष्ठानम् ॥९॥
१. यद्यप्यर्थस्थितिः प्राणपुर्यष्टकनियन्त्रिते ।
जीवे निरुद्धा तत्रापि परमात्मनि सा स्थिता ॥ (अ० प्र० सि०, २०)
क्षोभ की शान्ति और स्पन्द की उपलब्धि ५५
अनुवाद
सूत्र—अपने ही स्वातन्त्र्य से उत्पादित सहज १अशुद्धि (मल) के द्वारा असमर्थ बने हुए
और संसार के वासनात्मक २कर्त्तव्यों की अभिलाषाओं में पड़े हुए, मितप्रमाता का ३क्षोभ, जब
स्वरूप में ही लीन हो जाये तब उसको परमपद प्राप्त होता है ॥९॥
वृत्ति—स्वभाव से उत्पन्न अशुद्धि के द्वारा ओत-प्रोत रहने के कारण और वासना-
त्मक कर्त्तव्यों की अभिलाषाओं में पड़े रहने के कारण, मितप्रमाता को आत्मबल का पूर्ण
स्पर्श होने नहीं पाता है। परन्तु जब इनका क्षोभ अर्थात् देहादि पर 'अहं' अभिमानमूलक
विकल्पपरम्परा, स्वरूप में ही लीन हो जाये, तब यह सर्वोत्कृष्ट पदवी पर प्रतिष्ठित हो
जाता है ॥९॥
विवरण
शैवशास्त्रियों ने स्थान स्थान पर विश्वात्मा के पतिरूप और पशुरूप की तर्कपूर्ण
विवेचना प्रस्तुत करके, प्रबल युक्तियों के द्वारा इस बात को सिद्ध कर दिया है कि ये दोनों
रूप वास्तव में एक ही स्वतन्त्र सत्ता के 'पूर्णस्वतन्त्र' और 'संकुचितस्वतन्त्र' रूपान्तर मात्र
हैं। उस सत्ता ने विश्वमयता के महान् नाटक की भूमिका निभाने के लिये, अपनी ही इच्छा
से, अपने को ही अख्याति का लबादा पहना कर 'संकुचितस्वतन्त्र' रूप धारण किया है।
'पूर्णस्वतन्त्र' रूप में यह भूमिका निभ नहीं सकती क्योंकि पूर्ण में संकोच कहाँ और संकोच
के अभाव में संसार कहाँ ? फलतः यदि 'पति' अग्नि का बड़ा सा ढेर है तो 'पशु' उसी की
एक छोटी सी चिंगारी है। वह अनुपम अभिनेता स्वयं ही महान् और स्वयं ही लघु है,
परन्तु वास्तव में महत्ता और लघुता इत्यादि सारे मायीय बन्धनों से रहित स्वातन्त्र्यवन-
विहारी आनन्दघन है।
वह शवित्तघन प्रति समय चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन पांच रूपों में
स्पन्दायमान है। इनमें से आनन्दशक्ति के द्वारा विश्वरूप की सर्जना होती है क्योंकि सारा
विश्व असीम आनन्दामृत की उछल्लता ही है। परमेश्वर संसार भाव को, अपने से भिन्नरूप
में (वेद्यरूप में) अवभासित करने की ओर संकल्पात्मक उन्मुखता के समय अपनी स्वातन्त्र्य
शक्ति को मायाशक्ति का रूप देकर, उससे जनित स्वात्मविस्मृतिरूप अख्याति (अपने स्वरूप
की पूर्णता की विस्मृति) के द्वारा, अपने वास्तविक असीमरूप को भुलाकर, ससीम पशु का रूप
धारण करता है। इसको शास्त्रीय शब्दों में अभेद व्याप्ति को भूलकर भेदव्याप्ति का ग्रहण
करना कहते हैं। फलतः अख्याति भी पतिप्रमाता की स्वयं ही उत्पादित अशुद्धि है, जिसके
द्वारा वह स्वयं ही शक्ति-दरिद्र बन कर, जीवभाव की संकुचित और पग पग पर हेयता और
उपादेयता के संशयों से ग्रस्त, इतिकर्तव्यता के क्षोभ में पड़ गया है। यह क्षोभ अर्थात् संसार
की अनन्त तुच्छ कामनायें और उनकी पूर्ति के लिए चिरसंघर्ष ही तो इन दो रूपों में एक
ऐसी गहरी खाई है जिसको पाटना उतना सरल नहीं जितना आम गोष्ठियों में कहा या सुना
१-३. सूत्र में उल्लिखित 'अशुद्धि' शब्द से आणव, 'कर्त्तव्य' शब्द से कार्म और 'क्षोभ'
शब्द से मायीय मलों का अभिप्राय है।
५६ स्पन्दकारिका
