स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
सूत्र—(पशुभाव में पड़ा हुआ शिव) तन्मात्रों के रूपवाले सूक्ष्म और उनके कार्यरूप-
१५८ स्पन्दकारिका
भुङ्क्ते परवशो भोगं तद्भावात् संसरत्यतः ।
संसृतिप्रलयस्यास्य कारणं संप्रचक्ष्महे ॥५०॥
भुङ्क्ते अश्नाति, अस्वतन्त्रो भोगं सुखदुःखसंवेदनरूपं, तस्य पुर्यष्टकस्य भावात्
संसरति संसारशरीरे, अतः संसृति-प्रलयस्य जन्ममरणप्रवाहरूपस्य संसारस्य विनाश-
कारणं संप्रचक्ष्महे वक्ष्यामः ॥५०॥
अनुवाद
सूत्र—(पशुभाव में पड़ा हुआ शिव) तन्मात्रों के रूपवाले सूक्ष्म और उनके कार्यरूप-
स्थूल, तथा मनस्, अहंकार और बुद्धि इनके द्वारा परामर्श किये जाने वाले, पुर्यष्टक के
बन्धन में पड़ा है। पुर्यष्टक से ही 'प्रत्ययोद्भव' को जन्म मिलता है। फलतः ॥४९॥
(वह) परवश बनकर सांसारिक भोगों को भोगता है। पुर्यष्टक की विद्यमानता से ही
बार बार जन्मता और मरता है। इसलिये संसृति के बखेड़े को एक बार ही मिटा देने वाले
कारण (उपाय) का वर्णन (अगले सूत्र में) करेंगे ॥५०॥
वृत्ति—'तन्मात्रोदयः' इस शब्द के दो खण्ड हैं—'(१) तन्मात्र और तन्मात्रोदय
(क्रमशः सूक्ष्मपुर्यष्टक और स्थूल-पुर्यष्टक)। इसका अभिप्राय यह कि (पशुभाव में पड़ा हुआ
शिव) शब्द आदि तन्मात्रों की अनुभूति के ही रूपवाले और मनस्, अहंकार और बुद्धि इन
तीनों के द्वारा परामर्श किये जाने वाले, पुर्यष्टक के बन्धन-में पड़ा है। पुर्यष्टक से ही सुखात्मक
या दुःखात्मक संवेदना को जन्म मिलता है। फलतः—॥४९॥
(वह) अस्वतन्त्र बनकर, सुख और दुःख की संवेदना के रूपवाले भोगों को भोगता
है। उस (पुर्यष्टक की विद्यमानता से संसार-शरीर में (पाञ्चभौतिक काया में) संसरण करता
है। अतः संसृति के नाश का अर्थात् जन्म-मरण के प्रवाहरूप संसार का नाश करने वाले
कारण का वर्णन (अगले सूत्र में) करेंगे ॥५०॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्र में उल्लिखित तन्मात्र, पुर्यष्टक इत्यादि शास्त्रीय शब्दों का आंशिक
पर्यालोचन भी कुछेक स्थानों पर किया गया है। कुछ बातें रह गई हैं। अतः यहाँ पर इन
बातों का संक्षिप्त परन्तु यथासम्भव सर्वाङ्गीण विवेचन प्रस्तुत करना आवश्यक है क्योंकि
तभी सूत्र का अभिप्राय समझने में सुगमता होगी।
संसार में प्रत्येक प्राणी की काया के दो रूप होते हैं-(१) सूक्ष्म शरीर और (२) स्थूल
शरीर। इनमें से सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर का कारणरूप और स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर
का कार्यरूप होता है। सूक्ष्म-शरीर त्रिगुणमय मनस्, बुद्धि और अहंकार इन तीन अन्तःकरणों
और इनके द्वारा १संवेद्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच सूक्ष्म तन्मात्रों के योग
१. एषां ग्राह्यो विषयः सूक्ष्मः प्रविभागवर्जितो यः स्यात् ।
तन्मात्रपञ्चकं तत् शब्दः स्पर्शो महो रसो गन्धः । (द्र० सा०, २१)
CC-0.In Public Domain Digitization by eGangotri पुर्यष्टक १५९
से बना होता है । तन्मात्र अवस्था, शब्द आदि पाँच ज्ञेय विषयों की मूलभूत सामान्य अवस्था