जाता है। यदि किसी प्रकार अर्थात् गम्भीर अध्ययन, श्रद्धा-भक्ति, अथक-अभ्यास, शक्तिपात-
रूप गुरुकृपा इत्यादि साधनात्मक उपायों के द्वारा इस खाई को पाटना सम्भव हो सके तो
स्वरूपस्पन्द की अनुभूति हो जाती है और पशु भी साक्षात् पति ही बन जाता है।
शैवगुरुओं ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञा, तंत्रालोक इत्यादि महान् शैवग्रन्थों में, स्वतन्त्र चैतन्य
की इसी द्विमुखी स्फुरणा के सिद्धान्त और इसके साथ सम्बन्धित अवरोहप्रक्रिया की विस्तृत
एवं गम्भीर विवेचना प्रस्तुत की है परन्तु उसका अध्ययन करना लोहे के चने चबाना ही
तो है। शास्त्र पढ़ने की अपेक्षा बहुधा संशयों की निवृत्ति गुरुओं के वचनामृतों से ही हो
जाती है। अस्तु, जहाँ तक स्वतन्त्र संवित्-भट्टारिका के स्वयं ही अस्वतन्त्र संसारी पशुपदवी
पर अवतीर्ण होने की प्रक्रिया का प्रश्न है उस पर सूत्र १९-२० में यथा सम्भव प्रकाश डाला
जायेगा। यहाँ पर केवल विषय को स्पष्ट करने के लिए शैव दर्शन के स्वातन्त्र्यवाद, अशुद्धि
और माया के स्वरूप पर थोड़ा बहुत प्रकाश डालना आवश्यक है।
स्वातन्त्र्य—शैवशास्त्रों में 'स्वातन्त्र्य' शब्द और 'चैतन्य शब्द पर्यायवाची हैं। दोनों
भाववाचक संज्ञायें हैं। इनको भाववाचक रखने का एक विशेष अभिप्राय है। वह अभिप्राय
आगे स्पष्ट हो जायेगा। पहले यह समझना आवश्यक है कि स्वातन्त्र्य या चैतन्य शब्दों से
ज्ञान और क्रिया के स्वतन्त्र अर्थात् १अनन्यमुखापेक्षी कर्तृत्व का अभिप्राय लिया गया है।
इसका अर्थ विश्वात्मक रूप में सृष्टि, स्थिति, संहार, पिधान और अनुग्रह इन पाँच प्रकार के
दुर्घट कृत्यों के जानने और करने में, अनन्यमुखापेक्षी अर्थात् स्वरूप से इतर और किसी सत्ता
पर निर्भरता का अभाव है। इस स्वतन्त्र२ आत्मनिर्भरता की स्वरूपभूता पूर्णज्ञातृता और
पूर्णकर्तृता की अहंविमर्शनमयी विश्वात्मक-स्फुरणा को ही शैव शब्दों में स्वातन्त्र्य, चैतन्य या
आत्मा इत्यादि नाम दिये गये हैं।
अब यह देखना है कि इस सर्वोत्कृष्ट सत्ता को स्वतन्त्र न कह कर स्वातन्त्र्य या चेतन
न कह कर चैतन्य कहने का अभिप्राय क्या है ? शैवदर्शन में ज्ञातृता और कर्तृता का साधारण
ज्ञान (जानना) या क्रिया (करना) अर्थ नहीं है, प्रत्युत विश्वरूप में प्रत्येक वस्तु के देश, काल
एवं आकार की बाधाओं या सीमाओं से अबाधित रूप में, जानने३ और करने की क्रिया का
स्वतन्त्र कर्तृत्व ही ज्ञातृता और कर्तृता है। साधारण पशुभाव में प्रत्येक जीव भी जानता
और करता है परन्तु उस को एक ही समय पर प्रत्येक वस्तु जानने और करने की स्वतन्त्रता
नहीं है क्योंकि वह देश, काल एवं आकार की परिधियों में सीमित हो कर कुछ ही जान
सकता है या कुछ ही कर सकता है; सारा नहीं। फलतः संसारी जीव में अपने सीमित विश्व
के अनुपात से सीमित स्वातन्त्र्य है। अतः वह प्रतिसमय पर-मुखापेक्षी है।
१. स्वातन्त्र्यमेव च अनन्यमुखप्रेक्षित्वम् आत्मनः स्वरूपम् । (ई० प्र० वि०, १. ८. ११)
२. 'चैतन्यमात्मा'········'चैतन्यं सर्वज्ञानक्रियामयं परिपूर्णं स्वातन्त्र्यम् उच्यते ।
(शि० सू० वि०, १. १)
चैतन्यमात्मनो रूपं सिद्धं ज्ञानक्रियात्मकम् । (शि० स्तो० वि०, १. १)
३. आत्मात एव चैतन्यं चित्क्रियाचितिकर्तृता । तात्पर्येणोदित''''''''। (ई० प्र०, १. ५. १२)
मोक्ष की शक्ति और सानन्द की उपलब्धि ५७
'चेतन' और 'चैतन्य' का मूल शब्द 'चिति' है। इस 'चिति' शब्द का अर्थ चेतने
की क्रिया है। यह चेतने की क्रिया संसार के प्रत्येक ग्राहक में सर्वसाधारण रूप में विद्यमान
है। यदि^२ सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो सारे तथाकथित जड पदार्थों में भी इसका सद्भाव
पाया जाता है। चेतने वाले को चेतन कहा जाता है अर्थात् जो स्वतन्त्रतापूर्वक किसी भी वस्तु
को जान सके या कर सके। यहाँ तक तो ठीक है परन्तु फिर भी एक संसारी ग्राहक और
विश्वात्मा के चेतने में क्या भेद है ? यदि कोई भेद नहीं है तो पूर्ण-स्वातन्त्र्य नहीं कहा जा
सकता है। अतः^३ शैव दार्शनिकों ने इसकी भाववाचक संज्ञा बनाकर यह अभिप्राय निकाला है
कि विश्वात्मकरूप में ज्ञानक्रियामयी चेतने की क्रिया का पूर्ण अधिकारात्मक और अनन्य-
मुखापेक्षी कर्तृत्व ही पूर्ण स्वातन्त्र्य अथवा पारमेश्वर ऐश्वर्य है। यह कर्तृत्व अथवा स्वातन्त्र्य
ऐसा है कि शाश्वतरूप में सत्तावान् होकर किसी भी देश, काल इत्यादि की संकुचित परिधि
में सीमित नहीं है। विश्वात्मा प्रत्येक समय प्रत्येक बात को जानने या करने में स्वतन्त्र है
फलतः^४ 'चैतन्य' शब्द से केवल और केवल ज्ञातृता-कर्तृता-रूप स्वातन्त्र्य को अभिव्यक्त किया
गया है और यही स्वातन्त्र्य शाश्वत स्पन्दमय पतिप्रमाता का वास्तविक स्वरूप और सारे
विश्व के प्रत्येक दृश्यमान अथवा चिन्त्यमान पदार्थवर्ग का आधार एवं अन्तिम विश्रान्तिस्थान
भी है। इसी स्वातन्त्र्य को शास्त्रीय शब्दों में सतत स्पन्दमयी-संवित् भी कहते हैं।
इस विषय के अधिक स्पष्टीकरण के लिए पूर्वोक्त ज्ञानक्रियात्मक चितिक्रिया के स्वरूप
को भी समझना आवश्यक है। जैसा पहले सूत्र के विवरण में भी स्पष्ट किया गया है कि
चितिक्रिया का स्वरूप चलना, पकाना इत्यादि स्थूल क्रियाओं का जैसा नहीं अपितु आन्तर
अनुसंधानात्मक अथवा मात्र संकल्पात्मक गतिमयता ही है जिसको शास्त्रीय शब्दों में अहं^५
प्रत्यवमर्शात्मक सामान्यस्पन्द कहते हैं। यह विमर्शात्मकता ही इसका एक अविच्छेद्य स्वभाव
है जो इसको ^६जड़ से पृथक् करता है। ज्ञान और क्रिया अथवा प्रकाश और विमर्श दो अलग
पदार्थ नहीं अपितु एक ही चितिशक्ति की द्विमुखी स्पन्दात्मकता के द्योतक हैं। क्रिया, ज्ञान
की ही पल्लवित दशा है और ज्ञान क्रिया का ही पूर्वरूप है। दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी
कहा जा सकता है कि प्रकाश अर्थात् शिव ही बहिर्मुखदशा में विमर्श अर्थात् शक्ति ही अन्तर्मुख
दशा में प्रकाश अर्थात् शिव है। 'अहं' ही 'इदं' का बीजरूप और 'इदं' ही 'अहं' का विकसित
१. 'चितिक्रिया सर्वसामान्यरूपा' (शि० सू० वि०, १. १)
२. द्रष्टव्य—ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के १. १. ३ सूत्र पर भास्कराचार्य की टीका,
(भास्करी, प्रथमभाग, पृष्ठ ६५)
३. चैतन्यं सर्वज्ञानक्रियासम्बन्धमयं परिपूर्णं स्वातन्त्र्यम्। (शि० सू० वि०, १. १)
४. 'चैतन्यमिति भावन्तः शब्दः स्वातन्त्र्यमात्रकम्। अनाक्षिप्तविशेषं सदाह सूत्रे पुरातने।
(तं०, १. २८)
५. चितिः प्रत्यवमर्शात्मा। (ई० प्र०, १.५.१३)