को कहते हैं । इस अवस्था में उनमें किसी प्रकार की १विशेषता उत्पन्न नहीं हुई है । उदाहर-
णार्थ २'गन्धतन्मात्र' गन्ध की उस सामान्य-अवस्था को कहते हैं जिसमें अभी सुगन्ध, दुर्गन्ध,
तीव्रगन्ध, मन्दगन्ध, तेल का गन्ध, इत्र का गन्ध, सड़ी लाश का गन्ध इत्यादि विशेषतायें प्रकट
न हुई हों, अपितु सामान्य रूप में मात्र गन्धत्व की वर्तमानता हो । 'रस' इत्यादि के विषय में
भी यही सिद्धान्त है । तन्मात्ररूप में वर्तमान शब्द आदि विषयों का बाह्य स्थूल इन्द्रियों के
द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता है जब कि विशिष्टरूप में विकसित होने पर; बाह्य इन्द्रियों
के द्वारा, इनका ग्रहण सहजरूपों में किया जा सकता है । ऐसे ही बने तन्मात्ररूप शब्द आदि
पाँच ज्ञेय-विषयों और मनस् इत्यादि तीन अन्तःकरणों से बने हुये, सूक्ष्म शरीर को पारिभा-
षिक शब्दों में 'सूक्ष्म-पुर्यष्टक' कहते हैं । दूसरे शब्दों में इसको 'वासना-पिण्ड' भी कहते हैं ।
स्थूल-शरीर भी त्रिगुणमय मनस्, बुद्धि, अहंकार इन तीन अन्तःकरणों और इनके
संवेद्यविषय तन्मात्रों के ही कार्यरूप आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी इन पाँच स्थूल-
महाभूतों के मिश्रण से बना हुआ होता है । सूक्ष्म तन्मात्र ही जब अपनी सामान्य-अवस्था को
छोड़ कर विशिष्ट-अवस्था में अभिव्यक्त होते हैं तब स्थूल, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध
कहलाते हैं और इन्हीं के कार्य स्थूल पञ्चमहाभूत होते हैं । फलतः स्थूलभूतों की मूलावस्था
भी तन्मात्र ही होते हैं । ३स्थूलभूतों का रूप धारण करते समय, ये तन्मात्र आपस में एक
निश्चित क्रम के अनुसार मिल जाते हैं । वह क्रम इस प्रकार है—
सामान्य रूप विशेषरूप
१. शब्द-तन्मात्र शब्द गुण वाला स्थूल आकाश ।
२. शब्द-स्पर्श तन्मात्र स्पर्श गुण वाला स्थूल वायु ।
३. शब्द-स्पर्श-रूप तन्मात्र रूप गुण वाला स्थूल तेज ।
४. शब्द-स्पर्श-रूप-रस तन्मात्र रस गुण वाला स्थूल जल ।
५. शब्द-स्पर्श-रूप-रस गन्ध तन्मात्र गन्ध गुण वाली स्थूल पृथिवी ।
स्थूलशरीर में इन पाँच महाभूतों की अवस्थिति निम्नलिखित प्रकार से मानी
जाती है—
१. नाड़ियों इत्यादि के पोले भाग जिनके मध्य में शून्य अवकाश होता है; आकाश
के रूप में 'शब्द-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है ।
२. पाँच स्थूल प्राण, वायु के रूप में 'स्पर्श-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है ।
१. अनुद्भिन्नविशेषतया स गन्धादिरेव केवलस्तन्मात्र इत्युक्तम् । (तं० वि०, ९.२८१)
२. पृथिव्यां सौरभान्यादिविचित्रे गन्धमण्डले ।
यत्सामान्यं हि गन्धत्वं गन्धतन्मात्रनाम तत् ॥ (तं०, ९. २८०-८१)
३. एतत्संसर्गवशात् स्थूलो विषयस्तु भूतपञ्चकताम् । अभ्येति नभः पवनस्तेजः सलिलं च
पृथिवी च ॥ (प० सा०, २२)
द्रष्टव्य इसी कारिका की विवृति भी ।
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
१६० स्पन्दकारिका
CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri
३. गर्मी चमक और आकार इत्यादि, तेज के रूप में 'रूप-तन्मात्र' की
अभिव्यक्ति है।