६. तेन जडात् स हि विलक्षणः। (ई० प्र०, १. ५-१२)
५८ स्पन्दकारिका
रूप है । स्पन्दात्मक शिव में सारा जगत् अभेदरूप में अवस्थित है और सारा जगत् ही शिव
का प्रसार है ।
ऐसी ही चितिकर्तृ'तारूप स्वातन्त्र्य की गति में कहीं कोई अड़चन खड़ी नहीं हो
सकती है और यही कारण है कि विश्वात्मा स्वयं उत्पादित अशुद्धि के द्वारा अपने ही स्वरूप
को भागशः आवृत करके संसारी जीव का और पूरा आवृत करके सारे जडवर्ग का रूप
धारण करके अवस्थित है । स्वातन्त्र्य तो आखिर स्वातन्त्र्य ही है । वह स्वयं ही कभी
अर्धस्वतन्त्र या अस्वतन्त्र भी बन सकता है । यदि न बन सकता तो पूर्णस्वातन्त्र्य ही नहीं
कहलाता ।
अशुद्धि—शैवशास्त्रों में अशुद्धि, अख्याति, मल अथवा बन्ध इत्यादि कतिपय शब्दों
से वास्तविक स्वतन्त्र स्वरूप के अज्ञान का अर्थ लिया जाता है । स्वरूप का अज्ञान ही एक
ऐसी महान् अशुद्धि है जिसने विश्वात्मा को भी विश्वात्मभाव से गिरा कर पशुभाव के चौराहे
पर ला खड़ा कर दिया है। इस अज्ञान के स्वरूप के विषय में भगवान् चन्द्रमौलि ने—'ज्ञान
बन्धः' [शिवसूत्र १-२] इस सूत्र में यह निर्णय दिया है कि, 'अज्ञान' का अभिप्राय सर्वथा
ज्ञानाभाव नहीं, अपितु वास्तविक स्वरूप का अपूर्णज्ञान है । १अज्ञान तिमिर (एक प्रकार का
आँखों का रोग) है जो कि स्वरूपगोपन अर्थात् स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा अपने ही स्वतन्त्र
स्वरूप को छिपाने अर्थात् विस्मृत करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । इस स्वात्मविस्मृतिरूप
अज्ञान के विषय में आगे सूत्र २० में प्रकाश डाला जायेगा । यहाँ पर संक्षेप में इसके विकास
एवं प्रसार की प्रक्रिया के साथ सम्बन्धित कुछ बातों का उल्लेख किया जायेगा ।
ऊपर कहा गया है कि परमेश्वर की स्वातन्त्र्यशक्ति सतत उदीयमान होने के कारण
प्रतिसमय पांच रूपों में स्पन्दनशील है जिनको चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया कहते हैं ।
इन्हीं को दूसरे शब्दों में क्रमशः सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व और व्यापकत्व भी कहते
हैं । वह अनुत्तरतत्त्व इसी शक्तिपञ्चक के द्वारा प्रतिसमय विश्वरूप में सृष्टि, स्थिति,
संहार, पिधान और अनुग्रह इन पाँच विराट् कृत्यों को करता रहता है । विश्वरूप में प्रसृत
अथवा अवभासित होना तो चैतन्य का स्वभाव ही है क्योंकि उसमें आनन्द की प्रधानता है ।
संसारभाव का अवभासन करने की ओर उन्मुख हो जाने पर वह चैतन्य-तत्त्व स्वतन्त्रता से
अपनी अभेदव्याप्ति को भूलकर भेदव्याप्ति को ग्रहण करता है । इसका अभिप्राय यह कि
यद्यपि सारा विश्व उस अखण्ड स्वातन्त्र्यसागर में भेदरहित 'अहं' रूप में अवस्थित ही है
तथापि उसमें इसको स्वरूप से भिन्न 'इदं' रूप में अवभासित करने की सूक्ष्म स्फुरणामयी
अभिलाषा भी उस स्वरूप-स्वातन्त्र्य से ही उदित हो जाती है । इसप्रकार की अभिलाषा का
उदित होना ही स्वरूप में अपूर्णता की प्राथमिक अनुभूति अर्थात् सब से पहला मल है क्योंकि
जब सारी विश्वकल्पना स्वरूप में शाश्वत रूप में अवस्थित ही है तो उसको अपने से भेद में
१. अज्ञानं तिमिरं पारमेश्वरस्वातन्त्र्यमात्रसमुल्लसितस्वरूपगोपनामात्रसतत्त्वम्....
(तं० वि० १.२३)
क्षेमराजकृत शिवसूत्रविमर्शिनी ५९
देखने की अभिलाषा का उदय होना अपूर्णता की अनुभूति नहीं तो और क्या हो सकती है ?
यह अपूर्णता की अनुभूति आणव, मायीय और कार्म इन तीन रूपों में अभिव्यक्त होती है
जिनको शैव शब्दों में मलत्रय कहते हैं। अनुग्रहमूर्ति भगवान् आशुतोष ने स्वयं ही
श्रीमालिनीविजय-तन्त्र के दो सूत्रों में इन तीन मलों के स्वरूप का विश्लेषण किया है जो इस
प्रकार है :—
'मलम्ज्ञानमिच्छन्ति१ संसाराङ्कुरकारणम् ॥१॥
'धर्माधर्मात्मकं कर्म सुखदुःखादिलक्षणम्' ॥२॥
इसका अभिप्राय यह है कि अपने वास्तविक स्वरूप का अज्ञान ही मूलभूत आणवमल
है। यह आणवमल, संसार अर्थात् मायीयमल के, अङ्कुर अर्थात् कारणभूत कार्ममल का भी
कारण है। भाव यह कि आणवमल से कार्ममल और कार्ममल से मायीयमल का विकास हो
जाता है। आणवमल का रूप२ अज्ञान, कार्ममल का रूप हेय एवं उपादेय कर्मों का ३पचडा
और मायीय मल का रूप शुभ अथवा अशुभ कर्मों की वासनाओं से जनित सुख दुःख, जन्म,
मरण इत्यादि का ४भोग है।
आणवमल के विषय में शास्त्रकारों का कथन है कि स्वातन्त्र्य की हानि अर्थात् संकोच
दो रूपों में अभिव्यक्त होता है।—
(१) ५बोध में स्वातन्त्र्य की हानि अर्थात् ६चिन्मय स्वरूप की पूर्णज्ञातृता का
संकोच;
(२) ७स्वातन्त्र्य का अबोध अर्थात् ८पूर्णकर्तृता को बोधरूपता से भिन्न समझने का
मिथ्याभिमान ।
यहाँ पर यह नहीं समझना चाहिये कि ये दो अलग-अलग मल हैं, प्रत्युत दोनों रूपों
में स्वातन्त्र्य की अख्याति होने के कारण वास्तव में एक ही मल के दो रूप हैं।
प्रस्तुत सूत्र (निजाशुद्ध्या इत्यादि) में भी सूत्रकार ने इसी मलत्रय की ओर संकेत
करते हुए कहा है कि पतिप्रमाता ने अपने स्वातन्त्र्य से, स्वयं ही, एक प्रकार की अशुद्धि
(आणवमल) उत्पन्न की है जिसके द्वारा वह स्वयं शक्तिदरिद्र होकर, संसारी शुभाशुभ कर्मों
१. 'मलम्ज्ञानमिच्छन्ति' इसमें 'इच्छन्ति' शब्द का अर्थ 'कहते हैं' हैं।
२. मलम्ज्ञानमिच्छन्ति । (मा० वि०, १.२३)
३. धर्माधर्मात्मकं कर्म । (तत्रैव)
४. सुखदुःखादिलक्षणम् । (तत्रैव)
५. स्वातन्त्र्यहानिर्बोधस्य । (ई० प्र०, ३.२.४)
६. बोधस्य चिन्मात्रस्य स्वातंत्र्यहानिर्ज्ञातृत्वसंकोचः एकः प्रकारः।
(ई० प्र०, ३.२.४)—भास्करी
७. स्वातन्त्र्यस्याप्यबोधता । (ई० प्र०, ३.२.४)
८. स्वातन्त्र्यस्य कर्तृत्वस्य अबोधता बोधव्यतिरिक्ताभिमानः द्वितीयः प्रकारः।
(ई० प्र०, ३.२.४-भास्करी)
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
६० स्पन्दकारिका
(कार्ममल) के चक्कर में पड़ गया है और उन कर्मों से जनित जन्ममरणरूप संसृति के क्षोभ
(मायीयमल) का विषय बन गया है। फलतः वह स्वयं ही संसरणशील पशु का रूप धारण