४. खून पसीना इत्यादि तरल पदार्थ, जल रूप में 'रस-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है।
५. शरीर में पाये जाने वाले विभिन्न गन्धों के अतिरिक्त कठिन हड्डियाँ; मांस के
लोथड़े इत्यादि, पृथिवी के रूप में 'गन्ध-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है।
अब यह बात स्पष्ट हो गई कि पाञ्चभौतिक काया भी पुर्यष्टक ही है क्योंकि इसके
आधार भी वही पाँच तन्मात्र ओर तीन अन्तःकरण हैं। हां सूक्ष्म-तन्मात्रों का स्थूल कार्यरूप
होने के कारण इसकी (काया की) स्थूल-पुर्यष्टक की संज्ञा दी गई है। इन्हीं दो प्रकार के
शरीरों को दूसरे शब्दों में क्रमशः भावात्मक और भूतात्मक शरीर कहते हैं। इनके विषय में
पहले ही उल्लेख हो चुका है।
स्थूल-पुर्यष्टक अल्पकालावस्थायी है अतः प्रत्येक मरण के समय सूक्ष्मशरीर इसको
छोड़कर दूसरे भूतशरीर को धारण कर लेता है। सूक्ष्मशरीर तब तक आत्मा का पिंड नहीं
छोड़ता है जब तक उसको स्वरूप-ज्ञान प्राप्त न हो। संक्षेप में इतना कहना पर्याप्त है कि सूक्ष्म
शरीर आठ प्रकार की शलाकाओं से निर्मित एक पिंजरा है जिसमें आत्मा नामक विहङ्गम महती
रुचि से बैठा रहता है क्योंकि स्वनिर्मित विषयोपभोग की द्राक्षा का आस्वादन, उसमें मुक्ताकाश
की स्वच्छन्दमयी भूमिका की विस्मृति उत्पन्न करा देता है। साथ ही यह शरीररूपी पिंजरा
केवल पिंजरा ही नहीं अपितु आत्मा को एक स्थूल-शरीर से दूसरे में पहुँचाने वाला वाहन
भी है।
उपर्युक्त तथ्यों की पृष्ठभूमि पर, सूत्रकार का यह कथन ठीक ही है कि वास्तव में
पुर्यष्टक ही आत्मा का बन्धन है और यही उसको स्वरूप-लाभ होने तक शतशः दुर्गंतियों में
डाल देता है ॥४९-५०॥
[ चक्रेश्वरता की उपलब्धि ]
अब अगले सूत्र में संसृति के टंटे को सदा-सर्वदा के लिये समाप्त कर देने वाले कारण
का वर्णन किया जा रहा है :-
यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोदयौ ।
नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥५१॥
यदा पुनस्त्वेकत्र स्थूले सूक्ष्मे वा संरूढो लीनचित्तः, तदा तस्य प्रत्ययोद्भवस्य
लयोद्भवौ ध्वंसप्रादुर्भावौ नियच्छन् कुर्वन् भोक्तृतां प्राप्नोति। ततः चक्रेश्वरो भवेत्
सर्वाधिपतिर्भवति ॥५१॥
अनुवाद
सूत्र—जब (साधक) इन से (स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से) किसी एक में व्यवस्थित
होता हुआ ही चित्त को लीन करके, अन्तःबहि एकाकार स्पन्दतत्त्व की अनुभूति प्राप्त कर लेता
है तब स्वतन्त्रतापूर्वक, उसके (प्रत्ययोद्भव के), सृष्टि और संहार को सम्पन्न करता हुआ,
चक्रेश्वरता की उपलब्धि १६१
(अपनी खोई हुई) भोक्तृभाव की पदवी पर पहुँच जाता है। अन्तर शक्तिचक्र का ईश्वर (पूर्ण-
शिव) बन जाता है ॥५१॥
वृत्ति—जब स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से किसी एक में भी अवस्थित होता हुआ ही,
अपने चित्त को स्पन्दतत्त्व में लीन कर लेता है तब उस प्रत्ययोद्भव के संहार और सृष्टि को
स्वतन्त्रतापूर्वक सम्पन्न करता हुआ, (खोये हुये) भोक्तृभाव को प्राप्त कर लेता है। अनन्तर
चक्रेश्वर बन जाता है अर्थात् सारे शक्तिचक्र का अधिपति (संयोजन और वियोजन का स्वतन्त्र