कर गया है।
माया—परमेश्वर की स्वातन्त्र्यशक्ति सर्वतोमुखी है। वह महान् एवं अचिन्त्य
सामर्थ्यशालिनी है। अतः वह स्वेच्छा से अपने स्वरूप पर अख्याति (अपूर्णज्ञान) का आवरण
भी डाल सकती है। अपने 'अहं'विमर्श में, अभेदरूप में अवस्थित विराट् विश्वकल्पना को,
अपने से भिन्नरूप में अवभासित करके, इसकी सृष्टि, संहार इत्यादि की क्रीडा करना उसी
का सामर्थ्य है। आखिर इतने विस्तृत एवं तुच्छ मानव की कल्पना से भी अतीत विश्व को
हस्तामलक की तरह नचाने के लिए इससे अनन्तगुणा सामर्थ्यशालिनी शक्ति तो चाहिये ही।
ऐसी परिस्थिति में जिस समय वह पारमेश्वरी स्वातन्त्र्यशक्ति निजी संकल्पात्मक स्फुरणा के
द्वारा ही, इतने महान् विश्व को, अपने से भिन्नरूप में अवभासित करने के १दुर्घट कृत्य को
करने की ओर उन्मुख होती है उस समय उसका नाम मायाशक्ति पड़ जाता है। संक्षिप्त
शब्दों में यह कहा जा सकता है कि २अभेद में ही भेदसर्जना करने के स्वातन्त्र्य को ही
मायाशक्ति कहते हैं, अतः वह भी परमेश्वर की अभिन्न स्वातन्त्र्यशक्ति का ही विकास है।
स्वयं ही आवरण बन कर, अपने ही पूर्णरूप को अपूर्ण बनाना और अपने भेदहीन स्वरूप
में भेद का सूत्रपात करना ही इसका काम है। अनुत्तर शक्तिमान् भगवान् भूतनाथ ने स्वयं
इस निजी अभिन्नशक्ति का स्वरूप-विश्लेषण करते हुए कहा है कि :—
'वह ३माया-शक्ति एक सर्वव्यापक, सूक्ष्म, खण्डों या भागों से हीन, समग्र संसार
को अपने गर्भ में धारण करने वाली, अनादि, अनन्त, अकल्याणिनी होने पर भी स्वातन्त्र्य
से परिपूर्ण और स्वयं किसी भी प्रकार के विकार से रहित है।
माया के दो रूप हैं—(१) शक्तिरूपा और (२) तत्त्वरूपा। इनमें से पहली का
नाम महामाया या मायाशक्ति और दूसरी का नाम केवल माया या मायातत्त्व है। ये भी
संसार के शुद्धाध्व और अशुद्धाध्व नामक दो स्तरों पर 'अहंता' का तिरोधान करने के
अनुपात से एक ही शक्ति के दो रूप हैं। इनमें जो अन्तर है वह इस प्रकार है :—
महामाया या मायाशक्ति—४स्वातन्त्र्यशक्ति की वह अवस्था जिसमें अहन्तारूप में
अवस्थित इदन्ता को भेदरूप में अवभासित करने की ओर केवल प्राथमिक संकल्पात्मक स्फुरणा
१. परमं यत्स्वातन्त्र्यं दुर्घटसंपादनं महेशस्य ।
देवी मायाशक्तिः स्वात्मावरणं शिवस्यैतत् ॥ (प० सा०, १५)
२. माया नाम च देवस्य शक्तिरव्यतिरेकिणी ।
भेदावभासस्वातन्त्र्यं तथाहि स तया कृतः ॥ (तं०, ९.१४९-५०)
३. सा चैका व्यापिनीरूपा निष्कला जगतो निधिः ।
अनाद्यन्ता शिवेशानी व्ययहीना च कथ्यते ॥ (मा० वि०, १.२६)
४. आद्यो भेदावभासो यो विभागमनुपैयिवान् ।
गर्भीकृतानन्तभावोऽसावपरामर्श उच्यते ॥ (तं०, ९.१५१)
क्षोभ की शान्ति और स्पन्द की उपलब्धि ६१
या उन्मुखतामात्र होती है और अभी इदन्ता का पृथक् रूप में विभाग नहीं हुआ होता है।
संक्षेप में यह, आन्तरविमर्श में भेदावभास के उपक्रम के सूक्ष्म आसूत्रणमात्र की अवस्था है।
यहीं से स्वातन्त्र्य में संकोचरूप १मलत्रय का भी श्रीगणेश होने लगता है।
२मायाशक्ति के गर्भ में आगामी इदन्ता का पूर्णविभाग अर्थात् सारे स्थूल विश्व का
भेदपूर्णवैचित्र्य उसीप्रकार अन्तर्निहित रूप में अवस्थित होता है जिस प्रकार शिम्बिका
(सेम की फली) के गर्भ में असंख्य बीज अलग-अलग होकर भी बाहर से कहीं भी दिखाई
नहीं देते हैं।
शास्त्रकारों ने मायाशक्ति की परिभाषा इस प्रकार प्रस्तुत की है :-
'जो३ अपूर्णता की अनुभूति को जन्म देकर स्वरूप की हिंसा करती है।'
मायाशक्ति का कार्यक्षेत्र, जैसा ऊपर कहा गया है, शुद्धाध्व अर्थात् शिवतत्त्व से
लेकर शुद्धविद्या तत्त्व के प्रमातृमण्डल तक होता है क्योंकि यहाँ तक यद्यपि इदन्ता (भेदप्रथा-
त्मक प्रमेयविश्व) के बहिरङ्ग अवभासन की प्रक्रिया विकासमान अवस्था होती है तथापि
दूसरी ओर अहंता (प्रमातृभाव) का पूरा तिरोधान नहीं हुआ होता है।
माया या मायातत्त्व-शुद्धविद्या से नीचे पृथवीतत्त्व तक के अशुद्धाध्व में मायाशक्ति
का जो रूप कार्यनिरत होता है उसको 'मायातत्त्व' कहते हैं। इस स्तर पर अहन्ता का पूरा
तिरोधान हो जाता है और आगामी जड एवं कार्यरूप प्रमेयविश्व की स्थूल अवभासन-
प्रक्रिया का आरम्भ हो जाता है। 'इदन्ता' 'अहन्ता' से बिल्कुल भिन्न होकर स्थूल देह,
प्राण इत्यादि रूपों में विकसित हो जाती है। स्वरूप पर पूरा आवरण पड़ जाने के कारण
शक्ति का रूप भी ५जड़ बन जाता है। वह स्वयं भी एक जडतत्त्व का ही रूप धारण करके
आगे आगे जड़ कार्यवर्ग का ही कारण बन जाती है। यही कारण है कि इस अवस्था में उसको
मायाशक्ति न कह कर मायातत्त्व कहा जाता है। जड़ बन जाने का ६अभिप्राय यह है कि
मौलिकरूप में असीम स्वातन्त्र्यशालिनी शक्ति होकर भी, देश, काल एवं आकार की सीमाओं
से संकुचित बन जाती है। शैवशब्दों में संकुचित प्रकाशमानता (अल्पज्ञातृता और अल्पकर्तृता)
ही जड़ता होती है।
संसारी ग्राहकवर्ग में मायातत्त्व के मधुमय विष का प्रसार अर्थात् मायाजनित क्षोभ,
किन-किन रूपों में फैल जाता है इस विषय पर आगे सूत्र २० में प्रकाश डाला जायेगा।
१. मायाशक्त्यैव तत्त्रयम्। (ई० प्र०, ३.२.५)
२. ...............बहिर्मुखतायां भाविनो विभागस्य शिम्बिकाफलवदस्यां
गर्भीकारोऽस्ति। (तं० वि०, ९.१५१)
३. अपूर्णताप्रथनेन मीनाति हिनस्ति इति मायाशक्तिरुच्यते। (तं० वि०, ९. १५०)
४. ............तिरोधानकरी मायाभिधा पुनः। (ई० प्र०, ३.१.७)