कर्ता पूर्ण-शिव) बन जाता है ॥५१॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्र जहाँ एक ओर इस सारे स्पन्दशास्त्र का उपसंहार-सूत्र है वहाँ दूसरी ओर
इसका संग्रह-सूत्र भी है। सूत्र के साथ साथ इस सारे स्पन्द-प्रकरण का आद्योपान्त मनन एवं
अनुसंधानात्मक पर्यालोचन करने पर भी पाठक सहज ही में निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुँच
सकता है।
१विश्वोत्तीर्ण और विश्वात्मक रूप में केवल एक ही सर्वस्वतन्त्र चेतनसत्ता विद्यमान है।
वह सत्ता प्रकाशरूप शिव और उसकी अभिन्न विमर्शशक्ति की समरस-अवस्था है। शक्ति ही
शिव है और शिव ही शक्ति है। अहंविमर्शमय स्पन्द ही शक्ति का स्वरूप है। यह सारा नाम-
रूपात्मक व्यक्त विश्व शिव की बहिर्मुखीन शाक्त-स्पन्दना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है यद्यपि
अभेद भूमिका पर पूर्णाहन्तारूप स्पन्दशक्ति एक ही है तथापि वह बहिर्मुखीन भेद भूमिका के
अवभासन करने का शाश्वत स्वभाव होने के कारण, स्वतन्त्रता से, सामान्यभूमिका से विशेष-
भूमिका पर उतर कर, अनन्त भावात्मक और भूतात्मक रूपों में स्पन्दायमान है। इसके ये
अनन्त विशेष-स्पन्द ही विश्व के अनन्त चेतन और जड़ भाव हैं। इन्हीं अनन्त शाक्त-स्पन्दों
को शास्त्रीय शब्दों में 'शक्तिचक्र' कहते हैं। शिव अपनी इच्छात्मक विमर्शना से ही प्रतिसमय
इस शक्तिचक्र के २संयोजन और वियोजन (निमेषोन्मेष) के रूप में, सारे भाववर्ग के, सृष्टि
स्थिति, संहार, पिधान एवं अनुग्रह, इन पाँच कृत्यों को युगपत् और स्वतन्त्रता से करता
रहता है। फलतः वह इस सम्पूर्ण शक्ति-चक्र का स्वतन्त्र अधिपति होने के कारण
'३चक्रेश्वर' है।
४शिव और पशु में कोई मौलिक स्वरूपगत भेद नहीं है। शिव अपनी शक्ति के द्वारा
उद्भासित पुर्यष्टक में अपने ही आप को बन्दी बनाकर पशु बना है। इस अवस्था में पड़कर वह
स्वरूप को पूर्णतया भूल जाने के कारण अविवेकी, असहाय और परवश बना है। उसको
१ ग्रन्थ के प्रारम्भिक सूत्र, विशेषकर पहला सूत्र।
२. द्रष्टव्य तन्त्रालोक नवम आह्निक और ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के ज्ञानाधिकार में आभासवाद।
३. द्रष्टव्य तंत्रलोक का चौथा आह्निक।
४. ग्रन्थ के मध्यवर्ती सूत्र, विशेषकर निम्नलिखित सूत्र—'निजाशुद्ध्यासामर्थ्यस्य', गुणादिस्पन्द-
निष्यन्दाः', 'अप्रबुद्धधियः', 'शब्दराशिसमुत्थस्य', 'सम्ग्रामेऽपि प्रवृत्तस्य'।
१६२ स्पन्दकारिका
पुर्यष्टक का भूत इस प्रकार से चिमट गया है कि वह आविष्ट जैसा बन कर, इसी को वास्त-
विक स्वरूप समझता हुआ, सांसारिक विषयोपभोग के मधुमिश्रित हलाहल को मजा ले लेकर
पी रहा है और इसके जन्ममरणरूप कटु परिणाम को परवश बनकर भोग रहा है । ऊपर से
ब्राह्मी इत्यादि पशुशक्तियों का वर्ग इसको, स्थूल एवं सूक्ष्म अभिलाषात्मक विकल्प परम्पराओं
में पग-पग पर उलझा कर, स्वरूप-चिन्तन से दूर रखने पर तुला हुआ है । संक्षेप में तात्पर्य
यह है कि इसने अपने भोक्तृभाव के चिन्तामणि को भोग्यभाव की कौड़ियों के दाम बेच डाला
है । कितना दुःख, कितना अज्ञान और कितनी विडम्बना है ?