५. सा जडा भेदरूपत्वात् कार्यं चास्या जडं यतः। (ई० प्र०, ३.१.७)
६. अयमेव हि जडस्य स्वभावो यत् 'इदमत्र इदानीं भाति' इति परिच्छिन्नतया प्रकाश्यते
इति। (तं० वि०, ९.१५३)
६२ स्पन्दकारिका
१यहाँ पर केवल इस बात को समझाने की आवश्यकता है कि मायाशक्ति के द्वारा उत्पादित
संकोच भी सर्वतोमुखी है। सर्वप्रथम यह संकोच पूर्वोक्त सर्वकर्तृत्व इत्यादि पांच स्वतन्त्र
शक्तियों पर प्रभावान्वित होकर उनको क्रमशः किञ्चित्कर्तृत्व, किञ्चिज्ज्ञत्व, अपूर्णत्व,
अनित्यत्व और अव्यापकत्व में परिणत कर देता है जिससे स्वतन्त्र शक्तिमान् पतिप्रमाता
शक्तिदरिद्र पशु बन जाता है। इन पांच संकुचित शक्तियों के शास्त्रीय नाम क्रमशः कला,
विद्या, राग, काल और नियति रखे गये हैं। इस अवस्था में ये स्वतन्त्र शक्तियां न रह कर
पांच प्रकार के वासनात्मक बन्धन (पञ्चकंचुकपांच आवरण) बन जाती हैं और स्वतन्त्र
आत्मा इन्हीं शृङ्खलाओं में फंसकर संसारी पशु बन जाता है। तत्त्वरूपा माया की शास्त्रीय
परिभाषायें इस प्रकार हैं :-
१. माया—२जिसको योगी लोग हेय समझ कर अपने से अलग कर देते हैं।
२. माया—३जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध में सर्वत्र व्याप्त होकर अवस्थित
रहती है।
३. माया—४जो स्वयं 'मा' शब्द से वाच्य निषेध अर्थात् विनाश का विषय नहीं
बनती है अर्थात् नित्य है।
४. माया—५जिसके गर्भ में सारा विश्व अवस्थित रहता है।
५. माया—६जिस शक्ति के द्वारा परमेश्वर स्वरूप में अभिन्न रूप में भी अवस्थित
भावराशि को अपने से भिन्न रूप में प्रतिष्ठित करता है।
इन सारी परिभाषाओं के अतिरिक्त भगवान् ने स्वयं अपने सूत्र में इसको अशिवा
अर्थात् चतुर्दिकू भेदप्रथा का अन्धकार उत्पन्न करके महान् अकल्याण करने वाली बताया
है—'अशिवा भेदप्रथाप्रदा'। केवल अनुत्तरतत्त्व पर ही इसकी दाल नहीं गलती है। बाकी
विश्व के अणु-अणु पर इसने अपना इन्द्रजाल बिछा दिया है। बार-बार सुलझाये जाने पर
भी गोरखधन्धे की तरह फिर कर उलझ जाती हैं। ७यह एक भयंकर ओर विष उगलती हुई
१. मायापरिग्रहवशाद् बोधो मलिनः पुमान् पशुर्भवति ।
कालकलानियतिवशाद् रागाविद्यावशेन संबद्धः ।। (प० सा०, १६)
२. मीयते हेयतया परिच्छिद्यते योगिभिः । (तं० वि० ९.१५२)
३. सर्वत्र मातीति । (तत्रैव)
४. 'मा' शब्दवाच्याद्विनाशरूपान्निषेधाद् यातेति । (तत्रैव)
५. मात्यस्यां विश्वमिति । (तं० वि०, ९.१५२)
६. स्वात्माभिन्नमपि भावमण्डलं शिवो यया मिमीते भिदा व्यवस्थापयतीति !
(तत्रैव)
७. उन्मूलितापि शतशः खण्डितापि सहस्रशः ।
गोनासेवाप्रथयोदेति द्रागत्र शरणं शिवः ॥
(गोनासा कश्मीर में एक भयंकर सर्पिणी को कहते हैं । खण्ड खण्ड किये जाने पर भी
यह उछलकर डंस लेती है।)