१पशुशक्तियों से अधिष्ठित पुर्यष्टक (वासनापिंड) से पिंड छुड़ाकर अपनी इच्छा से ही
खोई हुई चक्रेश्वरता को प्राप्त कर लेना ही मानवजन्म का मुख्य उद्देश्य है । इस प्रकार की
अर्थसिद्धि संसार के आघात-प्रतिघातों से भागकर, दिन रात केवल पुर्यष्टक का दुःखड़ा रोते
रहने से ही सम्भव नहीं हो सकती है, अपितु जीवनक्षेत्र में सारे व्यवहार करते करते और
पुर्यष्टक में रहते रहते ही लगातार अहंविमर्शात्मक अनुसन्धान के द्वारा, संसार, पुर्यष्टक, मल,
अज्ञान, बन्धन, संकोच इत्यादि सारे जड़-चेतन भावों में, केवल और केवल, शाश्वत, स्पन्दमयी
स्वरूपसत्ता की व्यापकता की यथार्थ अनुभूति प्राप्त करने से ही सम्भव हो सकती है । निर्मल
एवं चिद्रूप विश्वात्मभाव प्राप्त कर लेने पर कोई भी तथाकथित बन्धन, २बन्धन नहीं
रहता है । इस भाव को प्राप्त करने के लिए संकल्प-विकल्पात्मक चित्त को 'चित्-शक्ति' में ही
विलीन करना आवश्यक है ।
निरन्तर तीव्र-अनुसन्धान के द्वारा स्वरूप-अनुभूति को प्राप्त करनेवाले सुप्रबुद्ध योगी,
अपनी स्वतन्त्र इच्छा के अनुसार कितने ही पुर्यष्टकों, प्रत्ययोद्भवो या दूसरे द्वन्द्वात्मक भावों के
सृष्टि-संहार की क्रीडा स्वयं सम्पन्न करने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं अतः वे इनके भोग्य न
बन भोक्ता बन जाते हैं ।
भोक्तृभाव की स्थिर उपलब्धि ही 'चक्रेश्वरता' की उपलब्धि है । यही शिवत्व की
प्राप्ति है । यही जन्म-मरणरूप संसृति का अंत है ॥५१॥
शैवशास्त्रों में गुरुशक्ति का महत्व मुक्तकंठ से स्वीकारा गया है । स्वरूप-अनुभूति
के विषय में बड़ी पोथियां पढ़ने अथवा लम्बे व्याख्यान सुनने पर भी, मानव-पशु के संशय-
ग्रस्त मन को तब तक संतोष प्राप्त नहीं हो सकता है जब तक अनुग्रहमूर्ति गुरुरूप में अवतीर्ण
होकर, स्वयं, उसके अन्धकारावृत हृदय को लोकोत्तर प्रकाश-पुञ्ज से प्रकाशित न करे । अतः
उस महामहिमामयी गुरुशक्ति के सामने नतमस्तक होना आवश्यक है :-
१. प्रस्तुत सूत्र में वर्णित उद्देश्य ।
२. यो निश्चयः पशुजनस्य जडोऽस्मि कर्म संपाशितोऽस्मि मलिनोऽस्मि परेरितोऽस्मि ।
इत्येतदन्यदृढ़निश्चयलाभसिद्धा सद्यः पतिर्भवति विश्ववपुश्चिदात्मा ॥
(तं० सा०, ४ आह्निक )